महाराष्ट्र सियासी संकट : ये सच है रंग बदलता है वो हर इक लम्हा, मगर वही तो बहुत कामयाब चेहरा है

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Ground Report । Nehal Rizvi

महाराष्ट्र में राजनीतिक नाटक चल रहा है। कौन किसके साथ है, किसके साथ नहीं, यह समझना काफी कठिन है। सत्ता की मलाई खाने को सभी बेताब है लेकिन सत्ता के दावेदारों के बीच तालमेल के अभाव ने राज्य में राष्ट्रपति शासन के हालात पैदा कर दिए। अगर कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी  और शिवसेना में वैचारिक सामंजस्य होता तो सरकार बनाने के लिए बीस दिन कम नहीं होते।

राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया है और इसी के साथ राज्य में सत्ता हथियाने के प्रयासों को जोर का झटका लगा है। राष्ट्रपति शासन को लेकर राजनीति तेज हो गई है। राज्यपाल के फैसले को न्यायपालिका में चुनौती दी जा रही है लेकिन इन तीनों दलों में कोई भी ऐसा नहीं है जो यह बता पाने में समर्थ हो  कि उनके द्वारा सरकार गठन का आधार क्या है?

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मुख्यमंत्री किस दल का होगा? राष्ट्रपति शासन स्थायी व्यवस्था नहीं है। इस व्यवस्था की आलोचना करने की बजाए सरकार बनाने की ईमानदारी कोशिश होना चाहिए और महाराष्ट्र के व्यापक हित का कॉमन एजेंडा तय किया जाना चाहिए।

राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सबसे बड़े दल भाजपा को सरकार बनाने का आमंत्रण दिया था लेकिन उसने स्पष्ट कर दिया है कि बदले हालात में सरकार बना पाना उसके लिए मुमकिन नहीं है। फिर राज्यपाल ने शिवसेना को मौका दिया। शिवसेना ने हाथ-पैर तो खूब मारे लेकिन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस का समर्थन पत्र हासिल नहीं कर सकी।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को भी मौका मिला लेकिन वह भी सरकार बनाने का दावा तब तक नहीं कर पाई जब तक कि राज्यपाल ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की संस्तुति नहीं कर दी और उनकी संस्तुति पर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने पर मुहर लगा दी। राज्यपाल के निर्णय के खिलाफ शिवसेना सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गई है।

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वह आरोप लगा रही है कि अगर राज्यपाल भाजपा को बहुमत हासिल करने के लिए तीन दिन का समय दे सकते हैं, तो उसे एक दिन कौन? उसके इस तर्क में दम हो सकता है लेकिन शिवसेना चुनाव परिणाम आने के दिन से ही राज्य में अपना मुख्यमंत्री बनाने की वायद कर रही है।

एनसीपी ने पत्र लिखकर राज्यपाल से सरकार बनाने के लिए 48 घंटे और समय मांगा था जिसे राज्यपाल ने स्वीकार नहीं किया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की संस्तुति कर दी। यह तीसरा मौका है जब महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा है। महाराष्‍ट्र के 59 वर्षों के राजनीतिक इतिहास में साल 1980 में फरवरी से जून और इसके बाद साल 2014 में सितंबर से अक्टूबर तक तक राष्ट्रपति शासन लगा था।