आर्थिक रूप से पहले ही वेंटिलेटर पर ज़िंदगी जी रहे मुसलमानों का इस लॉकडाउन में आर्थिक बहिष्कार ?

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विचार

सम्पूर्ण विश्व इस बात से भली-भांति अवगत है कि कोरोना जैसा घातक वायरस कहां से फैला है । मगर हमारे देश भारत में इसे सांप्रदायिक जामा पहनाकर इस बीमारी का ज़िम्मेदार मुसलमानों को ही बता दिया गया । मीडिया द्वारा मुसलमानों को लेकर फैलाई गई झूठी ख़बरों और कोरोना को भारत में फैलाने का बेबुनियाद आरोप मुसलमानों पर लगाकर इतनी नफ़रत फैलाई गई, जिसके चलते मुसलमानों पर देशभर में हमले किए जाने लगे। उनका आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार किया जाने लगा।

देशभर में चल रहे लॉकडाउन को एक माह से अधिक वक्त गुज़र चुका है । लॉकडाउन के चलते पूरा देश अस्त-व्यस्त हो चुका है । कोरोना के लगातार बढ़ते मामलों ने सरकार की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं। मगर भारत में कोरोना वायरस मुसलमानों के लिए दोहरी मार बनकर आया है । मीडिया द्वारा मुसलमानों को भारत में कोरोना फैलाए जाने का बेबुनियाद आरोप लगाकर दिखाई गई फेक न्यूज़ के बाद देशभर में मुसलमानों को ख़लनायक और हिकारत भरी नज़रों देखा जाने लगा है । प्रतिदिन देश के अलग-अलग हिस्सों से ख़बरे आ रहीं हैं कि मुसलमानों पर हमले किए जा रहे हैं । देशभर के तमाम राज्यों में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां मुसलमान फेरी वालों से लोग सामान नहीं ख़रीद रहे हैं। मुसलमान फेरीवालों को उनकी आईडी चेक करके मारा पीटा जा रहा है। अपने रोजमर्रा के जीवन में अपमान और सामाजिक बहिष्कार झेल रहे मुसलमानों के लिए अनेक समस्याएं खड़ी कर रहा है।

इस देश को अपने ख़ून से सीचने वाले मुसलमानों पर ज़ुल्म का एक लंबा इतिहास गुज़रा है । 1947 में जब ये देश तक़सीम हुआ तब हिंसा और नफ़रत की वजह से लाखों मुसलमानों को मजबूरन ये देश छोड़ना पड़ा । ख़ून से सने इतिहास की यादें अभी धुंधली भी न हो पायीं थी कि इसी देश में 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद देश के तमाम हिस्सों में मुसलमानों को उसी डर का सामना करते हुए अपने घरों और चाहने वालों की लाशों को देखने के लिए मजबूर होना पड़ा । बाबरी के बाद देश के कुछ हिस्सों में हुए आतंकी हमलों ने मुसलमानों के ऊपर नया संकट पैदा किया। आतंकी हमलों की आड़ में सरकारों ने मुसलमानों का उत्पीड़न करना शुरू कर दिया। मुस्लिम युवकों को दशकों तक क़ैद में रखकर यातनाएं दी गईं। बाद में ये लोग निर्दोष साबित हुए। दशकों तक बेगुनाह मुसलमानों को आतंकवाद के झूठे मामलों में फंसा कर उनका पूरा जीवन एक अंधेरे में गुज़र गया । आज भी हज़ारों मुसलमान झूठे आरोपों में जेलों में बंद ज़िदगी काटने को मजबूर हैं।

दशकों से जारी हैं भारतीय मुसलमानों पर ऐसे हमले

इधर पिछले कुछ सालों में गोरक्षा और लव जिहाद के नाम पर मुसलमानों की लिंचिंग और उन पर हुए हमले हमें याद दिलाते रहे कि भारत अब भी मुसलमानों के लिए उदार नहीं है। 2014 में जब पहली बार नरेंद्र मोदी की सरकार बनी, तब से मुसलमानों के ख़िलाफ़ माहौल और अधिक विषाक्त हो गया है। बड़े और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ खुलेआम जहर उगला । देश की मुख्यधारा के हिन्दी मीडिया और दूसरी भारतीय भाषाओं के टीवी चैनलों ने भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुसलमानों को राजनीतिक और सामाजिक तौर पर दरकिनार कर देने की एक पूरी प्रक्रिया सुनियोजित तरीके से चलाई गई।

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2019 में सत्ता वापसी के बाद मोदी सरकार ने मुसलमानों के ऊपर कई संवैधानिक और क़ानूनी हमले किए । कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर महीनों तक उसे क़ैद में रखना, तीन तलाक को आपराधिक घोषित करना और राम मंदिर निर्माण के फ़ैसले ने मुसलमानों को अलग-थलग महसूस कराया। एनआरसी और नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों ने मुसलमानों को आपसी भाईचारे और उम्मीद की एक किरण दिखाई थी। इन प्रदर्शनों में हर मजहब-पंथ के लोग कंधे से कंधा मिलाकर एकसुर में बोल रहे थे। छात्र हों या किसान, हर वर्ग ने इस क़ानून का मुखर होकर विरोध किया, लेकिन कोरोना की महामारी के कुछ दिन पहले ही दिल्ली में भड़की हिंसा ने मुसलमानों को फिर से आतंकित कर दिया। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की सरकार ने तो जैसे अपने ही मुस्लिम नागरिकों के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी। विरोध कर रहे मुसलमानों पर पुलिस ने गोलियां चलाना शुरू कर दीं । दर्जनों मुसलमानों को पुलिस ने गोली मारके मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया ।

तबलीग़ी जमात का सहारा लेकर देशभर के मुसलमानों पर किए जा रहे हमले

13 मार्च से 15 मार्च के बीच रूढ़िवादी मुसलमानों के तबलीग़ी जमात ने दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में मरकज का आयोजन किया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह आयोजन बहुत ही नुकसानदायक साबित हुआ। हालांकि हमें याद रखना चाहिए कि निजामुद्दीन में इस आयोजन से पहले तबलीग़ी जमात के लोगों ने दिल्ली और केंद्र सरकार से अनुमति ली थी। देश के कई हिस्से में इसी तरह के आयोजन इस बीच किए गए, लेकिन किसी भी मीडिया या सरकार ने इसकी कोई खोज ख़बर नहीं ली । गुजरात के मंदिरों और पंजाब में सिखों के जमावड़ों पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया और न ही इसके लिए कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी हुई। तबलीग़ी जमात के मामले में पूरी मीडिया और सरकार ने जैसे मोर्चा ही खोल लिया। प्रेस विज्ञप्ति में औपचारिक तौर पर तबलीग़ी जमात को कोरोना वायरस का मुख्य केंद्र बिंदु बताया जाने लगा।

तबलीग़ी जमात का सहारा लेकर आम मुसलमानों के ख़िलाफ़ माहौल बनाया जाने लगा। सोशल मीडिया पर भाजपा के कुख्यात आईटी सेल ने फ़ेक वीडियोज़ डाल कर यह बताने की कोशिश की कि मुसलमान जान-बूझकर कोरोना वायरस फैला रहे हैं। नफ़रत की इस खेती का घातक परिणाम भी जल्दी ही दिखने लगा। तबलीग़ी जमात से जुड़े लोगों को आतंकवादियों के तौर पर देखा जाने लगा। जमात से जुड़े कम से कम दो लोगों ने इस वजह से खुदकुशी की। देशभर में उनपर हमले शुरू हो गए । लॉकडाउन से प्रभावित लोगों के बीच राशन बांट रहे लोग ने बताया कि जब वे किसी हिंदू बहुल मुहल्ले में जाते हैं तो उनके साथ बदसलूकी होती है और बाहर कर दिया जाता है।

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कोरोना महामारी की जितनी क़ीमत दूसरे क़ौम के लोग चुका रहे हैं, उतनी ही क़ीमत मुसलमान भी चुका रहा है। सच तो यह है कि बाकी किसी भी समुदाय से ज्यादा तकलीफ़ में शहरी क्षेत्रों के छोटे मुस्लिम व्यापारी हैं। उन्हें कोई सरकारी राहत भी नहीं मिल सकती, क्योंकि वे पंजीकृत कामग़ार नहीं हैं। आज इस महामारी में जब पूरा भारत विस्थापन, बेरोज़गारी और भूख जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, भारत के मुसलमान इन सबके साथ-साथ अपने पड़ोसियों के नफ़रत और हिंसा को भी झेलने पर मजबूर हो रहे हैं।

आर्थिक रूप से भारत का मुसलमान सबसे बुरी हालत में


हिंदुस्तान के मुसलमानों में जितनी विविधता देखने को मिलती है, वो किसी और देश के मुसलमानों में नहीं दिखती । पिछले 1,400 सालों में हिंदुस्तान के मुसलमानों ने खान-पान, शायरी, संगीत, मुहब्बत और इबादत का साझा इतिहास बनाया और जिया है । इस्लामिक उम्मत दुनिया के सारे मुसलमानों को एक बताता है। यानी इसके मानने वाले सब एक हैं। लेकिन, भारतीय मुसलमान जिस तरह आपस में बंटे हुए हैं । हिंदुस्तान में मुसलमान भौगोलिक दूरियों के हिसाब से भी बंटे हुए हैं और पूरे देश में इनकी आबादी बिखरी हुई है । सो, हम देखते हैं कि तमिलनाडु के मुस्लिम तमिल बोलते हैं, तो केरल में वो मलयालम। उत्तर भारत से लेकर हैदराबाद तक बहुत से मुसलमान उर्दू ज़बान इस्तेमाल करते हैं । इसके अलावा वो तेलुगू, भोजपुरी, गुजराती, मराठी और बंगाली ज़बानें भी अपनी रिहाइश के इलाक़ों के हिसाब से बोलते हैं। बंगाल में रहने वाला मुसलमान, बांग्ला बोलता है और किसी आम बंगाली की तरह हिल्सा मछली का शौक़ीन होता है। वो पंजाब या देश के किसी और हिस्से में रहने वाले मुस्लिम से बिल्कुल मुख़्तलिफ़ होता है।

आर्थिक मोर्चे पर आज इस देश की 20 करोड़ मुसलिम आबादी वेंटीलेटर पर जा चुकी है । कोरोना के बाद लागू हुए देशव्यापी लॉकडाउन ने देश की अर्थव्यवस्था ठप पड़ चुकी है । मगर इस लॉतडाउन में दोहरी मार झेल रहा देश का मुसलमान टूट रहा है । पहले से टूट चुके समुदाए का सामाजिक बहिष्कार मरे को सौ दुर्रे मारना जैसा है । एक पूरे समुदाए का सामाजिक और आर्थिक बहिषकार वो भी इस समय जब देश कोरोना के चलते लॉकडाउन में है। लाखों लोग भुखमरी की चपेट में आ सकते हैं । इस लॉकडाउन की मार का सबसे अधिक असर मज़दूरों की रोज़ी रोटी पर पड़ा है ।

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सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने मुस्लमानों की आर्थिक हालत…

साल 2006 में आई सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने पहली बार भारत के मुसलमानों के हालात पर ख़तरे की घंटी बड़े ज़ोर से बजाई थी। इस रिपोर्ट के आने के बाद मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन को लेकर चर्चा होने लगी। पहली बार मुसलमानों को सिर्फ़ एक धार्मिक-सांस्कृतिक समूह के तौर पर देखने के बजाय, उनके विकास को लेकर देखा गया। तस्वीर बेहद भयावह थी। मुसलमानों में ग़रीबी, पूरे देश के औसत से ज़्यादा है। मुस्लिम समाज की आमदनी, ख़र्च और खपत की बात करें, तो वो दलितों, आदिवासियों के बाद नीचे से तीसरे नंबर पर हैं। सरकारी नौकरियों में धर्म के आधार पर हिस्सेदारी का आंकड़ा मोदी सरकार ने देने से मना कर दिया है। इसलिए ये नहीं कहा जा सकता है कि सरकारी नौकरियों में कितने मुसलमान हैं लेकिन कुंडू कमेटी का मानना है कि सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की तादाद चार फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं है।

हिंदुत्व का स्पष्ट लक्ष्य हमेशा से मुसलमानों को हाशिए पर डालने का रहा है। लेकिन हिंदू दक्षिणपंथ के कई नेताओं ने बार-बार जोर दिया है कि अन्य सामाजिक और आर्थिक आयामों में वे मुसलमानों की बेहतरी चाहते हैं। आज जब दुनिया कोरोना वायरस जैसी घातक बीमारी से जंग लड़ रही तब भारत में मुसलमानों को लेकर तेज़ी से नफरत फैलाई जा रही है । याद रखिए भविष्य दुनिया यही लिखा जाएगा कि जब दुनिया कोरोना के संकट से गुज़र रही थी तब भारत में मुसलमानों को इस बीमारी को फैलाने का आरोप लगा कर उन पर अत्याचार किया जा रहा था।

ये लेखक के निजी विचार हैं…

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