Home » विशेष: दादा माखनलाल

विशेष: दादा माखनलाल

Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

विचार: आयुष ओझा

स्वतंत्रता के पूर्व और स्वात्रंत्योत्तर युग में भारतवर्ष में अनेक महापुरुषों ने राष्ट्रीय परिदृश्य पर अपने बहुआयामी व्यक्तित्व और कालजयी कृतित्व की छाप छोड़ते हुए अपनी एक अलग ही ख्याति प्राप्त की है। ऐसे महापुरुषों में दादा माखनलाल चतुर्वेदी का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है।

माखनलाल चतुर्वेदी जी की ख्याति एक लेखक,कवि और वरिष्ठ साहित्यकार के रूप में हैं लेकिन वो एक स्वतन्त्रता सेनानी भी थे।इसके अलावा उनकी पहचान एक जागरूक और कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार की भी थी। माखनलाल जी अपने व्यक्तित्व की विशेषता की वजह से ही “पंडितजी” के नाम से भी विख्यात है ,और उनके कृतित्व से उनकी मुकम्मल पहचान ‘एक भारतीय आत्मा’ के रूप में है, जो सर्वथा उचित भी है।

दादा का जन्म 04 अप्रैल 1889 को ब्रिटिश इंडिया मे हुआ था । तात्कालिक समय में उनका जन्म स्थान मध्य भारत के बाबई मे था। माखनलाल चतुर्वेदी के जन्म के समय भारत पर अंग्रेजों का शासन था एवं तब स्वाधीनता के लिए संघर्ष चल रहा था।माखनलाल जी जब 16 वर्ष के हुए तब ही स्कूल में अध्यापक बन गए थे, उन्होंने 1906 से 1910 तक एक विद्यालय में अध्यापन का कार्य किया । लेकिन जल्द ही दादा ने अपने जीवन और लेखन कौशल का उपयोग देश की स्वतंत्रता के लिए करने का निर्णय ले लिया और यही से उनके व्यक्तिव का निर्माण प्रारंभ होता है ।

माखनलाल चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व को भली-भाँति समझने के लिए तत्कालीन राष्ट्रीय परिदृश्य और घटनाचक्र को जानना भी जरूरी है। यह वो समय था जब भारतीय जनमानस में आजाद होने की तमन्ना गहरे तक घर कर चुकी थी। लोकमान्य तिलक का उद्घोष- ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ ,बलिपंथियों का प्रेरणास्रोत बन चुका था। दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के अमोघ अस्त्र का सफल प्रयोग कर राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गाँधी का राष्ट्रीय परिदृश्य के केंद्र में आगमन हो चुका था। आर्थिक स्वतंत्रता के लिए स्वदेशी का मार्ग प्रशस्त कर लिया गया था, सामाजिक सुधार के अभियान गतिशील थे और राजनीतिक चेतना स्वतंत्रता की चाह के रूप में सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई थी। भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता इस सबको प्रखर अभिव्यक्ति प्रदान कर रही थी। इसी परिवेश में राष्ट्रीय क्षितिज पर दादा माखनलाल चतुर्वेदी जी के रूप में एक उदीयमान नक्षत्र का जन्म होता है ।माखनलाल जी के जीवन का अध्ययन करने पर उनके व्यक्तित्व के कई पहलू हमें देखने को मिलते है । वे एक ज्वलंत पत्रकार तो थे ही लेकिन आत्मा से एक शिक्षक थे। उन्होंने प्रभा, कर्मवीर और प्रताप का संपादन किया, देश की आजादी के लिए लड़ाई भी लड़ी और कई बार जेल गए। महात्मा गाँधी के आह्वान पर सन्‌ 1920 के ‘असहयोग आंदोलन’ में महाकोशल अंचल से पहली गिरफ्तारी देने वाले माखनलालजी ही थे।

READ:  Gandhi Jayanti: ये मीम्स बताते हैं कि हम महात्मा गांधी को कितना कम जानते हैं

सन्‌ 1930 के ‘सविनय अवज्ञा’ आंदोलन में भी उन्हें गिरफ्तारी देने का प्रथम सम्मान मिला। माखनलाल जी 1913 में ‘प्रभा पत्रिका’ का संपादन प्रारम्भ किया, आजादी के आंदोलन के दौरान वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए, जिनसे ये बेहद प्रभावित हुए। 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन के दौरान माखनलालजी ने विद्यार्थीजी के साथ मैथिलीशरण गुप्त और महात्मा गाँधी से मुलाकात की। साल 1918 में दादा ने प्रसिद्ध ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ नाटक की रचना की और 1919 में जबलपुर में ‘कर्मयुद्ध’ का प्रकाशन किया।

स्वतंत्रता संग्राम में उनकी तेजस्वी-ओजस्वी भागीदारी के अलावा माखनलालजी को जानने के तीन माध्यम हैं। उनके महान कृतित्व के तीन आयाम हैं : अव्वल उनकी पत्रकारिता यानी ‘प्रभा’, ‘कर्मवीर’ और ‘प्रताप’ का संपादन। द्वितीय, माखनलालजी की कविताएँ, निबंध, नाटक और कहानी एवम् तृतीय माखनलालजी के अभिभाषण।

4 अप्रैल 1925 को जब खंडवा से माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘कर्मवीर’ का पुनः प्रकाशन किया तब उनका आह्वान था, ‘आइए, गरीब और अमीर, किसान और मजदूर, उच्च और नीच, जित और पराजित के भेदों को ठुकराइए। प्रदेश में राष्ट्रीय ज्वाला जगाइए और देश तथा संसार के सामने अपनी शक्तियों को ऐसा प्रमाणित कीजिए, जिसका आने वाली संतानें स्वतंत्र भारत के रूप में गर्व करें।’
इसी लेख के अंतिम वाक्य से उनके निरभिमानी व्यक्तित्व व सोच का परिचय मिलता है, और कदाचित यही उनके संपादन की सबसे बड़ी शक्ति भी थी, ‘प्रभु करे सेवा के इस पथ में मुझे अपने दोषों का पता रहे और आडंबर, अभिमान और आकर्षण मुझे पथ से भटका न पाए।’ यह लेख उनकी विलक्षण संपादन की क्षमता को दर्शाता है।

किसानों की दुर्दशा से व्यथित होकर कर्मवीर’ के 25 सितंबर 1925 के अंक में वे सत्ता के हुक्मरानों पर गहरा प्रहार करते हुए लिखते हैं- ‘उसे नहीं मालूम कि धनिक तब तक जिंदा है, राज्य तब तक कायम है, ये सारी कौंसिलें तब तक हैं, जब तक वह अनाज उपजाता है और मालगुजारी देता है। जिस दिन वह इंकार कर दे उस दिन समस्त संसार में महाप्रलय मच जाएगा। उसे नहीं मालूम कि संसार का ज्ञान, संसार के अधिकार और संसार की ताकत उससे किसने छीन कर रखी है और क्यों छीन कर रखी है। वह नहीं जानता कि जिस दिन वह अज्ञान इंकार कर उठेगा उस दिन ज्ञान के ठेकेदार स्कूल फिसल पड़ेंगे, कॉलेज नष्ट हो जाएँगे और जिस दिन उसका खून चूसने के लिए न होगा, उस दिन देश में यह उजाला, यह चहल-पहल, यह कोलाहल न होगा।

READ:  Who was emperor Mihir Bhoj, controversy over his statue

फौज और पुलिस, वजीर और वाइसराय सब कुछ किसान की गाढ़ी कमाई का खेल है। बात इतनी ही है कि किसान इस बात को जानता नहीं, यदि उसे अपने पतन के कारणों का पता हो, और उसे अपने ऊँचे उठने के उपायों का ज्ञान हो जाए तो निस्संदेह किसान कर्मपथ में लग सकता है।’

यह उनके समाज के निम्न वर्ग की पीड़ा से सीधे तौर पर जुड़े होने की क्षमता को दर्शाता है।

उनके साहित्य की विशेषता को समझने के लिए फिराक गोरखपुरी द्वारा कही गई ये बात पढ़नी चाहिए – “उनके लेखों को पढ़ते समय ऐसा मालूम होता था कि आदिशक्ति शब्दों के रूप में अवतरित हो रही है या गंगा स्वर्ग से उतर रही है। यह शैली हिन्दी में ही नहीं, भारत की दूसरी भाषाओं में भी विरले ही लोगों को नसीब हुई। मुझ जैसे हजारों लोगों ने अपनी भाषा और लिखने की कला माखनलालजी से ही सीखी।”

माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्य की विधा में दिए योगदान के सम्मान में मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी देश की किसी भी भाषा में योग्य कवियों को “माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार” देती हैं।भोपाल,मध्य प्रदेश में स्थित माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय पूरे एशिया में अपने प्रकार का पहला विश्व विद्यालय हैं, इसकी स्थापना पंडितजी के राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में पत्रकारिता और लेखन के द्वारा दिए योगदान को सम्मान देते हुए 1991 में हुई।

जब आज के दौर में सत्ता पाने के लिए भाई भाई का ही दुश्मन बन जाता है तब स्वतंत्रता के बाद दादा ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद को यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि
‘मैं पहले से ही शिक्षक और साहित्यकार होने के नाते ‘देवगुरु’ के आसन पर बैठा हूं, मेरा ओहदा घटाकर तुम लोग मुझे ‘देवराज’ के पद पर बैठना चाहते हो जो मुझे कभी स्वीकार नहीं है।’
सचमुच माखनलालजी के बहुआयामी व्यक्तित्व और कालजयी कृतित्व की महत्ता सत्ता की तुलना में बहुत ऊँचे शिखर पर प्रतिष्ठित है और सदैव रहेगी।