MAN KI BAAT

झूठ की अति उत्तम रचना है – मन की बात

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मोदी अब बुझे-बुझे दिखने लगे है। उनके भाषणों से टपकने वाला झूठ समझ में आने लगा है। जब देश 21वीं सदी के सबसे बड़े संकट काल से गुजर रहा है तो प्रधानमंत्री के मन की बातें मूलतः झूठ की अति उत्तम रचना ज्यादा नजर नही आती। कोरोना महामारी और चीन के सैन्य अतिक्रमण से उपजे संकट के बीच जनहित का मुलम्मा चढ़ाकर कपट की चाशनी में लपेटे गये शब्दों को तब परोसा जा रहा है जब देश 21वीं सदी के सबसे बड़े संकटकाल से गुजर रहा है।

तीन दिन में दो बार देश के सामने मुखातिब हुए मोदी अब बिहार और बंगाल के विधानसभा के चुनावों पर आंखे गड़ाये बैठे हुए है। उम्मीद है कि ये चुनाव नवम्बर के अन्त तक हो जायेंगे। इसके मद्देनजर प्रधानमंत्री का राहतों के पैकेज परोसना समझ आता हैं इससे पहले मई में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण भी अरबों रूपयों के राहत पैकेज का ऐलान कर चुकी हैं लेकिन इससे वाकई मेें कितनी राहतें मिली हैं इसका कोई विश्वसनीय आंकड़ा उपब्ध नही है।

प्रधानमंत्री राष्ट्र से झूठ बोल रहे है। कोरोना महामारी से निपटने में यह सरकार बिल्कुल ही नाकाम रही है। मोदी देश में कोरोना फैलने की रफ्तार का बाकी देशों की तुलना में कम होने को बहुत बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि भारत में कोरोना संक्रमण फैलने की रफ्तार को मापने का कोई पैमाना नही है।

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इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च के मुताबिक 30 जून तक देश भर में 88 लाख 26 हजार 585 सैंपलों की जांच की जा चुकी है और 5 लाख 85 हजार सैंपलों को पाजिटिव पाया गया है। देश की आबादी 1 अरब 35 करोड़ है और पिछले तीन महीनों में एक करोड़ लोगों की जांच भी नही हो पायी है। ऐसे में यह बताना गलत है कि देश में संक्रमण उतना तेजी से नही फैल रहा है जितना बाकी देशों।

सच तो यह है कि अचानक थोप दिये गये लाॅकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के भयावह पलायन और मौतों की जिम्मेदार भी यही सरकार है। शायद देश कभी यह नही जान पायेगा कि 21वी सदी के अब तक के सबसे बड़े पलायन में कितने लोग मौत के मुंह में समा गये लेकिन एक्टर सुशांत राजपूत की आत्महत्या पर तुरन्त ट्वीट करने वाले प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री ने इन गरीबों की भयानक मौतों पर एक भी शब्द नही बोला।

पुलवामा जैसी आपदा को अवसर में बदल चुके मोदी चीनी अतिक्रमण से उपजे संकट का अपने राजनैतिक हित के लिये इस्तेमाल करना बखूबी जानते है। पुलवामा के शहीदों की तस्वीरों को मंच पर लगाकर चुनावी भाषण देने का कारनामा मोदी पहले भी कर चुके हैं। उन्हे सैनिकों की लाशों पर राजनीति करना आता है और बिहार विधानसभा चुनाव में वो पहले से आजमाए हुए यही हथकंडे अपनाने जा रहे हैं ।

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मोदी की नजर बिहार पर हैं। गरीब कल्याण अन्न योजना को नवम्बर तक बढा दिया गया है और नवम्बर तक ही बिहार विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। गरीबों को अनाज केवल विधानसभा चुनावों तक ही मिलेगा। मोदी की यह स्कीम छठ पूजा तक ही जारी रहेगी। नफरत से भरी राजनीति को समझना हो तो ऐसे समझा जा सकता है कि अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने आने वाले महीनों के त्योहारों- दीवाली और छठ पूजा का तो जिक्र किया लेकिन बकरीद को भूल गये। मतलब यह कि चाहे कोरोना हो या चीनी आक्रमण का भय लेकिन आने वाले चुनाव में भी हिंदू-मुसलमान ही प्रमुख मुद्दा रहने वाला है। संदेश साफ है कि चाहे जितनी आग लग जाये लेकिन साम्प्रदायिक विभाजन की राजनीति का दामन नही छोड़ेगे।

मोदी नही चाहते कि कोई भी गरीब वोट देने से पहले ही मर जाये। गरीबो के भूखे पेट को देख कर दुबले हुए जा रहे मोदी के लोकसभा क्षेत्र बनारस में भूख से मरते लोगों की खबर लिखने पर एक महिला पत्रकार के खिलाफ मुकदमा हो गया और फिलहाल वह जमानत की आस में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने में जुटी है।

चीन द्वारा भारतीय जवानों की हत्या और भारतीय सीमा के अन्दर तक घुसने के बाद तम्बू गाड़ कर बैठे चीन से निपटने में भी मोदी नाकाम रहे है। सच यह है कि प्रधानमंत्री ने इस मामले में विपक्ष के साथ सम्पूर्ण देश को अंधेरे में रखा। 15जून को हुई सर्वदलीय बैठक में मोदी ने बताया कि चीनी सेना ने देश की जमीन पर कोई भी कब्जा नही किया है। जबकि दो दिन बाद ही सरकार के विदेशमंत्री चीन सरकार से चीनी सेना को 5 मई की स्थिति में वापस बुला लेने की मांग करते है। विदेशमंत्री के दावे प्रधानमंत्री के बयान के बिल्कुल उलट है। जब विदेशमंत्री यह मान रहे है कि चीनी सेना 5 मई वाली पोजीशन पर नही है जहां वह पहले थी और जहां उसे होना चाहिये था तो सवाल यह है कि अभी वो कहां है।

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भारतीय जवानों की शहादत के बाद अपने बयान में मोदी ने कहा कि हर बिहारी को बिहार रेजीमेंट के जवानों की शहादत पर गर्व है। वैसे बिहार रेजीमेंट में केवल बिहार के ही नही बल्कि देश भर से लोग भर्ती होते हैं और सेना के शौर्य- बलिदान पर गर्व करने का भाव किसी एक राज्य तक सीमित नही होता। लेकिन मोदी के लिये हर स्थिति मे राजनैतिक हित साधने की चेष्टा करते रहना ही महत्वपूर्ण है। उनके लिये बिना सत्ता के देश किस काम का। शायद यही वजह है कि अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में है और सरकार की घोषणायें हवा-हवाई साबित होती जा रही हैं।

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ये लेख कानपुर से स्वतंत्र पत्रकार अमितेश अग्निहोत्री ने लिखा है ।