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दिल्ली में एक बंदर पकड़ने का रेट जान चौंक जाएंगे आप, करोड़ों का है बजट

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Ground Report | कोविड की दूसरी लहर से कराहती दिल्ली को निजात दिलाने के लिए रातों रात राधा स्वामी सत्संग आश्रम में बनाए गए कोविड केयर सेंटर में खंबों के ऊपर बंदर (Delhi Monkeys) की तस्वीर लगाई गई, तो ख़बर बन गई। क्या कोरोना के ईलाज में यह तस्वीरें काम आने वाली हैं? उत्तर है “नहीं”। यह तस्वीरें कोरोना मरीज़ों के ईलाज के लिए नहीं बल्कि मरीज़ों को बंदरों के आतंक से बचाने के लिए है। दरअसल जहां यह कोविड केयर सेंटर बनाया गया है, उसी के बगल में है 100 एकड़ में फैला असोला भाटी अभ्यारण जो दिल्ली के बंदरों का ठिकाना है। यहां से बंदर कूदकर कोविड केयर सेंटर आ गए हैं। अपना इलाज कराने नहीं, खाने की तलाश में।

राधा स्वामी सत्संग आश्रम कोविड केयर सेंटर में लगा बंदर का कटआउट

दिल्ली के बंदर

दिल्ली में बंदरों को पकड़ने (Delhi Monkey Catcher) और उनके पुनर्वास के लिए एक बहुत बड़ा तंत्र काम करता है और इसके पीछे एक दिलचस्प किस्सी भी है। जो आज हम आपको तस्दीक से बताने जा रहै हैं। दरअसल दिल्ली में बंदरों की समस्या एक ऐसी समस्या है जिसे बरसों से सुलझाया नहीं जा सका है। इसका पेंच भी दिल्ली सरकार और एमसीडी के बीच अटकती फाईलों के बीच फंसा हुआ है। एमसीडी कहता है कि यह काम दिल्ली सरकार का है तो दिल्ली सरकार कहती है एमसीडी का। इस असमंजस के पीछे कारण भी दिलस्चप है। दिल्ली सरकार कहती है कि बंदर एक आवारा पशु है। कुत्तों और बिल्लियों की ही तरह बंदरों को संभालने की ज़िम्मेदारी एमसीडी की है। वहीं दूसरी तरफ एमसीडी कहता है कि बंदर एक जंगली पशु है तो इसकी ज़िम्मेदारी दिल्ली सरकार के फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की है। इस पर कई कानूनी लड़ाईयां भी लड़ी जा चुकी है, लेकिन हल कोई नहीं निकल सका है। सरकारी टालमटोल के बीच बंदरों की टोली शहर में कूदफांद कर रही है। अब तक हज़ारों लोग बंदरों के हमले में घायल हो चुके हैं।

प्रतीक वत्स द्वारा निर्देशित फिल्म Eeb Allay Ooo! इस विषय पर गहरा प्रकाश डालती है। यह फिल्म आप नेटफ्लिक्स पर देख सकते हैं।

READ IN ENGLISH: Man Vs Monkey: Delhi’s Theater Of Absurd

पिछले एक दशक में 20 हज़ार से ज़्यादा बंदरों को पकड़कर (Delhi Monkey Catcher) असोला भाटी अभ्यारण में छोड़ा गया है। लेकिन अभी कितने बंदर यहाँ है इसका जवाब किसी के पास नहीं है। 2400 रुपये प्रति बंदर के हिसाब से बंदर पकड़ने वालों को पैसा दिया जा रहा है। 10 करोड़ से अधिक की राशि बंदरों के खाने पर खर्च की जा चुकी है। लेकिन समस्या अभी भी वहीं की वहीं है, जैसी 2007 में थी। दरअसल 2007 में शहर के डिप्टी मेयर पर बंदर ने हमला कर दिया था। इस हमले में उनकी मौत अपने घर की छत से गिरने से हो गयी थी। उसी साल हाईकोर्ट ने बड़ी उम्मीद से कहा था कि “3 महीने के भीतर दिल्ली बंदरों से मुक्त हो जाएगी”। आज 163 महीनों बाद भी दिल्ली प्रशासन का बंदर पकड़ने वाला खेल बदस्तूर जारी है।

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बंदर-बंदर सब करें, बंदर पकड़े न कोई

क्या आपको पता है कि दिल्ली में बंदरों को पकड़ने का जो रेट है वह देश में सबसे अधिक 2400 रुपए प्रति बंदर है। इसके बावजूद भी कोई यह काम करने को तैयार नहीं है। इसकी मुख्य वजह यह है कि जानवरों के अधिकारों पर काम करने वाली संस्थाएं, बंदर पकड़ने वालों पर कई तरह के केस दर्ज करवा देती हैं।

इन बंदरों को पकड़कर 100 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैली असोला भाटी एरिया में छोड़ दिया जाता है। यहां पर ज़्यादातर कीकर के पेड़ हैं जहां कोई फल नहीं उगता। ऐसे में बंदर कूदकर दोबारा आसपास की बस्तियों में आ जाते हैं। असोला भाटी में बंदरों के लिए भोजन की व्यवस्था न होने और अभ्यारण के आसपास कोई बाउंडरी या बाड़ न होने की वजह से आसपास की कॉलोनियों में बंदरों का आतंक रहता है। हालांकि फॉरेस्ट डिपार्टमेंट वाले कहते हैं कि वो बंदरो के लिए खाने का इंतज़ाम करते हैं। लेकिन बंदर तो बंदर है कूदकर निकल जाते हैं। दिल्ली में बंदरों के पुनर्वास के लिए खर्च किये जा रहे करोड़ों रुपए कुछ इसी तरह बेकार हो रहे हैं।

आज राधा स्वामी सत्संग आश्रम में मोहम्मद तस्लीम को बंदर पकड़ने के लिए बुलाया गया है। जहां लोग कोरोना की दूसरी लहर के डर से घरों में दुबके हुए हैं, वहीं तस्लीम को प्रशासन की असफल नीतियों की वजह से अपनी जान जोखिम में डालकर कोविड के मरीज़ों के बीच बंदर पकड़ने जाना पड़ रहा है।

आप सोच रहे होंगे की इतने आधुनिक युग में आखिर प्रशासन बंदरों को पकड़ (Delhi Monkey Catcher) क्यों नहीं पा रहा है? इसके पीछे जो सबसे बड़ी वजह है, वो यह है कि पशुओं के अधिकार (Animal Rights) के लिए काम करने वाली संस्थाएं लगातार इस काम पर नज़र रखती हैं। वो यह ध्यान रखती हैं कि बंदरों के पुनर्वास में किसी तरह की क्रूरता न की जाए। इसी कारण बंदरों को डराने के लिए इस्तेमाल होने वाली लंगूर की तस्वीर पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके इस्तेमाल को क्रूरता (Cruelty Against Animals) से जोड़ दिया गया।

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जानवरों के अधिकारों और संवेदनाओं की आधुनिक समझ ने रीसस बंदरों को भगाने के लिए इस्तेमाल होने वाली लंगूर की तस्वीर को तो बदल दिया। लेकिन बंदर पकड़ने वालों को तमाशे के भरोसे छोड़ दिया गया। मनुष्य बनाम इंसान के इस संघर्ष का अभी भी हमारे पास कोई समाधान नहीं है। हर साल इन बंदरों के हमले से हज़ारों लोग घायल हो जाते हैं। दूसरी तरफ बंदर खाने की तलाश में इंसान के बनाये कंक्रीट के जंगलों में भटकते रहते हैं।

कुछ तथ्य

  • दिल्ली में एक जंग इस बात को लेकर है कि बंदर एक जंगली जानवर है या आवारा।
  • 2015 में 1283 बंदर पकड़े गए थे और पिछले साल केवल 500 बंदर की पकड़े गए।
  • दिल्ली में बंदर पकड़ने का रेट 1200 से बढ़ाकर 2400 कर दिया गया है।
  • बंदरों को भगाने के लिए इस्तेमाल होने वाली लंगूर की तस्वीरों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसे पशुओं के प्रति क्रूरता माना गया है।
  • 2007 में बंदरों के हमले की वजह से दिल्ली के डिप्टी मेयर की मौत हो गयी थी।
  • अब तक बंदरों के पुनर्वास में 10 करोड़ से ज़्यादा राशि खर्च की जा चुकी है।
  • अब तक 20 हज़ार बंदरों के पुनर्वास किया गया है।
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