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निमोनिया के कारण हर घंटे हुई भारत में 14 से अधिक बच्चों की मौत : रिपोर्ट

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Ground Report । NewsDesk

निमोनिया (Pneumonia) के कारण वर्ष 2018 में 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौत के मामले में भारत दूसरे स्थान पर है। यह रोग अब सुसाध्य है और इससे बचाव भी संभव है, बावजूद इसके वैश्विक स्तर पर हर 39 सेकेंड में एक बच्चे की मौत होती है।

यूनीसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 में पूरे विश्व में निमोनिया से पांच वर्ष से कम उम्र के आठ लाख से अधिक बच्चों की मौत हुई। इस सूची में नाईजीरिया पहले, भारत दूसरे और पाकिस्तान तीसरे स्थान पर है। इस रोग का इलाज मौजूद है और इससे बचाव भी संभव है, बावजूद इसके वैश्विक स्तर पर हर 39 सेकेंड में एक बच्चे की मौत होती है।

भारत में 2018 में हर घंटे पांच साल से कम उम्र के 14 से अधिक बच्चों की मौत निमोनिया से हुई। यह जानकारी एक अध्ययन में सामने आई है।भारत उस वर्ष वैश्विक स्तर पर इस बीमारी के कारण होने वाली बच्चों की आधी से अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार शीर्ष पांच देशों में से एक है। ‘सेव द चिल्ड्रन’, यूनीसेफ और ‘एवरी बर्थ काउंट्स’ द्वारा किए गए अध्ययन- ‘भारत में सांस लेने की लड़ाई’- में कहा गया है कि निमोनिया से 2018 में पांच साल से कम आयु के 1,27,000 बच्चों की मौत हुई।

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1,53,000 बच्चों की मौत जन्म के पहले महीने में ही

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ) ने कहा कि पिछले वर्ष वैश्विक स्तर पर निमोनिया के कारण पांच वर्ष से कम उम्र के 8,00,000 से अधिक संख्या में बच्चों की मौत हुई या यूं कहें कि हर 39 सेकेंड में एक बच्चे की मौत हुई। निमोनिया के कारण जिन बच्चों की मौत हुई उनमें से अधिकतर की उम्र दो वर्ष से कम थी और 1,53,000 बच्चों की मौत जन्म के पहले महीने में ही हो गई।

रिपोर्ट के मुताबिक निमोनिया के कारण सर्वाधिक बच्चों की मौत नाईजीरिया में हुई। यहां यह आंकड़ा 1,62,000 रहा। इसके बाद 1,27,000 की संख्या के साथ भारत, 58,000 के आंकड़े के साथ पाकिस्तान, 40,000 के आंकड़े के साथ कांगो और 32,000 की संख्या के साथ इथोपिया है।

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रिपोर्ट में कहा गया है कि निमोनिया के कारण होने वाली मौत और गरीबी के बीच भी मजबूत संबंध है। पेयजल तक पहुंच, पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल नहीं होना और पोषण की कमी तथा भीतरी वायु प्रदूषण के कारण इस रोग का जोखिम बढ़ जाता है। निमोनिया के कारण होने वाली कुल मौत में से आधी की वजह वायु प्रदूषण है।