कश्मीर मानसिक स्वास्थ्य

कश्मीर में लगातार लॉकडाउन से लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर

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कश्मीर में लगे लॉकडाउन को 5 अगस्त को पूरा एक साल होने वाला है। पिछले साल 5 अगस्त को संविधान से आर्टिकल 370 और 35 ए को हटाकर जम्मू – कश्मीर राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया था। इस पूरे एक साल में लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर काफी असर पड़ा हैं।

इस फेैसले के साथ, केंद्र सरकार ने कश्मीर के सब इलाकों में कर्फ्यू  के साथ – साथ संचार के भी सभी माध्यमों पर प्रतिबंध लगा दिया था। कोविड -19 की महामारी के बाद कश्मीरी लोगों के लिए दिक्कतें और भी बढ़ गई। जहाँ पूरा देश सिर्फ एक लॉकडाउन से गुजर रहा था, वहीं जम्मू – कश्मीर दो तरह के लॉकडाउन से गुजर रहा था। जिससे वहाँ के अधिकतर लोग मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं, जो कि घाटी की स्वास्थ्य सेवाओं पर दोहरा प्रहार है। मानसिक स्वास्थ्य को अक्सर देश में नजरअंदाज कर दिया जाता है और कश्मीर के लोगों के लिए यह और भी मुश्किल है, जिसकी एक पीढ़ी सिर्फ गोलियों की आवाज सुनकर बड़ी हुई है।

हालांकि आधिकारिक डाटा का मिलना तो मुश्किल है लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, घाटी में आर्टिकल 370 और 35 ए के हटने के बाद से सुसाइड की दर बढ़ी है।


“पिछले एक साल से हम इसी परिस्थिति में हैं, आर्थिक अनिश्चिकता के साथ- साथ सोशल डिस्टेंसिंग ने कश्मीर के लोगों की परेशानी को बढ़ा दिया हैं।”
-डॉ अक्मल अहमद शाह, मनोचिकित्सक

डॉ. शाह बताते हैं “घाटी के कुछ ही इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित काउंसलिंग की सुविधा उपलब्ध है। हमें सभी इलाकों तक इन सेवाओं को पहुँचाने की जरुरत है। घाटी में लाकडॉउन के कारण दवाईओं की कमी होने और कभी – कभी लोग इलाज के लिए डॉक्टर के पास नहीं पहुँच पाते हैं।”

डॉ. शाह का कहना है कि “इन सब संकटों की वजह से जो मरीज पहले ठीक हो गए हैं, अब उनमें फिर से डिप्रेशन के लक्षण दिखने लग गए हैं। इसी के साथ समाज में मानसिक स्वास्थ्य के साथ जुड़ा स्टीग्मा और समय पर थेरेपी ना मिलना भी ठीक हो चुके मरीजों में दोबारा से मानसिक तनाव के लक्षण दिखने का कारण है।”

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लॉकडाउन और आवाजाही पर रोक की वजह से, कश्मीर में स्थित अधिकतर एनजीओ ने मरीजों के लिए ऑनलाइन काउंसलिंग की सेवा शुरु की है। लेकिन इस तरह की सेवा से  कश्मीर के दूरस्थ इलाकों में रहने वाले लोग वंचित रह जाएंगे, जहाँ इंटरनेट की सेवा उपलब्ध नहीं है।

मेड्सें सां फ्रंटियेर (संस्था जो मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करती है) में मानसिक स्वास्थ्य के काउंसलर दावूद अहमद डार बताते है कि “हमने ऑनलाइन काउंसलिंग की सेवा शुरु तो कर दी है। लेकिन अधिकांश मरीज जो दूर इलाकों में रहते हैं, उनके लिए इंटरनेट की खराब सेवा के कारण ऑनलाइन काउंसलिंग काफी मुश्किल है। यदि आने वाले दिनों में लॉकडाउन में राहत मिलती है तो हम ही शायद फेस टू फेस इंटरेक्शन शुरु कर देगें।”

डॉ शाह जोर देते हुए बोलते है कि “लगातार लॉकडाउन की वजह से लोगों में मानसिक तनाव बढ़ता जा रहा है, यदि हम अभी इस पर ध्यान नहीं देगें तो हमें अधिक संख्या में सुसाइड के मामले देखने को मिल सकते हैं।”

इसी वर्ष जून में आई कश्मीर इंडेप्थ न्यूज सर्विस की रिपोर्ट के अनुसार, 9 लोगों आत्महत्या की वजह से मारे गए हैं. डॉ शाह बताते है कि “ निराशा और नाकाबिल होने का अहसास ही डिप्रेशन के लक्षण है जिससे आत्महत्या के विचार आते है।” एमएसफ की रिपोर्ट के मुताबिक, कश्मीर में रहने वाले 10 प्रतिशत लोग गंभीर डिप्रेशन के शिकार है।

मेड्सें सां फ्रंटियेर के मेंटल हेल्थ सर्वे 2015 की रिपोर्ट के अनुसार, घाटी के लगभग 1.8 मिलियन वयस्कों में मानसिक तनाव के लक्षण हैं, जिसमें से 41 प्रतिशत युवा में डिप्रेशन के लक्षण हैं।

पिछले एक साल घाटी में आई अनिश्चितता ने लोगों पर काफी बुरा असर डाला है, इससे प्रभावित होकर लोगों ने काफी गंभीर कदम उठाए है।

बैंगलोर की एचआर कंपनी में असिस्टेंट रिक्रुटर मो. उमेर (बदला हुआ नाम) बताते है कि “पिछले साल सितंबर में उन्होंने खुद को मारने की कोशिश की थी। सरकार के इस कदम के कारण वह डिप्रेशन में चले गए थे। कश्मीर में संचार के सभी साधनों पर लगे प्रतिबंधों के कारण उमेर अपने माता- पिता से संपर्क नहीं कर पाए। जिससे डर और अकेलापन ने उन्हें यह गंभीर कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया।”

उमेर बताते हैं “शुरुवाती दिनों में, मुझे लगा था कि आने वाले कुछ दिनों में मोबाइल की सेवाएं शुरु हो जाएंगी, पर ऐसा काफी महीनों तक नहीं हुआ। जैसे- जैसे दिन बीतते गए, मुझे और अकेलापन महसूस होने लगा।”

उमेर बताते है कि “ उस दौरान मुझे अपने कमरे में ही घुटन होने लगी थी. कई रातें मैनें सिर्फ रो- रो कर ही गुजारी है. एक दिन ऑफिस से घर लौटने के बाद मैं काफी परेशान था, जब मैनें अपने कमरे का दरवाजा खोलने की कोशिश की तो मेरे हाथ कांपने लगे। दरवाजा खोलने की जगह मुझे दरवाजा खुलवाना पड़ा।”   

अपनी बहन के कहने पर उमेर ने मनोचिकित्सक को दिखाया। 8 नवंबर 2019 को उमेर अपने माता- पिता से मिले, जब वह बैंगलोर  पहुंचे।

उमेर एकमात्र ऐसे व्यक्ति नहीं है जो इस स्थिति से गुजर रहे है, यह संख्या काफी अधिक है। समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोगों की सोच में तब्दीली लाना जरुरी है। वर्तमान में कश्मीर के लोगों को मानसिक स्वास्थ्य की सेवाओं की अधिक जरुरत हैं।

Written By Kirti Rawat, She is Journalism graduate from Indian Institute of Mass Communication New Delhi.

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