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ब्राह्मणों ने दलितों के साथ जो क्रूरता की उसके लिए उन्हें ईश्वर को जवाब देना होगा : ज्योतिबा फुले

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महात्मा ज्योतिबा फुले एक ऐसा महान व्यक्ति, जिसने अपनी पत्नी के साथ मिलकर शिक्षा और समानता के अधिकार के लिए वर्षों लड़ाई लड़ी । महात्मा ज्योतिबा फुले 19वी सदी के महान समाज सुधारक, विचारक, दार्शनिक और लेखक थे । उन्होंने भारतीय समाज में फैली अनेक कुरीतियों को दूर कर हिंदू समाज में समरसता लाने का प्रयास किया । महिलाओं और दलितों की अपमानभरी ज़िंदगी में बदलाव लाने के लिए वे हमेशा लड़ते रहे। उनके द्वारा किए गए कार्यों से भारतवर्ष में एक नई चेतना का विकास हुआ और समाज के उस तबके को जीने की नई राह मिली जो अभी तक दुनिया के विकास की रोशनी से वंचित था। महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को हुआ और 28 नवंबर, 1890 निधन । भले ही इस महान विचारक को गए 100 साल से अधिक समय बीत गया हो मगर, उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं और राष्ट्र जीवन को प्रभावित करते हैं ।

दलितों की ज़िंदगी आजीवन ग़ुलामी का दस्तावेज़ थी

19वी सदी के उस दौर में ब्राह्मणवाद पूरे भारतीय समाज पर भयानक तरीक़े से हावी था। दलितों की ज़िंदगी आजीवन ग़ुलामी का दस्तावेज थी । ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ उस दौर में बोल कुछ बोल पाना आसान नहीं होता था । लेकिन इस ग़ुलामी की पृष्ठभूमि तब दरकने लगी, जब महात्मा ज्योतिराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई ने 1 जनवरी 1848 को पुणे के बुधवार पेठ के भिड़े वाड़ा में लड़कियों के पहले स्कूल की शुरुआत की। जब लड़कियों को पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक नहीं मिला तो उन्होंने अपनी पत्नी को इसके लिए तैयार किया। और इस तरह उनकी पत्नी सावित्री बाई फूले देश की पहली महिला शिक्षिका बनी। महात्मा ज्योतिबा फुले बाल-विवाह के विरोधी और विधवा-विवाह के कट्टर समर्थक थे। 1854 में उन्होंने उच्च वर्ग की विधवाओं के लिए एक विधवाघर भी बनवाया। उन्होंने जनविरोधी सरकारी कानून कायदे के खिलाफ भी संघर्ष किया। जिसके कारण सरकार ने एग्रीकल्चर एक्ट पास किया। उनकी समाजसेवा और वंचितो के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों से प्रभावित होकर उनको 1888 में मुंबई में एक विशाल सभा का आयोजन कर महात्मा की उपाधि दी गई।

महात्मा फुले का बचपन अनेक कठिनाइयों में बीता। वे महज 9 माह के थे जब उनकी मां का देहांत हो गया। आर्थिक तंगी के कारण खेतों में पिता का हाथ बंटाने के लिए उन्हें छोटी उम्र में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी। लेकिन पड़ोसियों ने उनकी प्रतिभा का पहचाना और उनके कहने पर पिता ने उन्हें स्कॉटिश मिशन्स हाई स्कूल में दाखिला करा दिया। मात्र 12 वर्ष की उम्र में उनका विवाह सावित्रीबाई फुले से हो गया। भारतीय सामाजिक क्रांति के जनक कहे जाने वाले महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सातारा जिले में माली जाति के एक परिवार में हुआ था। वे एक महान विचारक, कार्यकर्ता, समाज सुधारक, लेखक, दार्शिनक, संपादक और क्रांतिकारी थे। उन्होंने जीवन भर निम्न जाति, महिलाओं और दलितों के उद्धार के लिए कार्य किया। इस कार्य में उनकी धर्मपत्नी सावित्रीबाई फुले ने भी पूरा योगदान दिया।

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ब्राह्मणों की क्रूरता को नष्ट करने के लिए ‘महात्मा फुले ने लंबी लड़ाई लड़ी

बाबासाहेब आम्बेडकर ने अपनी किताब ‘शूद्र कौन थे’ में लिखा कि, ‘महात्मा फुले ने निचले वर्ग के हिंदुओं को उच्च वर्ण के हिंदुओं के प्रति की जा रही ग़ुलामी का अहसास कराते हुए यह स्थापित किया कि भारत में सामाजिक लोकतंत्र को स्थापित करना विदेशी शासन से मुक्ति पाने से भी ज़्यादा ज़रूरी है। सामाजिक लोकतंत्र स्थापित करने की महात्मा फुले की मुहिम का डॉ. अम्बेडकर पर इस क़दर प्रभाव था कि उन्होंने संविधान सभा में 25 नवम्बर 1949 को दिए अपने आख़िरी भाषण में यहां तक आगाह कर दिया था कि बिना सामाजिक लोकतंत्र स्थापित किए, भारत में राजनीतिक लोकतंत्र ढह जाएगा’ । महात्मा फुले ने दलितों पर लगे अछूत के लांछन को धोने और उन्हें बराबरी का दर्जा दिलाने के भी प्रयत्न किए। इसी दिशा में उन्होंने दलितों को अपने घर के कुंए को प्रयोग करने की अनुमति दे दी। शूद्रों और महिलाओं में अंधविश्वास के कारण उत्पन्न हुई आर्थिक और सामाजिक विकलांगता को दूर करने के लिए भी उन्होंने आंदोलन चलाया। उनका मानना था कि यदि आजादी, समानता, मानवता, आर्थिक न्याय, शोषणरहित मूल्यों और भाईचारे पर आधारित सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना है तो असमान और शोषक समाज को उखाड़ फेंकना होगा।

सैकड़ों साल से आज तक दलित समाज, जब से इस देश में ब्राह्मणों की सत्ता कायम हुई तब से, लगातार ज़़ुल्म और शोषण का शिकार है। ये तरह-तरह की यातनाओं और कठिनाइयों में अपने दिन ग़ुज़ार रहे हैं। यह कहा जाता है कि इस देश में ब्राह्मण-पुरोहितों की सत्ता क़ायम हुए लगभग तीन हज़ार साल से भी ज्यादा समय बीत गया। वे लोग परदेस से यहां आए। उन्होंने इस देश के मूल निवासियों पर बर्बर हमले करके इन लोगों को अपने घर-बार से, ज़मीन-ज़ायदाद से वंचित करके अपना ग़ुलाम बना लिया। उन्होंने इनके साथ बड़ा अमानवीय रवैया अपनाया। सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी दलितों में बीती घटनाओं की स्मृतियां ताजा देखकर ब्राह्मणों ने अपनी क्रूरता के प्रमाणों को नष्ट कर दिया। ब्राह्मणों की इसी क्रूरता को नष्ट करने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी थी ।

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अमेरिका के लोगों से प्रेरणा लेकर शुद्रों को ब्राह्मणवाद से मुक्ति दिलाएंगे

महात्मा ज्योतिबा फुले ने भले ही अपना आंदोलन पश्चिमी भारत के एक ख़ास हिस्से में ही चलाया हो लेकिन उस समय दुनिया में रंगभेद के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलनों को भी उनका समर्थन था। इसका सबसे अच्छा उदाहरण उनकी किताब ‘गुलामगिरी’ के समर्पण से मिलता है, जिसको कि वो अमेरिका में नीग्रो लोगों (अश्वेत) को ग़ुलामी से मुक्ति दिलाने वाले उन महान श्वेत लोगों के सम्मान में समर्पित करते हैं, जिन्होंने उस लड़ाई में उदारता, निष्पक्षता और आत्मत्याग का परिचय दिखाया था। अपने समर्पण में महात्मा फुले भारतवासियों से अपनी हार्दिक इच्छा व्यक्त करते हुए अपील करते हैं कि यहां भी लोग अमेरिका के लोगों से प्रेरणा लेकर शुद्रों को ब्राह्मणवाद से मुक्ति दिलाएंगे।

आज भी लोग ज्योतिबा के कार्यों से प्रभावित हो रहे हैं। ज्योतिबा ने ‘गुलामगिरी’− नाम की भी एक पुस्तक लिखी। वर्ष 1873 में प्रकाशित यह पुस्तक आज भी समाज में हो रहे भेदभाव पर खरी उतरती है। हाल ही में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत दौरे के दौरान पूर्व उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल ने मुंबई में बराक ओबामा को यह पुस्तक भेंट स्वरूप दी और उन्हें इसका सार बताया। इससे ओबामा भी प्रभावित दिखे और भारत से अनमोल भेंट कहकर इस किताब को स्वीकार किया।

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