Home » क्या प्रवासी मज़दूरों की समस्याएं तय करेंगी बिहार का राजनीतिक भविष्य?

क्या प्रवासी मज़दूरों की समस्याएं तय करेंगी बिहार का राजनीतिक भविष्य?

Daily Wage Labours Stranded in Pune
Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

नैनिका | नई दिल्ली

पूरा विश्व आज एक विशाल मानवीय संकट से जूझ रहा है। चीन के वुहान प्रान्त में उत्पन एक नए वाइरस, जिस को विश्व स्वास्थ्य संगठन कोविद-19 नाम दिया है, ने पूरी दुनिया में तबाही मचा कर के रख दी है। हर देश आज इसकी चपेट में आ गया है और कई लोगों ने इसके चलते अपनी जान गंवा दी है। इस वाइरस की प्रसार क्षमता बहुत ही तीव्र है जिस कारण से यह वाइरस इस वैश्वीकरण के दौर में विश्व के कई देशों में बहुत ही आसानी से पहुँच गया है। भारत में बहुत जल्द ही इस वाइरस का प्रसार होने लगा था अत: बाध्य होकर केंद्र सरकार को पहले जनता कर्फ़्यू और बाद में देशव्यापी लॉकडाउन (लॉकडाउन) की घोषणा करनी पड़ी। बिना किसी रोडमैप एवं पूर्व तैयारी किये लॉकडाउन की घोषणा से इसका प्रभाव सभी क्षेत्रों और सभी वर्गों पर बहुत बुरा पड़ा है। आरम्भ में इस् लॉकडाउन के प्रभाव के  आकलन का केंद्र सिर्फ़ स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था तक ही सीमित था, लेकिन लॉकडाउन 2.0 के दौरान विभिन्न राज्यों में बंद कारख़ानो, छोटे, लघु, मध्यम फ़ैक्टरी एवं आर्थिक क्षेत्रों के दूसरे क्षेत्रों में काम का ठप हो जाने से एक मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर उभर आया है, वह मुद्दा है प्रवासी मज़दूरों का।

असंतुलित विकास के कारण मजबूरन पलायन
असंतुलित विकास के कारण देश के पिछड़े राज्यों से लोगों को उन राज्यों में मजबूरन पलायन करना पड़ता है जहां रोजगार के अच्छे अवसर मौजूद हैं, और इन्ही प्रवासियों को प्रवासी मजदूर कहा जाता है। लॉकडाउन की मार देखा जाए तो सबसे ज्यादा इन्ही लोगों पर पड़ी है। प्रवासी मज़दूरों की बेरोज़गारी की समस्या और उनके घर लौटने में हो रही कठिनाई को लेकर विभिन्न राज्यों में यह मुद्दा अभी राजनीति का केंद्र बिंदु है। ऐसा पहली बार हुआ है की मज़दूरों की समस्या एवं उनका मुद्दा राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर राजनीति के परम्परागत विषय को पीछे छोड़ते हुआ अपनी जगह बना रहा है, साथ ही साथ सरकार को अपनी ताक़त का एहसास दिला रहा है। बिहार के संदर्भ में मज़दूरों के मुद्दे पर हो रही राजनीति का उल्लेख कारण आवश्यक इसलिए है क्योंकि भारत में प्रवासी मज़दूरों का एक बड़ा हिस्सा बिहारी प्रवासी मज़दूरों का है और बिहार की सरकार इन मज़दूरों को बिहार वापस लाने के लिए अभी तक कोई ठोस नीति नहीं बना पा रही है जिस कारण से विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से भुनाने में लगी  हुई हैं । मज़दूरों की इन सभी मुद्दों पर हो रही राजनीति, इस राजनीति का विषय वस्तु एवं बिहार के वर्तमान राजनीतिक हालात को शोध छात्रा नैनिका ने रेखांकित किया है।

READ:  Covid19 Vaccination: 18 वर्ष से अधिक उम्र के सभी लोगों को लगेगा Coronavirus का टीका

बिहार के राजनीतिक क्षितिज पर प्रवासी मज़दूरों के मुद्दों का उभरना
यह भी एक गंभीर विडंबना है कि मज़दूरों का मुद्दा एवं उनकी समस्या आज़ाद भारत की अब तक कि राष्ट्रीय राजनीति एवं क्षेत्रीय राजनीति में प्रमुखता से कभी जगह नहीं बना पाया है, जबकि इस देश में विभिन्न मज़दूर संगठन स्वतंत्र रूप से या किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ कर कई दशकों से सक्रिय हैं। भारतीय राजनीति में जाति, धर्म, राष्ट्रवाद, आरक्षण, किसान/पाकिस्तान का मुद्दा, असम्भव वादों की घोषणा इत्यादि प्रमुखता से हावी रही है लेकिन मज़दूरों का मुद्दा बिलकुल ही जगह नहीं बना पाया, ना ही कभी राष्ट्रीय और न किसी राज्य के चुनाव में। लेकिन अब परिसतिथियाँ बदलती हुई दिखाई दे रहीं हैं। लॉकडाउन  से उत्पन्न हालात में मज़दूरों की समस्या और सोशल मीडिया द्वारा इन समस्याओं की जानकारी का सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचने के कारण यह मुद्दा वर्तमान में राष्ट्रीय राजनीति सहित विभिन्न राज्यों की राजनीति में अपनी जगह बनाने में सक्षम होता दिखाई दे रहा है । भारत में लॉकडाउन 2.0 के दौरान आर्थिक कार्यकलाप के बंद हो जाने से बेरोज़गार हुए प्रवासी मज़दूरों की समस्या ने बिहार की वर्तमान राजनीति को भी प्रभावित किया है।

घर वापसी के लिए करीब 40 लाख मजदूरों ने कराया पंजीयन
तक़रीबन 40 लाख मज़दूरों ने बिहार लौटने के लिए गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना एवं दिल्ली इत्यादि राज्यों में पंजीकृत कराया है। प्रवासी मज़दूरों के संदर्भ में बिहार का उल्लेख बहुत आवश्यक इसलिए भी हो जाता है क्योंकि लॉकडाउन ने बिहार में मौजूद कई आधारभूत समस्याओं और उनके विकास को लेकर हुए दावों की परत खोल कर रख दी है। 2005 से बिहार में लालू प्रसाद के तथाकथित ‘जंगल राज’ को उखाड़ फेंकते हुए भारतीय जनता पार्टी के साथ मिल कर नीतीश कुमार की सरकार ने ‘सुशासन’ के नाम पर शासन आरम्भ किया और वर्तमान में भी उनकी ही सरकार है। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया के सामने अपराध पर नियंत्रण, महिला सशक्तिकरण, बिहार की आर्थिक विकास दर को दहाई अंको में रख कर विभिन्न रोड्मैप इत्यादि के द्वारा सुशासन का नया कॉन्सेप्ट देश और बिहार की जनता के सामने रखा। बिहार अपने आर्थिक विकास के लक्ष्य को साधने में कुछ हद तक तो सफल रहा है लेकिन उसका आर्थिक विकास समावेशी नहीं हो पाया जिसके परिणामस्वरूप बिहार से लोगों का रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन नहीं रुका। यही कारण है की बिहार सरकार ने हमेशा से मज़दूरों के पलायन की समस्या एवं उनकी वास्तविक संख्या को छुपा कर रखा है।

READ:  जिसके हम मरने की दुआ मांगते थे वो आज संकट में हमारे साथ खड़ा है

पलायन रोकने के लिए सरकार के पास कोई नीति नहीं
बिहार सरकार ने पलायन को कम करने या रोकने के लिए कोई नीति नहीं बनाई है, जिसका नतीजा आज लॉकडाउन के दौरान बिहारी प्रवासी मज़दूरों की विभिन्न समस्याओं के रूप में उभर कर आ रहा है। लॉकडाउन के कारण ही प्रवासी मज़दूरों के मुद्दे नें प्रमुखता से बिहार की राजनीति में जगह बनाई है। ज्ञात रहे कि इसी साल अक्टूबर-नवम्बर माह में बिहार में विधान सभा का चुनाव है, इसलिए सभी राजनीतिक पार्टियाँ, चाहे वो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, प्रवासी मज़दूरों के मुद्दों को नज़र अंदाज करने की हिम्मत नहीं कर सकती हैं । चूंकि विभिन्न राज्यों में फँसे प्रवासी बिहारी मज़दूर अपने घर लौटना चाहते हैं, इसलिए गृह मंत्रालय ने कुछ शर्तों के साथ उनको ऐसा करने की अनुमति प्रदान की  है। चिंता की बात यह है कि लॉकडाउन के तीसरे दौर के आरम्भ तक भी बिहार सरकार ने कोई दूरदर्शिता नहीं दिखाई, अत: मज़दूरों से सम्बंधित कई प्रमुख समस्याएं  उभर आयी हैं।  उदाहरणस्वरूप मज़दूरों के लौटने की समस्या, मज़दूरों के पास सही जानकारी नहीं पहुँच पाने की समस्या, जिन मज़दूरों के पास कैश नहीं है उनको कैश हस्तांतरण करने की समस्या, जब मज़दूर वापस आ रहे हैं या जो आने वाले है उनका क्वॉरंटीन करने की समस्या, क्वॉरंटीन में सुविधा का अभाव इत्यादि। इस बीच सरकार ने अपने कुछ विधायको, अफसरो और मंत्रीयों को अपने बेटा-बेटी एवं अन्य रिश्तेदार को लाने के लिए सरकारी पास जारी कर दिया। सरकारी पास कुछ ख़ास लोगों को देने से एक नई बहस बिहार की राजनीति में छिड़ गई है।

प्रवासी मजदूरों का मुद्दा बिहार की राजनीति तक सीमित नहीं
हालाँकि रेल मंत्रालय ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाने की घोषणा की है लेकिन रेल टिकट किराया के भुगतान को लेकर अभी विवाद बना हुआ है। और तो और, सूत्रों के अनुसार बिहार सरकार ने ट्रेन टिकट की लागत को सरकारी ख़र्चे से भुगतान करने से इनकार कर दिया है। ट्रेन टिकट के किराए  को लेकर बिहार की राजनीतिक सियासत गरमा गई है। एक तरफ बिहार की प्रमुख विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने मजदूरों के लिए चलाई जा रही 50 ट्रेनों  का किराया पार्टी फंड से देने की घोषणा कर दी है तो दूसरी तरफ़ कांग्रेस ने भी सम्पूर्ण ट्रेन के किराए का भुगतान पार्टी फ़ंड से देने की घोषणा कर दी है। साथ ही साथ सत्ता पक्ष के कई विधायक खुल कर अपनी ही सरकार की इस  मुद्दे पर भरपूर आलोचना कर रहे हैं जिस कारण से बिहार की राजनीति में एक नई सरगर्मी सी आ गई है। याद रहे 2020 के अक्टूबर-नवम्बर माह में विधान सभा का चुनाव भी होने वाला है इसलिए एक तरफ़ विपक्षी पार्टियाँ इस मुद्दे को अपना चुनावी मुद्दा बनाने में लगा है तो दूसरी तरफ़ सत्तापक्ष के विधायक-मंत्री भी जनता से डरे हुए है, ख़ास कर मज़दूर वर्ग से। इसलिए ये लोग अपनी ही सरकार की नीति का खुल कर विरोध कर रहे है। मज़दूर वर्ग और विपक्षी पार्टीयो के दबाव में आकर ही इस सिलसिले में 6 मई 2020 को बिहार सरकार को कई घोषणाएं करनी पड़ी, परंतु फिर भी मज़दूर वर्ग की बहुत सारी समस्याओं का निदान नहीं हो पाया है। बिहार चुनाव में प्रवासी मज़दूरों का मुद्दा प्रमुखता से जगह बना पता है या नहीं और इसका चुनावी नतीजे पर प्रभाव क्या होगा यह तो बाद की बात है, लेकिन वर्तमान में मज़दूर वर्ग के मुद्दा का भारतीय राजनीति में उभर कर आना लोकतन्त्र के लिए शुभ संकेत है। बिहार के प्रवासी मज़दूरों से उभरा यह मुद्दा बिहार की राजनीति तक ही नहीं सीमित रहेगा बल्कि इसके दूरगामी परिणाम होंगे।

READ:  Oxygen and Plasma Donor in Kanpur: कानपुर में ऑक्सीजन सिलेंडर कहां मिलेगा?

(लेखिका भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा में शोध छात्रा हैं।)