जिन मजदूरों ने बिछाई रेलवे की पटरियां, सरकार ने उन्हें ही ट्रेन में बैठने न दिया

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Ground Repot | News Desk

कोरोना के कारण लगभग दो महीने चल रहा लॉकडाउन सबसे अधिक प्रवासी मज़दूरों के लिए जानलेवा साबित हुआ । लाखों की संख्या में मज़दूर शहरों से अपने-अपने गांव को पैदल लौट रहे हैं । देश भर से प्रवासी मज़दूरों की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं उनको देख कर किसी भी पत्थर दिल इंसान की भी आंख नम हो जाए ।

भारत के पास दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। देश के कोने-कोने में पटरियों का जाल बिछा हुआ है । भारत विश्व में अहम स्थान रखने वाली अर्थव्यवस्था है। इस व्यवस्था की रीढ़ अब भी खेती और असंगठित क्षेत्र है। इन क्षेत्रों में काम करने वाले लोग, रेल की पटरियां बिछाने वाले लोग इतिहास का सबसे भयावह पलायन झेल रहे हैं। यह व्यवस्था मूक दर्शक बनी उन्हें देख रही है।

शहरों से सैकड़ो किलोमीटर पैदल चल कर अपने-अपने घरों को लौट रहे मज़दूरों के सीने पर वही रेल चढ़ जाती है जिसकी पटरियां भी मज़दूरों ने बिछाई हों । कोई भूख से मर रहा है तो कोई थकान और कमज़ोरी से । जीने की आस लिए लौट रहे मज़दूरों पर कभी ट्रक चढ़ जाता कभी ट्रेन । सरकार ने इन मज़दूरों की वापसी के लिए कुछ ट्रेनों का संचालन तो किया मगर बहुत देरी से ।

जो इंतेज़ाम सरकार मेट्रो और एयरपोर्ट के लिए कर रही वैसा रेलवे के लिए नहीं कर रही । मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जल्द ही सरकार डोमेस्टिक उड़ानों को चालू करने जा रही है । एयरपोर्ट पर थर्मल स्क्रीनिंग के साथ कोरोना से बचने के लिए सभी तरह सेफ्टी मानकों को लगाया जाएगा । मगर क्या इन जहाज़ों से प्रवासी मज़दूर महंगा किराया देकर अपने घर या गांव पहुंच पाएंगे? सरकार का सभी तरह की एक्सप्रेस ट्रेनों को रद्द करके राजधानी और प्रीमियम ट्रेनों को चलाने का मतलब कि सरकार ग़रीबों से ज़्यादा सरकार को अमीरों और पूंजीपतियों की चिंता है ।

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हालही में, महाराष्ट्र के औरंगाबाद में ट्रेन की पटरी पर सो रहे 16 मज़दूरों की माल गाड़ी से कट कर मौत हो गई थी । ये मज़दूर पटरी-पटरी पैदल अपने घरों को लौट रहे थे । पैदल चलने का कारण थक गए और उसी पटरी पर सो गए । थकान से चूर मज़दूर इतना गहरी नींद में चले गए कि उन्हें होश ही न रहा और उनके ऊपर से ट्रेन गुज़र गई । इस दर्दनाक घटना के बाद मज़दूरों की मौत का सिलसिला यहीं नहीं रुका ।

सड़कों पर दम तोड़ रहे मज़दूर

उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के समीप दिल्ली-सहारनपुर राजमार्ग पर तेज गति से आ रही एक बस से कुचलकर छह प्रवासी मजदूरों की मौत हो गई और पांच अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। एसएसपी अभिषेक यादव ने गुरुवार को बताया कि आरोपी चालक को गिरफ्तार कर लिया गया है। ऐसा शक है कि उसने शराब पी रखी थी। अधिकारी ने बताया कि ये मजदूर हरियाणा से चले थे और बिहार में अपने घर पैदल जा रहे थे जब बुधवार देर रात यहां से करीब 20 किलोमीटर दूर घलीली जांच चौकी और रोहाना टोल प्लाजा के बीच दिल्ली-सहारनपुर राजमार्ग पर वे बस की चपेट में आ गए।

वहीं, चित्रकूट के बरगढ़ थाना क्षेत्र में कलचिहा गांव के पास एक ट्रक ने सड़क किनारे बैठे चार प्रवासी मजदूरों को टक्कर मार दी, जिसमें एक मजदूर की मौत हो गई।पुलिस के मुताबिक सभी मजदूर पानी पीने के लिए मंगलवार शाम बरगढ़ क्षेत्र के रीवा मार्ग पर कलचिहा गांव के पास सड़क किनारे बैठ गए थे, तभी इलाहाबाद की ओर से आ रहे तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी। ये सभी मजदूर छत्तीसगढ़ के रायपुर से साइकिलों पर सवार होकर सहारनपुर और मुजफ्फरनगर जिलों में स्थित अपने-अपने घर लौट रहे थे।

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इसके साथ ही मध्य प्रदेश में गुना के पास गुरुवार तड़के करीब दो बजे एक बस और ट्रक की टक्कर से ट्रक में सवार आठ प्रवासी श्रमिकों की मौत हो गई और बस चालक समेत लगभग 54 घायल हो गये। 65 प्रवासी श्रमिकों से भरी ट्रक महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जा रही थी। जबकि बस यात्रियों को छोड़ने के बाद भिंड से अहमदाबाद लौट रही थी। पुलिस ने बताया कि हादसा गुरुवार तड़के गुना के पास हुआ जब प्रवासी श्रमिक महाराष्ट्र से एक ट्रक से उत्तर प्रदेश जा रहे थे।

इसी तरह देश भारत में कोरोना वायरस के चलते जारी लॉकडाउन के कारण 300 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं । THEJESH GN नामक एक वेबसाइट ने भारत में लॉकडाउन के कारण अपनी जान गंवाने वालों पर एक रिपोर्ट तैयार करते हुए विस्तार से बताया है कि पूरे भारत में कोरोना से निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के कारण 300 से अधिक लोगों की जान गई है । इन सभी मौतों का कारण कोरोना नहीं बल्कि कोरोना के कारण लगा लॉकडाउन रहा ।

लॉकडाउन के कारण 300 से अधिक लोगों की हुई मौत

THEJESH GN की रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर मौत के मामलों में जो कारण सामने आए, वे भूख, वित्तीय संकट, लॉकडाउन के कारण नौकरी जाने के बाद डिप्रेशन, शहरों से अपने गांव लौट रहे मज़दूरों की थकान और भूख से मौत , पुलिस उत्पीडन, मेडिकल सुविधा न मिल पाना है । इन सभी लोगों में सबसे ज़्यादा ग़रीब मज़दूर है जो लॉकडाउन के कारण शहरों से पैदल अपने घर को लौट रहे हैं ।

लॉकडाउन के कारण 300 से अधिक लोगों की हुई मौतों पर न तो सरकार ने ध्यान दिया और न ही मीडिया ने । अगर सरकार के लिए कोरोना से लड़ने का एक मात्र विकल्प लॉकडाउन ही था तो सरकार को लॉकडाउन से पहले देश के सबसे ग़रीब और कमज़ोर वर्ग के बारे में सोचना चाहिए था । 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 40 करोड़ लोग भारत की कुल आबादी का लगभग 37 प्रतिशत प्रवासी मज़दूर है जो शहरों में रोज़ी रोटी के लिए बसा हुआ है । जिनकों हम आज-कल गरीब मज़दूर के नाम से जान रहे हैं ।

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सरकार ने देश के कमज़ोर वर्ग को मरने के लिए छोड़ दिया

यदि भारत सरकार के लिए कड़ा लॉकडाउन ही एकमात्र विकल्प था, तो कम से कम यह किया जा सकता था कि आबादी के सबसे कमजोर वर्गों के लिए बेहतर योजना बनाई जा सके। ये लॉकडाउन से जुड़ी मानवीय त्रासदी के पैमाने को दर्शाता हैं। अब हम लॉकडाउन के तीसरे चरण में है । इस नुकसान को स्वीकार करने और इस मानवीय संकट को दूर करने के लिए सक्रिय कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है।

विश्व स्वास्थ संगठन WHO ने साफ कहा है कि लॉकडाउन कोरोना से लड़ने के लिए एक मात्र रास्ता नहीं है । कोरोना की रोकथाम में सबसे अहम रोल है टेस्टिंग करना । मगर भारत में टेस्टिंग की चाल किसी कछुए की तरह चल रही है । भारत जैसा देश लंबा लॉकडाउन के लिए सक्षम नहीं है। कोरोना के मामले लगातार तेज़ी से बढ़ रहे हैं । सरकार भी जानती है कि वो लॉकडाउन को चाह कर भी लंबा नहीं ले जा सकती है ।

खजाना भरा है। बैंक लुट रहे हैं। लाख करोड़, हजार करोड़ का जुमला फेंका जा रहा है ताकि जनता को लगे कि बहुत कुछ हो रहा है। लेकिन हो क्या रहा है? लाखों की संख्या में बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग, गर्भवती मांएं, नौजवान, सब पलायन को मजबूर हैं। इसलिए कि उन्हें रोटी नहीं मिल रही थी।

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