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एक क्लिक में समझें मध्य प्रदेश उपचुनाव का पूरा गणित

शिवराज जी को ऐसा तमाचा लगने वाला है जिसको वो याद रखेंगे : कमलनाथ
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मध्य प्रदेश उपचुनाव 2020 (Madhya Pradesh By Election) अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है, हर राजनैतिक दल (Political Party) महामारी के बावजूद भी रैली करने और लोगो से जुड़ने की अधिक से अधिक कोशिश में लगी हुई है। राजनैतिक तर्ज पे देखा जाये तो कांग्रेस और भाजपा दोनों की शाख इस चुनाव पे अटकी हुई है। एक पार्टी तथाकथित ‘धोके’ के बदले का जवाब जनता से चाह रही है तो वही  दूसरी ये दिखाने पर अडिग है कि कैसे उसकी सरकार राज्य में स्थिरता बनाये रखने में कायम है। मतदान (Voting) 03 नवंबर को पूर्ण होने के बाद भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India)  सभी मतों (Votes) की गिनती 10 नवंबर को पूरी करेगा जिसके बाद राज्य में फिर एक बार बड़े राजनैतिक फेरबदल (Political reshuffle) की उम्मीद की जा रही है। चुनाव का निर्धारित समय तो सितम्बर में था लेकिन कोरोना महामारी की वजह से देरी से हो रहा है।

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उपचुनाव होने की वजह
2018 में हुए चुनाव में कोंग्रस पार्टी (Congress Party) ने 230 में से 114 सीट पर जीत दर्ज की थी और भाजपा (BJP) 109 सीट पर ही सिमट कर रह गयी थी, जिसके बाद कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के 01, बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party) के 02 और 04 निर्दलीय उम्मीदवारों (Independent Candidates) के साथ मिलकर बहुमत (Majority को साबित किया और सरकार बनायी। प्रदेश में 15 साल बाद कांग्रेस पार्टी एक बार फिर से सरकार बनाने में कामयाब हो पायी थी, हालांकि इसके 15 महीने बाद ही कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया (Former Cabinet Minister Jyotiraditya Scindia) 10 मार्च को अपने 22 वफ़ादार कांग्रेसी सहयोगियों (Loyal Congress Partners) के साथ मिलकर भाजपा में जुड़ गए जिसके कारण कांग्रेस सरकार बहुमत साबित नहीं कर पायी और परिणाम स्वरूप सरकार गिर गयी, इन्होंने कांग्रेस को छोड़ने की वजह ये बतायी की वहां पे उन्हें महत्व कम दिया जा रहा था।

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इसके बाद न्यायिक प्रक्रियों के पूरे होते ही 23 मार्च को भाजपा के शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan) ने मुख्यमंत्री (Chief Minister) पद की शपथ (Oath) ली। फ़िलहाल कांग्रेस के पास 88 विधायक है, सत्ता में वापिस आने के लिए उन्हें अब पूरी 28 सीटे जितनी पड़ेंगी, हालाँकि 16 सीटों का चुनाव ग्वालियर-चम्बल संभाग (Gwalior-Chambal Region) में होना है जहां पर ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) की अच्छी पकड़ मानी जाती है, जिनपर की कांग्रेस ने धोकेबाज़ी का आरोप भी लगाया है। एक ध्यान देने वाली बात ये भी है की इन क्षेत्रों में हमेशा ही पिछड़े वर्गों व् अनसूचित जातियों के मत निर्णायक साबित हुए है।

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किन सीट पर चुनाव होना है
1. जौरा (Joura)
2. सुमावली (Sumawali)
3. मोरेना (Morena)
4. दिमनी (Dimni)
5. अंबाह (Ambah)
6. मेहगांव (Mehgaon)
7. गोहद (Gohad)
8. ग्वालियर (Gwalior)
9. ग्वालियर पूर्व (Gwalior East)
10. दबरा (Dabra)
11. भांडेर (Bhander)
12. करैरा (Karera)
13. पोहारी (Pohari)
14. बमोरी (Bamori)
15. अशोक नगर (Ashok Nagar)
16. मुंगोली (Mungaoli)
17. सुर्खी (Surkhi)
18. मल्हरा (Malehra)
19. अनूपपुर (Anuppur)
20. साँची (Sanchi)
21. ब्यावरा (Biaora)
22. अगर (Agar)
23. हाटपिप्लया (Hatpipalya)
24. मांधाता (Mandhata)
25. नेपानगर (Nepanagar)
26. बदनावर (Badnagar)
27. सांवेर (Sanwer)
28. सुवासरा (Suvasara)

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कौन से मुद्दे रहेंगे चुनाव में एहम
जिस प्रकार से सरकार ने महामारी के दौरान प्रदेश को संभाला है ये तो बहस करने हेतु बहुत अच्छा विषय है पर महामारी के वक़्त हुई बेरोज़गारी एक आपदा के समान सरकार के सामने खड़ी हुई। मई 2020 में राज्य का बेरोज़गारी दर 27 % से भी ज़्यादा था, इसके साथ-साथ पुलिस के द्वारा घर लौटते मज़दूरों पर हुई निर्दयता भी काफ़ी आलोचनाओं के घेरे में रही, इन सबके होते हुए राज्य की मुख्य समस्याएं जैसे की किसानों का दिक्कतें, मानव संसाधनों का दुरूपयोग, शहरी विकास की धीमी चाल भी काफी ज़रूरी मुद्दे है जिन्हे की हर व्यक्ति अपना मत देने से पहले एक बार ज़रूर सोचेगा।

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पार्टियों की मौजूदी स्तिथि
सिंधिया के पार्टी में आ जाने से भापजा को राज्य में अच्छी खासी स्थिरता मिली है तो वही दूसरी ओर कांग्रेस अपने डेढ़ साल के कार्यकाल की उपलब्धियां और सत्तरूढ़ि दल की नाकामी पे ज़ोर देकर के चुनाव में लड़ रही है। भाजपा को केंद्र में शाषित होने का फायदा तो मिलेगा ही साथ-साथ बहुजन समज पार्टी के विलय से पिछड़ी जातियों के मत भी उन्ही के खेमे में आते नज़र आ रहे है। सिंधिया के भाजपा में शामिल हो जाने से कांग्रेस का मध्य प्रदेश में वोट शेयर भी गिरने के पूरे आसार है। सभी दलों ने डिजिटल रैली कर जनता से जुड़ने के कई तरीके अपनाएं है। राजय का चुनाव कई और भी आने वाले चुनाव में भी दलों व मतदाताओं के ऊपर अनेक प्रकार से प्रभावित  करेगा।

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किस ओर ज़्यादा है रुझान
कांग्रेस ‘गद्दारी’ के विषय को काफ़ी ज़ोर दे के आगे बढ़ रही है तो वहीं भाजपा ‘वही भरोसा, दुगनी रफ़्तार’ के नारे को लेकर जनता के बीच और मजबूती से पहुंच रही है। सत्ता में वापिस आने के लिए कांग्रेस को सभी सीटों पे जीत दर्ज करनी पड़ेगी जो की बसपा (BSP) का भाजपा (BJP) के साथ हो जाने और सिंधिया के समर्थकों का मत उथल-फुथल होने के कारण कांग्रेस के लिए काफ़ी दिक्कतें सामने ला सकता है, दूसरी तरफ भाजपा के लिए ये जीत कई मायनो में आसान नज़र आ रही है। चुनाव के इस मौसम में किसका हाथ आगे आता है या किसका फूल खिलता है ये कहना कठिन व असार्थक सा लगता हैं।

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