मोदी सरकार की शिक्षा विरोधी नीतियां?

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ग्राउंड रिपोर्ट | न्यूज़ डेस्क

मोदी सरकार ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में युवा पीढ़ी की शिक्षा के लिए अब तक का सबसे कम बजट दिया है. यूपीए सरकार के अंतिम वर्ष 2013-14 में शिक्षा के क्षेत्र पर केंद्रीय बजट का 4.77 प्रतिशत ख़र्च किया जाता था. वहीं, मोदी सरकार के सत्ता मे आने बाद 2018 तक शिक्षा के बजट में ज़बरदस्त गिरावट आई और 2019-20 में यह 3.4 पर पहुंच गया.

क्या शिक्षा में हो रही भारी कटौती के पीछे मोदी सरकार द्वारा भारतीय उच्च शिक्षा को एक बिक्री योग्य सेवा बना देने के WTO से किए गए वादे पर चल रही है. भारत सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के  विश्वविद्यालयों को दी जा रही सब्सिडी और फंड में भारी कटौती की है. जिसके चलते ही आज देश भर के शैक्षणिक संस्थान फंड की कमी झेल रहे हैं और आम छात्रों पर भारी फीस वृद्धी थोपी जा रही है.

डाटा चार्ट क्रेडिट- Indiaspend

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एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 3 वर्षों में  विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की संख्या में करीब 2.34 लाख की कटौती की गई है. शिक्षा और कौशल विकास के लिए नीतियां निर्धारित करते समय नीति आयोग इस बात का ज़िक्र नहीं करता कि “60 प्रतिशत बच्चे दसवीं कक्षा तक आते-आते स्कूल छोड़ देते हैं”. (रमेश पटनायक) वहीं सरकार सार्वजनिक स्कूलों को बंद या विलय करने के रास्ते पर तेज़ी से बढ़ रही है. अकेले झारखंड में ही 6000 स्कूलों को बंद या विलय किया जा चुका है.

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 विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम को हटाकर सरकार द्वारा प्रस्तावित भारतीय उच्च शिक्षा आयोग अधिनियम 2018 एचईसीआई को मानकों पर खरे न उतरने वाले  विश्वविद्यालयों को बंद करने का अधिकार दे देगा. एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 18 से 23 साल के हर 100 लोगों में से मात्र 25.8 लोग ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं. वंचित तबकों में तो सकल नामांकन अनुपात और भी कम है. अनुसूचित जातियों के लिए यह 21.8 है और अनुसूचित जनजातियों के लिए यह 15.9 ही है.

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मुस्लिम अल्पसंख्यक आबादी, जो देश की आबादी का 14.2 फीसद है, में से महज़ 5 फीसदी ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं. शोध के क्षेत्र में डरावने आंकडे प्रस्तुत करते हुए यह रिपोर्ट खुलासा करती है कि उच्च शिक्षा के लिए नामांकन करने वाले छात्रों में से महज़ 0.5 फीसदी छात्र ही पीएचडी के लिए नामांकन कर पाते हैं. अगर बात शिक्षा बजट को आवंटित राशि की करें तो  वर्ष 2014-15 में यह 38,600 करोड़ थी. जो अब वर्ष 2018-19 में घटकर 37,100 करोड़ हो गई.

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राज्यों ने स्कूली शिक्षा पर खर्च किए गए धन के हिस्से को कम कर दिया है. जबकि सरकारी राजस्व में भी वृद्धि हुई है. उदाहरण के लिए, शिक्षा पर खर्च करने के मामले में केरल की हिस्सेदारी 2012-13 में कुल सार्वजनिक व्यय के 14.45% से घटकर 2019-20 में कुल राज्य बजट का 12.98% हो गई, जबकि इसके राजस्व में वार्षिक वृद्धि दर 12.8% थी.

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यह विस्तृत रिपोर्ट आप Indiaspend.com पर पढ़ सकते हैं। यह लेख इण्डिया स्पेंड की रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों पर आधारित है।