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आजकल, इंसानों का पतझड़ चल रहा है- मयंक गोस्वामी

mayank goswami kavita on corona
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देश में फैली कोरोना महामारी ने इंसान को झंकझोर कर रख दिया है। हर दिन हम इंसानों को इस महामारी की वजह से टूटता हुआ देख रहे हैं। महामारी के दूसरे दौर में हमने कई अपनों को खोया है। श्मशानों में हज़ारों की संख्या में जलती चिताएं मन को व्यथित कर रही हैं। बीमारी ने हमारे सिस्टम को झंकझोर दिया है। इंसान पत्तों की तरह टूटता चला जा रहा है। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, परिवार के परिवार बिखर रहे हैं। इसी मंज़र को अपनी कविता में कैद करने की कोशिश कर रहे हैं मयंक गोस्वामी।

मयंक गोस्वामी अपनी कविता ‘आजकल, इंसानों का पतझड़ चल रहा है’ के माध्यम से कोरोना महामारी का मार्मिक चित्रण कर रहे हैं। पेश है आपके लिए उनकी यह कविता-

पतझड़ में गिरते
पत्तों के
गिरने की आवाज सुनी है?
कैसे सुनोगे,
होती ही नहीं,
सारी आवाज़ें होती है,
गिरने के पहले (या बाद),
किसी उम्मीद के सहारे
सोचता होगा,
मैं नही गिरूंगा,
पकड़े रहूंगा,
फिर आएगा एक झौंका,
देगा हल्का सा धक्का,
लगेगा मुक्त हो गया,
पर नही,
उड़ा कर ले जाएगा ऊपर,
घुमाएगा बवंडर की तरह,
फिर सहसा रुक जाएगी हवा,
स्थिर होगा,
अतरायेगा,
इधर, उधर,
ऊपर, नीचे,
फिर आएगा,
धीरे धीरे,
नीचे,
अपने पेड़ से कहीं दूर,
जमीन पर,
हवा फिर आएगी,
सरसराहट के साथ,
अब आएगी आवाज़,
घिसटने की,
कुछ और हजार पत्तों के साथ,
अगली सुबह,
एक झाड़ू,
लगाएगी इनको किनारे,
सुलगा देगी एक माचिस,
हो जाएगा सामूहिक,
अंतिम संस्कार,
आजकल,
इंसानों का पतझड़ चल रहा है।
~ मयंक गोस्वामी

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