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मध्य प्रदेश उपचुनाव: क्या सिंधिया से कन्नी काट रही है भाजपा?

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Madhya Pradesh By Elections 2020: कोरोना का संकट पूरे देश में गहराया हुआ है। लेकिन भारतीय राजनीति को कोई संकट प्रभावित नहीं कर सकता, इसका प्रमाण है मध्य प्रदेश के विधानसभा उपचुनाव पर गरमाई सियासत। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में इन दिनों बीजेपी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) को लेकर लगाए गए उस पोस्टर के काफी चर्चे हैं जिसमें पूछा जा रहा है कहां गायब हैं सिंधिया? लापता सिंधिया के ये पोस्टर बेशक सियासत का हिस्सा हैं लेकिन सवाल जायज भी है कि वाकई बीजेपी में अब कहां हैं सिंधिया और एमपी की 24 सीटों के उपचुनाव हो जाने के बाद कहां होंगे? इसके सीधे अनुमान लगाए जा रहे हैं कि बीजेपी अब सिंधिया से किनारा कर रही है।

Kanishtha | Bhopal

मध्य प्रदेश की 24 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनावों (Bypolls) को लेकर बीजेपी और कांग्रेस अपनी-अपनी रणनीति को पुख्ता करने में जुटी हैं। बीजेपी जहां संगठन को मज़बूत कर ज्योतिरादित्य सिंधिया की मदद से चुनावी तैयारियों को अंतिम रूप दे रही है, वहीं कांग्रेस के कर्ता-धर्ता भोपाल में बैठ कर पार्टी की चुनावी जमीन तैयार कर रहे हैं। इनमें 16 सीटें अकेले ग्वालियर-चंबल अंचल की हैं।इन 16 सीटें को जिताने की नैतिक जिम्मेदारी सिंधिया के कंधों पर है। जीतने के बाद सिंधिया के हाथ क्या लगेगा ये तो नतीजे बताएंगे।

24 में से ग्वालियर चंबल की 16 सीटें जिताने की नैतिक जिम्मेदारी सिंधिया के कंधों पर है जिसमें से 14 सीटें तो सीधे तौर पर सिंधिया समर्थक पूर्व विधायकों से जुड़ी हैं। बाकी मध्य, मालवा, बुंदेलखंड की पांच सीटें अलग है। चुनाव के पहले चुनौती ये कि इनमें से कितने पूर्व विधायकों को सिंधिया मंत्री पद की शपथ दिलवा पाते हैं। फिर उन्हें चुनाव मैदान तक पहुंचाने की चुनौती भी है। उम्मीदवार बनाए गए तो इनमें से 80 फीसद को जिताना भी है। सिंधिया के लिए बड़ा इम्तिहान बीजेपी के साथ जनता को ये बताना भी है कि वे मुख्यमंत्री शिवराज के मुकाबले बड़े जन नेता हैं। भीड़ उनके चेहरे पर भी जुटती है। क्या सिंधिया का ये संघर्ष चुनाव के बाद ख़त्म हो जायेगा या वो यूं ही जुझंते नज़र आएंगे।

वहीं बीते दिन केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी वर्चुअली एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए चंबल में हाइवे की बनाने की बात कही। साथ ही गडकरी ने एक लंबा-चौड़ा भाषण भी दिया लेकिन उनके भाषण में एक ज्योतिरादित्य सिंधिया का जिक्र कहीं नहीं दिखा। वहीं बीजेपी की ओर से प्रत्येक सीट के लिए बनाए गए प्रतिनिधियों में से एक भी सिंधिया खेमे का नहीं है। ये ऐसी छोटी-छोटी बाते हैं जो बताती है कि बीजेपी उप चुनाव में कहीं न कहीं सिंधिया से कन्नी काटी नजर आ रही है।

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बहरहाल इनकार नहीं किया जा सकता कि सिंधिया समर्थकों की वजह से बीजेपी में अगर बगावत बढ़ती है, तो बागी फिर मैदान में आएंगे और ये बागी चुनाव जीत गए तो तय है कि बीजेपी से हाथ भी मिलाएंगे। उस सूरत में सिंधिया क्या अपना रुतबा कायम रख पाएंगे। राजनीति संभावनाओ पर चलती है, तो 24 सीटों के उपचुनाव पर टिकी सिंधिया की सियासत क्या उनका ही सियासी भविष्य तय कर देगी। या उनके विधायक वापस कांग्रेस का दामन थाम लेंगे ये देखने लायक होगा।

सियासी गलियारों में अटकले तेज हैं कि जिसकी तर्ज़ पर अगले चुनाव की बिसात बिछी है, दरअसल, इस वक्त बीजेपी एक तरह से चिंता मुक्त है। उसे पता है कि उप चुनाव जिताने की उससे ज्यादा चिंता सिंधिया को है। आलम ये है कि बीजेपी जानती है कि यदि सिंधिया बहुमत के आंकड़े के आगे भी निकलवा देते हैं और उसके बाद भी यदि दस सीटों पर उम्मीदवार हार जाते हैं तो भी सिंधिया वैसे ताकतवर नहीं रह जाएंगे, जैसे अभी खुद को वे और उनके समर्थक प्रोजेक्ट कर रहे हैं। यानी बीजेपी ही इस वक़्त मुनाफ़े मे है।

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अगर ये चुनाव सिंधिया अपने जलवे से जिता लाते हैं, तब जरूर ग्वालियर चंबल की सियासत नई करवट लेगी। तब नरेंद्र सिंह तोमर, प्रभात झा , जयभान सिंह पवैया जैसे नेताओं को भी न चाहते हुए सिंधिया के लिए हाथ बढ़ाने होंगे और उनके निर्णयों के साथ सहमति भी रखना होगी। वैसे इसका निर्णय तो चुनाव के नतीजों के बाद ही लिया जा सकता है। फ़िलहाल ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी माँ राजमाता सिंधिया कोरोना पाॅजिटिव होने के चलते नई दिल्ली स्थित मैक्स हॉस्पिटल मे भर्ती हैं।