27 वर्षों से लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर रहे इस शख़्स को मिला पद्म श्री सम्मान

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एक पिता के लिए सबसे बड़ा दुख होता है उसके जवान बेटे का भरी जवानी में मर जाना । जवान बेटे की मौत से बाप की कमर टूट सी जाती है। एक बेटे की मौत बाप की हिम्मत तोड़ देती है। लेकिन अयोध्यावासी शरीफ चचा के जवान बेटे की मौत और फिर उसका लावारिस की तरह अंतिम संस्कार हो जाना, जो शरीफ़ चचा की संवेदनाओं को अंदर तक झकझोर गया। अपने इस ग़म के साथ वे मानवता की सेवा के ऐसे पथ पर चल पड़े, जो न सिर्फ दूसरों के लिए नज़ीर बनी बल्कि औरों के लिए प्रेरणा भी। ये हमारे समाज के लिय अनेकता में एकता की एक अच्छी मिसाल है।

5500 सौ लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं शरीफ चचा

भारत सरकार की ओर से इस साल के पद्म पुरस्‍कारों के लिए की गई घोषणा में अयोध्या के मोहम्मद शरीफ (80) का नाम भी शामिल है। मोहम्मद शरीफ पिछले कई सालों से बिना किसी प्रकार के धार्मिक भेदभाव के लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं । शरीफ़ चचा के इस शानदार और साहसी क़दम से प्रभावित होकर सरकार ने उनको गणतंत्र दिवस पर पद्मश्री से सम्मानित किया। शरीफ़ चचा को इस सम्मान मिलने पर आयोध्या के लोगों मे भी ख़ुशी का इज़हार किया और शरीफ़ चचा की जमकर तारीफ़ की।

साल 1993 में शरीफ़ चचा के जवान बेटे मुहम्मद रईस दवा लेने के लिए सुलतानपुर गए थे, जहां उनकी हत्या कर दी गई थी। बेटे की खोज में शरीफ कई दिनों तक इधर-उधर भटकते रहे। रिश्तेदार, मित्रों और तमाम जगहों पर खोजने के बाद भी शरीफ को अपने बेटे का कोई सुराग नहीं मिला। करीब एक माह बाद सुलतानपुर से खबर आई कि बेटे की मौत हो गई और अंतिम संस्कार लावारिसों की तरह हुआ। रईस की पहचान उनकी शर्ट पर लगे टेलर के टैग से हुई थी। टैग से पुलिस ने टेलर की खोज की और कपड़े से शरीफ ने मृतक की पहचान अपने बेटे के रूप में की। जवान बेटे की मौत ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया।

जवान बेटे की मौत के बाद लिया ये संकल्प

शरीफ़ चचा जवान बेटे के ग़म से टूटे नहीं बल्कि उन्होने एक नया संकल्प लिया। संकल्प यह कि अब अयोध्या की धरती पर किसी भी शव का अंतिम संस्कार लावारिस की तरह नहीं होगा। न हिंदू, न मुस्लिम, न सिख और न ही ईसाई। शरीफ ने शपथ ली कि वे हर लावारिस शव का अंतिम संस्कार करेंगे और मृतक के धर्म के रीति-रिवाज के अनुसार। 27 वर्षों में करीब 5500 सौ लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हें। शरीफ़ चचा अब तक हिंदुओं के 3000 और मुसलमानों के 2500 शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं।

पेट के कैंसर से जूझते इस शख्स ने भूखों को खाना खिलाने में जीवन बिता दिया

शरीफ के बड़े बेटे मोहम्मद सगीर ने कहा कि उनकी इस मानवीय कार्य को वह और उनका परिवार आगे बढ़ाएगा। यह काम उनके बाद भी नहीं रुकेगा। हमारा परिवार उनको पद्मश्री से सम्मानित करने पर बेहद खुश हैं। अब तक वह चार हजार से अधिक लावारिश शवों का अंतिम संस्कार करवा चुके हैं। यह कार्य आम लोगों के आर्थिक सहयोग से वह पूरा कर पा रहे हैं। वे सभी बधाई के पात्र हैं, जो उनके इस पवित्र कार्य में सहयोगी बनते रहें हैं।