मुस्लिम और सिख

मुस्लिम और सिख हर समस्या में एक दूसरे के साथ खड़े रहे हैं

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हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों में शक और संदेह की भावना ऐतिहासिक रही है, जिसका फ़ायदा दोनों मजहबों के नेता उठाते हैं, अधिकतर हिंदू ऐसे हैं जो मुसलमानों से कभी मिले नहीं लेकिन मुस्लिमों से घृणा करते हैं यही हाल मुसलमानों का भी है लेकिन बीते वर्षों में मुस्लिमों के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे झूठ और घृणा के प्रचार ने इस शक की भावना को और अधिक बढ़ा दिया है। इस प्रचार का लाभ उठाकर भाजपा और संघ का चुनावी घोड़ा उत्तरी राज्यों से घूमता हुआ उत्तरपूर्वी और दक्षिणी राज्यों में भी पहुँच चुका है।

लेकिन पंजाब ऐसा राज्य रहा है जिसने मोदी के स्वघोषित “अश्वमेघ” के घोड़े को एक नहीं बल्कि तीन-तीन बार अपने खूँटे से बांधकर खड़े रखा है। एकबार विधानसभा चुनावों में और दो बार लोकसभा चुनावों में। लेकिन ऐसा क्या कारण हैं कि मुस्लिमों का डर दिखाकर वोट माँगने वाला भाजपा का चुनावी घोड़ा उत्तरी राज्यों को जीतकर जब पंजाब पहुँचता है तो हाँफने लगता है।

एक कहानी मलेरकोटला की

इसका कारण ये है कि भाजपा और संघ, सिखों को हिंदुओं की तरह ही मुस्लिमों के ख़िलाफ़ लामबंद करना चाहता है लेकिन इसके लिए उसने पैटर्न नहीं बदला, पैटर्न वही रखा, यही कारण है कि किसान आंदोलन के समय ऐसे सिख गुरुओं की तस्वीरें वायरल की जा रही हैं जिन्हें मुग़लों ने ज़िंदा जलवाया या मृत्युदंड दिया। इससे एक तरह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि मुसलमानों का साथ देने का अर्थ अपने गुरुओं की शहादत का अपमान करने जैसा है, लेकिन उत्तरी राज्यों में अपनाया हुआ ये फ़ॉर्म्युला पंजाब के सामाजिक विज्ञान में फ़िट नहीं बैठता। इसका कारण ये है कि मुग़लों की ऐतिहासिक ग़लतियों से नफ़रत करने वाला सिख, मुसलमानों के अच्छे कामों के अहसान के आगे झुक जाता है। नफ़रत की कहानियां उसे सुनाई गई मोहब्बत की कहानियों से हार जाती हैं।

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ऐसी ही एक कहानी है मलेरकोटला की, जब गुरू गोबिंद सिंह के दो छोटे-छोटे पुत्रों को दीवार में चुने जाने का फरमान हुआ तो मलेरकोटला के मुस्लिम नवाब ने इसका विरोध किया, मुगल साम्राज्य के आदेश की मुख़ालफ़त करते हुए उस समय के पंजाब के मुग़ल सिपहसालार और काज़ी मुगल दरबार छोड़ कर निकल आये। इस वजह से पंजाब के सिख आज भी मलेरकोटला के नवाब के परिवार का सम्मान करते हैं। जब दिल्ली की गद्दी सिखों ने फतेह की तो वहां के नवाब की पत्नी मलेरकोटला की बेटी निकली। बेगम के मलेरकोटला से सम्बंध को जानने के बाद सिखों ने जान बख्शने के साथ-साथ उनकी संपत्ति भी लौटा दी थी। मलेरकोटला सिखों के आगे एक ऐसा उदाहरण है कि सिख मुग़लों के रूप में मुसलमानों के द्वारा की गई ग़लतियों को अधिक वजन नहीं देते। यही वजह है कि मलेरकोटला में आजादी के वक़्त भी कोई अप्रिय घटना नही घटी।

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मुसलमानों ने सिखों के लिए लंगर लगाए थे

जबकि पूरा मुल्क में हत्याएँ हो रही थीं। लॉकडाउन के समय भी सिख गुरुद्वारों ने मुस्लिम मजदूरों की मदद की थी, इसकी भी खबरें आपको पढ़ने को मिल जाएंगी। सीएए आंदोलन के समय भी सिखों ने अपने लंगर मुसलमानों के लिए खोल दिए थे। ये मोहब्बत इकतरफ़ा नहीं है सिखों के गुरुद्वारों को मुसलमानों के द्वारा अनाज दान करने की कितनी ही खबरें आपको छोटे-छोटे अख़बारों में मिल जाएंगी, इन्हीं किसानों का ये किसान आंदोलन जब पंजाब में जन्म ले ही रहा था तभी मालेरकटला के मुसलमानों ने सिखों के लिए लंगर लगाए थे।

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ये पंजाब की अपनी कल्चर है जो वर्षों की साझी विरासत है, कल्चर जिसकी बलखायी फिजाओं में हिन्दू, सिख और मुसलमान सभी क़ौमों के लोग सांस लेते हैं। एक तरफ़ पूरा उत्तरभारत हिंदू-मुसलमानों की बहस में अपनी पूरी ऊर्जा खर्च कर दे रहा है, लाखों नौजवान नफ़रत और घृणा करते हुए ख़त्म हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ एक अकेला पंजाब इस नफ़रत के ख़िलाफ़ अपनी ऐतिहासिक लड़ाई लड़ रहा है। यही बात सिख कौम को अलग बनाती है।

ये लेख चर्चित पत्रकार Shyam Meera Singh सिंह ने लिखा है..

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