‘जनता को इतना निचोड़ दो की जिंदा रहने को ही विकास समझे’

migrant labor facing problem lockdown and bad management of the system in india
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Komal Badodekar | New Delhi

कोरोना वायरस और लॉकडाउन की मार अगर सबसे ज्यादा किसी पर पड़ रही है तो वो है गरीब तबका। एक ऐसा तबका जो कभी विदेश नहीं गया। अचानक हुए लॉकडाउन में जहां था वहीं फंस गया। न खाने को है न पीने को सरकारी वादे हर दिन उम्मीद जगाते हैं लेकिन शाम होते-होते ढलते सूरज के साथ उम्मीदें भी अंधेरा होने लगती है। न काम है, न रोटी और न ही कोई सरकारी मदद। पहले अचानक हुई नोटबंदी और अब अचानक हुआ लॉकडाउन। न मैनेजमेंट न व्यवस्था न कोई प्लान। बस गरीब मजदूरों की मौतों गिनती। सड़कों पर भूखे-प्यासे सैकड़ों किलोमीटर तपती धूप में अपने घर तक पैदल ही चलने को मजदूर। रास्ते में पुलिस की गालियां और लाठियां, बुरा बर्ताव।

वर्तमान हालातों को देखें तो एक लाइन याद आती है, ‘जनता को इतना निचोड़ दो की जिंदा रहने को ही विकास समझे’। विदेश में फंसे भारतीयों को हवाई जहाज से रेस्क्यू किया जा रहा है लेकिन गरीब मजदूरों के लिए चलाई जा रही नाम मात्र की रेलगाड़ियों में भी उनसे अब टिकट के पैसे वसूले जा रहे हैं। हालात अब ऐसे हो रहे हैं कि बस जैसे अब प्रदर्शन करना ही बाकी रह गया है। कर भी रहे हैं। गुजरात का एक वीडियो देखा जिसमें गरीब मजदूर महिलाएं पैदल रैल की पटरी से गुजर रही है वहां पुलिस रेल की पटरी पर चलने के लिए घूंस लेती साफ नजर आ रही है। ये दृश्य किसी हिटलरशाही से कम नहीं। बेबसी के इस दौर में भी घूंसखोरी… क्या करें साहब शर्म है कि आती नहीं…

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अलग-अलग राज्यों में फंसे मजदूरों के हाल बेहाल हैं। सरकार कहती है कि मदद के लिए लोकल पुलिस से बात करें। थानेदार से बात करों तो घरबंदी। समझ नहीं आ रहा करें तो क्या करें। अब आक्रोश बढ़ रहा है। अगर ऐसा ही चलता रहा था तो कई बेकसूर सिर्फ भूखे ही मर जाएंगे। एक अन्य वीडियो में एक बेबस मजदूर फुटपाथ पर बैठकर सूखे पत्ते खाता नजर आया। कार से गुजर रही एक महिला की नजर पड़ी तो उसे खाना दिया। वो बेबस खाना खाते-खाते इतना भावुक हो गया कि फफक कर रो पड़ा। ये हालात 21वीं सदी के ही हैं। हालात भी ऐसे जिसके सामने सब बेबस नजर आ रहे हैं।

देश के विभिन्न इलाकों में मजदूर वर्ग अब सड़कों पर उतर प्रदर्शन कर रहा है। ऐसी खबरें भी सामने आने लगी हैं लेकिन सरकार के पास अब तक मजदूरों की घर वापसी का कोई ठोस बंदोबस्त नहीं है। ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया भी इतनी सुस्त है मानों इतनी देर में इंसान पैदल ही कश्मीर से कन्याकुमारी पहुंच जाएं। रेलवे गिनती ने अब गिनती की ट्रेन चलाई है। टिकट का भाड़ा सुन भूख से बेबस मजदूर सदमें से मर जाए।

इन सबके बीच अब विपक्षी दल भी लगातार केंद्र सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि अन्य राज्यों में फंसे हुए लोगों को सही सलामत घर पहुंचाया जाए लेकिन सरकार है कि उन्हें घर पहुंचाने की जगह अपनी छवि बदलने की तैयारी कर रही है। मजदूर कभी ट्रेन से कटकर, कभी ट्रक की चपेट में तो कभी भूखे ही मरने को मजबूर है।

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अर्थव्यवस्था का हवाला देकर देशभर में जगह-जगह मधुशालाएं खोल दीं गईं। क्या सोशल डिस्टेंसिंग, क्या लॉकडाउन, क्या कोरोना वायरस, लेकिन जब प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचाने की बात हो अरे साब सोशल डिस्टेंसिंग, अरे साब लॉकडाउन, अरे साब कोरोना वायरस। इंसान मौत से नहीं डर रहा है इस कोरोना काल में अपनों के बीच तस्सली से रहना चाहता है। अगर मौत हो भी तो अपनों के बीच हो। जब पीएम केयर फंड का नहीं तो लावारिस लाशों का क्या हिसाब, क्योंकि शर्म है कि आती नहीं…

अब जब मजदूर आक्रोशित हो उठे हैं। गुस्सा प्रदर्शन में बदलने को सरकार को छवि की याद आई तो ‘श्रमिक स्पेशल’ ट्रेनें शुरू की गईं। अब तक 100 से ज्यादा ट्रेनों से हजारों लोगों को उनके गृहराज्य भेजा जा चुका है। आगे भी कईयों को भेजा जाना है लेकिन लॉकडाउन में जिन गरीबों का काम ठप है, जिन गरीबों की जेब में पैसे नहीं है, जिन गरीबों को दो वक्त रोटियां नसीब नहीं हो रही है, उन गरीबों से अब भी टिकट के पैसे वसूले जा रहे हैं, क्योंकि शर्म है कि आती नहीं।

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