विचार: इस बार क्यों हैं मध्यप्रदेश के चुनाव थोड़ा हटके

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यह लेख वरिष्ठ पत्रकार अनिल दुबे की फेसबुक वॉल से लिया गया है..

मप्र का रुख किस दल की तरफ है?
क्या वाकई कोई एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) है? क्या कांग्रेस को एक चेहरा घोषित करना चाहिए?

बहुत प्रश्न है, लेकिन जबाब स्पष्ट नहीं है, हो भी नहीं सकते, क्योंकि एक ही परिस्थिति में परिणाम अलग-अलग होते रहे है या हो सकते है। पांच करोड़ मतदाता वाले प्रदेश में, जहाँ 2.5 से 3 करोड़ मतदाता चुनावी प्रक्रिया में भाग लेते हो, रुख बताना भी आसान नहीं है।
लेकिन ये सही है कि 2003 में सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस 15 सालों में पहली बार चुनाव लड़ती हुई दिख रही है। शायद इसके पीछे यह कारण हो सकता है कि इन सालों में पहली बार पीसीसी में एक सुविधा संपन्न और बड़े कद के नेता को जिम्मा दिया गया है।

कुछ मत यह भी कहते है कि कांग्रेस के पास भाजपा की तरह सुगठित संगठन नहीं है। कब था? पिछले कुछ दशकों से कांग्रेस सुगठित संगठन आधारित दल नहीं रहा। नेता है, उनके समर्थक है और उन समर्थकों के समर्थक है और इन समर्थकों के परिचित है और इस चैन के सबसे ऊपर गांधी परिवार या फिर उनका कोई करीबी नेता। कांग्रेस नेताओं की पार्टी है और उनके व्यक्तित्व का प्रभाव उसका कार्यक्षेत्र, साथ में जैसा नेता चाहे वैसा संगठन। इसी संगठन के सहारे इस पार्टी ने चुनाव भी जीते और सत्ता भी चलाई। दूसरी और भाजपा का संगठन एकदम सेना की तरह। सबका हिसाब किताब ऊपर तक, हर बूथ और उसके नेताओं पर नज़र।

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खैर संगठनो की मीमांसा बाद में, बात चुनाव की। इस बार कांग्रेस पिछले दो विधानसभा चुनावों से अलग दिख रही है और यही भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। इसीलिये भाजपा अध्यक्ष अमित शाह हर सभा में कांग्रेस से पूछते है कि हमारे पास चेहरे के रूप में एक गरीब किसान पुत्र (शिवराज सिंह) है, आपका चेहरा कौन होगा? क्या आप एक राजा (दिग्विजय), महाराजा (सिंधिया) और उद्योगपति (कमलनाथ) के सहारे चुनाव लड़ना चाहते है?

तो शाह/शिवराज/भाजपा नेताओं/मीडिया की बात सुनकर क्या कांग्रेस चेहरा घोषित करेगी? शायद नहीं। करना भी नहीं चाहिए। भाजपा ने भी राज्यों में पिछले ज्यादातर चुनावों में कोई चेहरा घोषित नहीं किया। अगर कांग्रेस ने चेहरा घोषित किया तो बाद में होनेवाली कलह पहले ही लड़ाई को कमजोर कर देगी। तो कांग्रेस के लिए यही सही रणनीति होगी कि वो कोई नेता घोषित न करे। सत्ता से लंबे समय तक बाहर होने के दर्द/अभावों से आई एकता एक पल में ही भारी अंतर्कलह में बदल जायेगी। वैसे भी केंद्र में सत्ता से बाहर होने के बाद मप्र कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के पास भी प्रदेश के बाहर बहुत ज्यादा काम नहीं बचा है।

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क्या कांग्रेस को एंटी-इनकंबेंसी का फायदा मिलेगा?
सत्ता विरोधी लहर है भी या नहीं? मप्र को पंद्रह साल हुए किसी और दल का शासन देखे हुए। शिवराज जी कोई बुरे मुख्यमंत्री भी नहीं रहे। काम भी हुए है। लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता कि मैदान में काम करनेवाले भाजपा नेताओं के खिलाफ गुस्सा नहीं है। लगातार सत्ता के होने से आनेवाले दुर्गुण कोई नहीं रोक सकता। ऐसे लोगों को टिकट न देकर क्या इसे संतुलित किया जायेगा ये देखना होगा। कभी कभी अति आत्म विश्वास में “माईं का लाल” जैसे शब्दों का प्रयोग परेशानी का कारण बन सकते है, क्योंकि सत्ता किसी का भला करे तो ठीक है, लेकिन किसी समूह को अकारण चुनौती देने में कोई तुक नज़र नहीं आती। पंद्रह सालों के लंबे शासन में बहुत कुछ अच्छा और बहुत कुछ बुरा भी होता है और कांग्रेस पास इतने मुद्दे तो होंगे ही वो चाहे तो एंटी-इनकंबेंसी का अहसास जनता को करवा सकती है। इस काम में वर्तमान परिस्थितियों में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है, हालाँकि कांग्रेस अभी तक इस काम में पिछड़ती दिख रही है। सीमित लोगों से बातचीत में स्वाभाविक एंटी-इनकंबेंसी उतनी तीव्र नजर नहीं आती। देखना होगा इन परिस्थितियों का कांग्रेस कैसे फायदा उठायेगी?

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यह भी पूरी संभावना है कि चुनाव आते-आते मानव जीवन के मूल मुद्दे जैसे बेरोजगारी, कुपोषण, महिला अत्याचार, किसान आत्महत्या, कमजोर अधोसंरचना, अपराध, गरीबी, महंगी बिजली, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे कमजोर होते जायेंगे और धर्म, मंदिर, मस्जिद, जिन्ना, काश्मीर, पप्पू, फेंकू, इटली, राफेल, पाकिस्तान, चीन, घुसपैठिये जैसे मुद्दे सामने आएंगे, उन परिस्थितियों में मतदाताओं की प्रतिक्रिया कैसी होगी, यह तो सिर्फ 11 दिसंबर को ही पता चलेगा। हाँ, इतना तो तय है कि 2018 के विधान सभा चुनाव, 2008 और 2013 से अलग होंगे।