मज़दूरों की रुला देने वाली तस्वीरें: ये आंसू गवाह हैं, हमारे गुनाहों के…

Migrant Labours on Road
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विचार । पल्लव जैन

बंटवारे के बाद देश ने सबसे बड़ा विस्थापन लॉकडाउन में देखा है। रोज़ी रोटी छिन जाने के बाद लौट पड़ा मज़दूर अपने गांव अपनी ज़मीन की तलाश में। पैदल चलता रहा, पैरों में छाले पड़ गए लेकिन रुका नहीं, रास्ते में अपनों को खो दिया। कोई गोदी में अपनी बूढ़ी मां को लिए चला तो कोई कोख में अपने बच्चे को लेकर। पैरों में छाले पड़ गए, बिन पानी गला सूख गया लेकिन वह चलता रहा इस उम्मीद में की मरेंगे तो अपनी ज़मीन पर। घर की तलाश में निकला मज़दूर मजबूर था, यह उसका मानव स्वभाव नहीं था। हज़ारों किलोमीटर वह पैदल चला क्योंकि उसे किसी पर भरोसा नहीं था, भरोसा था तो केवल अपने पैरों पर। थक कर सोया तो रेल से कट कर मर गया। हाथों में अपना नसीब लिए वह चलता रहा। उसके चेहरे की लाचारी, बेबसी गवाह है हमारे नकारेपन की। हम रईसों को हवाई जहाज से ढोते रहे और गरीबों को हमने छोड़ दिया सड़क पर पैदल चलने को। नन्हें बच्चें जिन्हें होना था मां के आंचल की छांव में सो गए तपती दोपहरी में सड़क पर। हमारा सिस्टम सोता रहा…एयरकंडीशन कमरों में। यह तस्वीरें गवाह हैं कैसे हमारा सिस्टम आज भी उस गरीब के बारे में नहीं सोचता जो अपनी मेहनत से इस देश की रगों में खून प्रवाहित करता है…

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