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अग्निकन्या से दीदी तक : ममता बनर्जी का राजनीतिक सफ़र

ममता बनर्जी
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पश्चिम बंगाल की तेज़ तर्रार नेता ममता बनर्जी को इस देश में किसी पहचान की ज़रूरत नहीं है। बंगाल की राजनीति में अपने दम पर बड़ा बदलाव कर बंगाल पर राज करने वाली ममता ने देश की सिसायत में अपनी अलग पहचान बनाई है। आइये आज आपको ममता बनर्जी के राजनीतिक सफ़र के बारे में बताते हैं।

ममता बनर्जी का राजनीतिक सफ़र 21 साल की उम्र में साल 1976 में महिला कांग्रेस महासचिव पद से शुरू हुआ था। वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में पहली बार मैदान में उतरीं ममता ने माकपा के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को पटखनी देते हुए अपनी संसदीय राजनीति का आग़ाज़ किया था।

ज़िद और जुझारूपन के चलते ममता ने वर्ष 1998 में कांग्रेस से नाता तोड़ कर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना कर महज 13 वर्षों के भीतर राज्य में दशकों से जमी वाममोर्चा सरकार को उखाड़ कर उन्होंने अपनी पार्टी को सत्ता में पहुंचाया था।

जब ममता लोकसभा चुनाव हार गई

कांग्रेस के छात्र संगठन छात्र परिषद की नेता के तौर पर अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाली ममता ने तमाम मुकाम अपने दम पर हासिल किए। अपनी ज़िद और जुझारूपन के चलते उनको सैकड़ों बार पुलिस और माकपा काडरों की लाठियां खानी पड़ी।

इस ज़िद, जुझारूपन और शोषितों के हक़ की लड़ाई के लिए मीडिया ने उनको अग्निकन्या का नाम दिया था। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान उनको युवा कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया। कांग्रेस-विरोधी लहर में वर्ष 1989 में वे लोकसभा चुनाव हार गई थीं।

ममता ने वर्ष 1991 के चुनाव में वे लोकसभा के लिए दोबारा चुनी गईं। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उस साल चुनाव जीतने के बाद पीवी नरसिंह राव मंत्रिमंडल में उन्होंने युवा कल्याण और खेल मंत्रालय का जिम्मा संभाला।

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लेकिन केंद्र में महज दो साल तक मंत्री रहने के बाद ममता ने केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में कोलकाता की ब्रिगेड परेड ग्राउंड में एक विशाल रैली का आयोजन किया और मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया।

ममता के राजनीतिक जीवन में एक अहम मोड़ तब आया जब वर्ष 1998 में कांग्रेस पर माकपा के सामने हथियार डालने का आरोप लगाते हुए उन्होंने अपनी नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस बना ली। साल 2011 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने अकेले अपने बूते ही तृणमूल कांग्रेस को सत्ता के शिखर तक पहुंचा दिया।

हमेशा बड़े नेताओं से टकराती रहीं

राजनीतिक करियर की शुरुआत से ही विद्रोही रहीं ममता को आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर कहीं भी अनशन करने या पुलिस की मार खाने तक से परहेज़ नहीं रहा। वह आजीवन दूसरों के हक़ की लड़ाई लड़ती रहीं। इसके लिए बड़े से बड़े नेताओं से टकराने से भी उनको परहेज़ नहीं रहा।

सादगी ममता के जीवन का हिस्सा रही है। सफेद सूती साड़ी और हवाई चप्पल से उनका नाता कभी नहीं टूटा। चाहे वह केंद्र में मंत्री रही हों या महज सांसद। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उनके पहनावे या रहन-सहन में कोई अंतर नहीं आया।

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ममता एक राजनेता होने के अलावा एक कवि, लेखक और चित्रकार भी हैं। बीते विधानसभा चुनावों में उन्होंने अपनी पेंटिंग्स बेचकर पार्टी के चुनाव अभियान के लिए लाखों रुपए जुटाए थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी कविता और कहानी की दर्जनों किताबें आ चुकी हैं।

5 जनवरी 1955 को कोलकाता में जन्‍म लेने वाली ममता वर्तमान मुख्यमंत्री और राजनैतिक दल तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख हैं। उनके समर्थक उन्हें दीदी (बड़ी बहन) के नाम से संबोधित करते हैं।

  • ममता केंद्र में दो बार रेल मंत्री रह चुकी हैं। उन्‍हें देश की पहली महिला रेल मंत्री बनने का गौरव प्राप्‍त है। 2012 में प्रतिष्‍ठि‍त ‘टाइम’ मैगजीन ने उन्हें ‘विश्व के 100 प्रभावशाली’ लोगों की सूची में स्थान दिया था।
  • ममता बनर्जी केंद्र सरकार में कोयला, मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री, युवा मामलों और खेल के साथ ही महिला व बाल विकास की राज्य मंत्री भी रह चुकी हैं।
  • दक्षिणी कलकत्ता (कोलकाता) लोकसभा सीट से सीपीएम के बिप्लव दासगुप्ता को पराजित करने के बाद वह 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में इसी सीट से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुईं।
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दक्षिण कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज से ममता बनर्जी ने इतिहास में ऑनर्स की डिग्री हासिल की। बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय से उन्होंने इस्लामिक इतिहास में मास्टर डिग्री ली। श्रीशिक्षायतन कॉलेज से उन्होंने बीएड की डिग्री ली, जबकि कोलकाता के जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से उन्‍होंने कानून की पढ़ाई की।

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ममता के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे और जब वह बहुत छोटी थीं, तभी उनकी मृत्यु हो गई थी। बताया जाता है कि गरीबी से संघर्ष करते हुए उन्‍हें दूध बेचने का काम भी करना पड़ा। उनके लिए अपने छोटे भाई-बहनों के पालन-पोषण में, अपनी मां की मदद करने का यही अकेला तरीका था।

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