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सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच एक ऐसा रहस्यमयी रास्ता जो सीधे ‘नागलोक’ जाता है

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निधि पाठक | भोपाल/होशंगाबाद

पर्यटन की दृष्टि से हिन्दुस्तान का दिल बन चुके मध्य प्रदेश स्थित सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच कथित तौर पर एक ऐसा रहस्यमयी रास्ता है जो सीधा नागलोक जाता है। इस दरवाजे तक पहुंचने के लिए खतरनाक पहाड़ों को चढ़ाई और बारिश में भीगे घने जंगलों की भी खाक छानना पड़ती है। तब जाकर आप नागद्वारी तक पहुंच पाते हैं।

ये जगह मौजूद है मध्य प्रदेश के एकमात्र हिल स्टेशन विश्व प्रसिद्ध पचमढ़ी के जंगलों में। जहां साल में सिर्फ कुछ दिनों के लिए जाने की परमिशन मिलती है। नियमों के मुताबिक इस इलाके में साल में सिर्फ एक बार ही नागद्वारी की यात्रा और दर्शन का मौका मिलता है।

हर साल लगता है सावन-नागपंचमी मेला
सतपुड़ा टाइगर रिजर्व क्षेत्र होने के चलते यहां प्रवेश वर्जित होता है। रिजर्व फॉरेस्ट मैनेजमेंट यहां जाने वाले रास्तों का गेट बंद कर देते हैं। हर साल नागपंचमी पर यहां एक मेला लगता है। हर साल न सिर्फ मध्य प्रदेश बल्कि छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र और अन्य राज्यों से हाजारों लोग और विदेशी सैलानी भी इस मेले में पहुंचते हैं।

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नागपंचमी के 10 दिन पहले से ही शुरू हो जाती है यात्रा
सावन में नागपंचमी के 10 दिन पहले से ही कई राज्यों के श्रद्धालु, खासतौर से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के भक्त अपनी जान जोखिम में डाल कई किलोमीटर पैदल चलकर यहां पहुंचते हैं। यहां नागद्वारी स्थित एक गुफा है जिसका नाम चिंतामणी गुफा है। यह गुफा 100 फीट लंबी है। इस गुफा में नागदेव की कई मूर्तियां मौजूद हैं।

नागलोक द्वार के पास ही मौजूद है स्वर्ग द्वार
दावा करने वाले यह तक कहते हैं कि स्वर्ग द्वार चिंतामणि गुफा से लगभग आधा किमी की दूरी पर स्थित है। स्वर्ग द्वार में भी नागदेव की ही मूर्तियां हैं। मान्यता है कि जो लोग नागद्वार जाते हैं, उनकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

भक्तों को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं सांप
नागद्वारी की यात्रा करते समय रास्ते में आपका सामना कई ज़हरीले सांपों से हो सकता है, लेकिन राहत की बात है कि यह सांप भक्तों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। सुबह से श्रद्धालु नाग देवता के दर्शन के लिए निकलते हैं। 12 किमी की पैदल पहाड़ी यात्रा पूरी कर लौटने में भक्तों को दो दिन लगते हैं। नागद्वारी मंदिर की गुफा करीब 35 फीट लंबी है।

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बीते 100 वर्षों से भी पहले से जारी है ये धार्मिक यात्रा
जानकारों के मुताबिक नागद्वारी मंदिर की धार्मिक यात्रा को 100 साल से भी ज्यादा हो चुके हैं। कई लोग पीढ़ियों से से इस मंदिर में नाग देवता के दर्शन करने के लिए आ रहे हैं। बता दें कि सबसे पहले 1959 में चौरागढ़ महादेव ट्रस्ट बनाया गया था। इसके बाद साल 1999 में महादेव मेला समिति का गठन किया गया। इस बार ये यात्रा 18 जुलाई से शुरू हुई है और 28 अगस्त तक चलेगी।

ब्रह्ममुहुर्त में ही शुरू हो जाती है नागद्वार मंदिर की यात्रा
जलगली से करीब 12 किलो मीटर की पैदल पहाड़ी यात्रा में भक्तों को दो दिन लगेंगे। गुफा में विराजमान नाग देवता के दर्शन भक्त करते हैं। नागद्वार मंदिर की यात्रा श्रद्धालु सुबह ही शुरू कर देते हैं, ताकि शाम तक गुफा तक पहुंच जाएं। यहां कई जंगली जानवरों और अन्य जहरीले जीवों का खतरा बना भी बना रहता है। यात्रा में पिछले साल करीब 4 लाख श्रद्धालु आए थे। इस बार आंकड़ा बढ़ सकता है।

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पचमढ़ी की नागद्वारी और अमरनाथ यात्रा में कॉमन कनेक्शन
पचमढ़ी की नागद्वारी की यात्रा अमरनाथ जैसी ही है, बाबा अमरनाथ और नागद्वारी की यात्रा श्रावण मास में ही होती है। बाबा अमरनाथ की यात्रा के लिए ऊंचे हिमालयों से होकर गुजरना होता है, जबकि नागद्वारी की यात्रा सतपुड़ा की घनी व ऊंची पहाडिय़ों में सर्पाकार पगडंडियों से पूरी होती है। दोनों ही यात्राओं में भोले के भक्तों को धर्म लाभ के साथ ही प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य के दर्शन होते हैं।

नागद्वारी यात्रा को लेकर मान्यता
पहाड़ियों पर सर्पाकार पगडंडियों से नागद्वारी की कठिन यात्रा पूरी करने से कालसर्प दोष दूर होता है। नागद्वारी में गोविंदगिरी पहाड़ी पर मुख्य गुफा में शिवलिंग में काजल लगाने से मनोकामनाएं पूरी होती है।