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वो कहते हैं चुनाव है इसलिए ऑड ईवन, आप क्या सोचते हैं?

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odd even delhi

New Delhi: A Civil Defence volunteer displays a placard asking people to obey the odd-even rule, at ITO in New Delhi, Monday, Nov. 4, 2019. (PTI Photo/Manvender Vashist) (PTI11_4_2019_000067B)

विचार । पल्लव जैन

दिल्ली में आज ऑड ईवन का दूसरा दिन है, प्रदूषण आज कल से कम है। अब इसका श्रेय ऑड ईवन को कितना जाता है वो तो बाद में पता चलेगा। फिलहाल हवा में थोड़ी गति है और पराली बराबर जलाई जा रही है। सैटेलाईट मैप दिखाते हैं कि पंजाब में सबसे ज़्यादा पराली जलाई जा रही है, जहां कैप्टन अमरिंदर नीत कांग्रेस सरकार है।

Satellite Image Of Stubble Burning On 4th November

हरियाणा जहां बीजेपी सरकार है, वहां कम पराली जलाई जा रही है। हम यहां सरकार और पार्टिंयों की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि बदकिस्मती से यहां हर मुद्दा सियासत से जोड़ दिया जाता है। फिर आम जनता के सांस लेने के अधिकार का ही क्यों न हो।

ऑड ईवन पर पब्लिक रिस्पांस

कल ऑफिस में बैठे-बैठे मैने ऑड ईवन पर लोगों की राय ली, लोगों ने कहा की पिछली बार सीएनजी गाड़ियों को छूट थी इस बार नहीं है। इसके पीछे कारण यह है कि लोग नकली सीएनजी स्टिकर लगाकर बच निकलते थे, तो ट्रैफिक पुलिस को दिक्कत होती थी। तो एक ने कहा कि ट्रैफिक पुलिस की दिक्कत के लिए आम जनता क्यों भुगते। किसी ने कहा कि 70 पर्सेंट तो टू व्हीलर्स पॉल्यूशन करते हैं उनको छोड़ दिया गया क्योंकि चुनाव आ रहे हैं। और सब बाईक वाले केजरीवाल के वोटर्स हैं। ऑफिस आते वक्त रास्ते में मैने ट्रैफिक का हाल देखा। गाड़ियां सड़क पर कम दिखी कहीं भी रुका हुआ ट्रैफिक नहीं दिखाई दिया। इसका सीधा सा मतलब है, रुका हुआ ट्रैफिक ज़्यादा प्रदूषण करता है। जब सड़कों पर कम गाड़ियां होंगी तो व्यक्ति समय पर अपने गंतव्य तक पहुंचेगा और कम समय के लिए उसकी गाड़ी से धुंआ निकलेगा। तो मामूली ही सही कुछ तो असर ज़रुर होगा। मुझे लगता है कि दिल्ली में जितनी गाड़ियां सड़क पर उतरती हैं वह दिल्ली के क्षमता से अधिक है। ऐसे में ऑड ईवन नियम दिल्ली में पर्मानेंट लागू किया जाना चाहिए। अब ऑफिस में जिनकी ऑड नंबर वाली गाड़ियां थी वे सब या तो मेट्रो से आफिस आए या फिर कार पूल करके, और जब वापस घर गए तो ऑफिस की शेयरिंग कैब से। थोड़ी परेशानी उन्हें ज़रुर हुई लेकिन अगर यह रुल पर्मानेंट होगा तो आदत में आ जाएगा।

चुनाव क्या सिर्फ केजरीवाल को लड़ना है, बाकि दल जनता को क्या मुंह दिखाएंगे

फिर से आते हैं सियासत की ओर, मोदी जी का कहना है कि अगर किसी अच्छे काम के लिए जनता को थोड़ा कष्ट झेलना भी पड़े तो राष्ट्रहित में वह जायज़ है, जैसा कि नोटबंदी के समय हुआ था, राष्ट्रहित में जनता लाईन में खड़ी हो गई थी। फिर ऑड ईवन तो स्वहित की बात है, जनता क्यों कतरा रही है। क्या नोट सांस से ज़्यादा ज़रुरी थे। फिर विजय गोयल कहते हैं कि पराली से प्रदूषण तो ऑड ईवन का ड्रामा क्यों? अरे भई चुनाव के समय कौन नेता जनता को कष्ट देना चाहेगा और यह रीसर्च किसने की कि केजरीवाल को केवल बाईक वाले वोट देतें हैं कार वाले नहीं। रिस्क तो बन्दे ने लिया ही है। और हां पराली जलाने से रोकना दिल्ली के मुख्यमंत्री के बस में नहीं है, उसके लिए पंजाब और हरियाणा सरकार को मदद करनी होगी या केंद्र को जो फिलहाल गहरी निद्रा में सो रहे हैं। जो दिल्ली के मुख्यमंत्री के बस में है वही तो वह करेगी। ऑड ईवन लागू कर दिया, बच्चों को मास्क बांट दिए। आपने क्या किया? चुनाव अकेला क्या केजरीवाल को ही लड़ना है, बीजेपी और कांग्रेस क्या मुंह लेकर जाएगी चुनावों में? यह मैं मानता हूं कि दिल्ली सरकार द्वारा उठाए कदम नाकाफी हैं, लेकिन मुझे तो कोई और दिखाई भी नहीं देता जिसने एक कदम भी प्रदूषण कम करने के लिए चला हो।

हवा को सरहदों से नहीं बांटा जा सकता

हवा को कोई सरहद नहीं रोक सकती फिर मेरी यह समझ नहीं आता कि दिल्ली का प्रदूषण केवल दिल्ली सरकार का विषय कैसे है? प्रदूषण पर आने वाले शीत सत्र में संसद में कुछ बहस होनी चाहिए क्योंकि देश के दूसरे शहरों में भी स्थिति कोई बेहतर नहीं है। इस विषय पर केंद्र सरकार को आगे आना चाहिए।

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