वे नाव भेजेंगे, जब बाढ़ का पानी उतर चुका है!

Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Priyanshu | Opinion

चुपचाप उनकी दुनिया डूब रही थी, वे डूब रहे थे, उनके बच्चे डूब रहे थे, कई पेट से थीं, कई पेट में थे। जो बचाए जा सकते थे, भूख से, थकान से और रेल के नीचे आकर जो कट गए। तब सब तरफ पानी था…पानी ही पानी… सिवाय उन आंखों के, जिन्हें असंख्य आंखें, जाने किस उम्मीद में टकटकी ताने देख रही थीं।

16 मजदूर हाइवे पर मर गए, 16 ट्रेन की पटरी पर। उनसे कहा गया कि कुछ कीजिए, जवाब मिला- “इस मामले में सरकारों को काम करने दिया जाए। लोग सड़क पर जा रहे हैं। पैदल चल रहे हैं। नहीं रुक रहे तो हम क्या कर सकते हैं?”

घटना को दो महीने बीत चुके हैं। लोग भूल रहे थे तभी हफ्ताभर पहले “हम क्या कर सकते हैं” दिखाई दिए, गंभीर मुद्रा में, उनके लिए चिंतित जो पलटकर “हम क्या कर सकते हैं” की ही चिंता करने लगे थे। चिंता…उनकी चुप्पी की, उनके इरादों की, संवेदनाओं की।

मंगलवार को उन्होंने मदद के लिए नाव भेजने का वादा किया है, तब जब बाढ़ का पानी उतर चुका है। जिन्हें जिस ठिकाने लगना था, लग गया। जिनकी दुनिया डूबनी थी, डूब चुकी और जिन्हें नहीं मरना था, वह भी मर गए। हां, जो किसी तरह बच गए, हुकूमतें उनके लिए व्यवस्था में जुट गई हैं। व्यवस्था….चमड़ी और चार घंटा खींचने की।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक नई दिल्ली स्थित भारतीय जन संचार संस्थान के पूर्व छात्र हैं और अमर उजाला, पत्रिका जैसे संस्थानों में काम कर चुके हैं।)