Home » Mirza Ghalib : मिर्ज़ा ग़ालिब के 10 चुनिंदा शेर

Mirza Ghalib : मिर्ज़ा ग़ालिब के 10 चुनिंदा शेर

Mirza Ghalib
Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Mirza Ghalib Birth Anniversary : आज मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ की जयंती है। वह 27 दिसंबर, 1797 को उत्तर प्रदेश के आगरा ज़िले में पैदा हुए थे। उनका पूरा नाम मिर्ज़ा असद उल्लाह बेग ख़ान था और शुरुआत में वह ‘असद’ तख़ल्‍लुस यानी उपनाम रखते थे, मगर बाद में ‘ग़ालिब’ रख लिया।

Mirza Ghalib ‘ग़ालिब’ के अल्फ़ाज़ चाहें उनकी ज़बान से निकले हों या खत में पिरोए गए हों, अपनी मिठास के साथ लुत्फ छोड़ ही देते हैं। अदबी तारीख़ में ऐसा कोई वक़्त और ऐसा कोई अहद नहीं गुज़रा जब ग़ालिब को शुमार किए बग़ैर उर्दू शाइरी पर कोई बात की जा सके। आइये उनके कुछ बेहतरीन शेर हम आपकी नज़र कर रहे हैं।

ग़ालिब के 10 चुनिंदा शेर

नश्व-ओ-नुमा है अस्ल से ‘ग़ालिब’ फ़ुरूअ को
ख़ामोशी ही से निकले है जो बात चाहिए

मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

ये कहां की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता

हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूं न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता


ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तेरा बयान ‘ग़ालिब’
तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता

Ground Report के साथ फेसबुकट्विटर और वॉट्सएप के माध्यम से जुड़ सकते हैं और अपनी राय हमें Greport2018@Gmail.Com पर मेल कर सकते हैं।

जौन एलिया

जौन एलिया : यूपी के अमरोहा में जनमा वो दरवेश, जो नीत्शे और कांट से बातें करता था