Home » साँची का इतिहास और इस उपचुनाव का राजनीतिक गणित, पढ़ें हर्ष श्रीवास्तव की स्पेशल रिपोर्ट

साँची का इतिहास और इस उपचुनाव का राजनीतिक गणित, पढ़ें हर्ष श्रीवास्तव की स्पेशल रिपोर्ट

sanchi seat, mp by election 2020, bjp prabhuram choudhary, congress madanlal choudhary
Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

मध्य प्रदेश साँची विधानसभा उपचुनाव 2020; मध्य प्रदेश की साँची विधानसभा सीट का अपने आप में ही एक लंबा-चौड़ा इतिहास रहा है, साँची सीट अनुसूचित जाति उम्मीदवार के लिए आरक्षित हैं, साल 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के चुने विधायक प्रभुराम चौधरी इस बार बीजेपी की टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं, कमलनाथ की सरकार गिरने के बाद, बाकी 27 सीटों की तरह यहाँ भी उपचुनाव होने हैं, साँची प्रदेश की राजधानी, भोपाल से महज़ 46 किलोमीटर की दूरी पर हैं, और पर्यटन के लिहाज़ से ये एक बड़ा आकर्षण का केंद्र है। इसकी लोकप्रियता प्रदेश या देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में  विख्यात हैं, साँची विधानसभा सीट विदिशा लोकसभा सीट के अन्तर्गत आती है। रायसेन जिले की भोजपुर, साँची, सिलवानी, उदयपुरा कुल चार विधानसभा सीटे हैं।

यह भी पढें: मध्य प्रदेश उपचुनाव : एक क्लिक में देखें किस सीट से कौन-कौन से प्रत्याशी हैं आमने-सामने

सांची; धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व का स्थल
सांची, जिसे काकानाया, काकानावा, काकानाडाबोटा तथा बोटा श्री पर्वत के नाम से प्राचीन समय में जाना जाता था, साँची में कई स्तूप हैं, सभी के सभी पहाड़ी चोटी पर सम्राट अशोक महान्  द्वारा बनवाये गए थे, अशोक का बौद्ध से गहरा लगाव था, स्थान तो बौद्ध धर्म से संबंधित है लेकिन सीधे बुद्ध के जीवन से नहीं, मौर्य काल के महान् राजा अशोक ने यहाँ अपने रहते हुए पहला स्तूप बनवाया और कई स्तंभ भी बनवाए, इसमें प्रसिद्ध अशोक स्तंभों के मुकुट, जिनमें चार शेर पीछे की ओर खड़े हैं, को भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया है।

READ:  Lockdown Diary: लॉकडाउन डायरी- डरें या डटें!

यह भी पढें: मध्य प्रदेश उपचुनाव : बीजेपी के 28 उम्मीदवारों की फुल लिस्ट, देखें किसे कहां से मिला टिकट

समय का खेल; राजनीति और स्तूप दोनों ने झेली मार
कहते हैं कि वक़्त हर कभी अच्छा नहीं रहता, समय की मार किसी को भी पड़ सकती हैं, ठीक ऐसा ही देखने को मिला मध्यप्रदेश में जहा रात ही रात सरकार पलट जाती हैं, सुबह तक प्रदेश में वही पुरानी सरकार पैर जमा लेती हैं, जिसने 15 साल तक राज किया, अब एक बार फ़िर से चुनाव (उपचुनाव) होने हैं, जो तय करेगा कि प्रदेश में गद्दी का असली हक़दार कौन हैं। ठीक ऐसा साँची में भी हुआ था जहा मौर्य काल के महान् राजा  अशोक के साम्राज्य के जाने के बाद इस जगह को भूला दिया गया था, समय ने इसकी मार झेली और धीरे-धीरे दोनों स्तूप और जगह कही खो सी गयी। 1818 में सांची को फिर से खोजा गया और यह पाया गया कि संरचना के अद्भुत टुकड़े अच्छे आकार में नहीं थे, धीरे-धीरे ऐतिहासिक और स्थान का धार्मिक महत्व पहचान लिया गया, स्तूपों का जीर्णोद्धार कार्य 1881 में शुरू हुआ और आखिरकार 1912 और 1919 के बीच इनकी सावधानीपूर्वक मरम्मत की गई।

READ:  IPL Suspension : क्या इंग्लैंड में आयोजित होगा शेष आईपीएल ?

यह भी पढें: कांग्रेस उम्मीदवारों की तीसरी लिस्ट जारी, इन चार लोगों को दिया टिकट

उत्कृष्ता की पहचान; साँची स्तूप
नुक़्सान पहुंचने के बावजूद भी सांची देश में सबसे अधिक विकसित और आकर्षक बौद्ध स्थल है, सांची मुख्य रूप से स्तूपों और स्तंभों का एक स्थान है, इसका प्रवेश द्वार प्रारंभिक शास्त्रीय कला का बेहतरीन नमूना हैं, स्तंभों पर उकेरे गए चित्र और स्तूप घटनाओं की चलती कहानी को बुद्ध का जीवन बताते हैं।

साँची स्तूप के पीछे की कहानी
कहा जाता है कि सम्राट अशोक ने अपनी प्रिय पत्नी के कहने पर ही साँची में यह सुंदर स्तूप बनवाया था। देवी, विदिशा के एक श्रेष्ठी की पुत्री थी और अशोक ने उस समय उससे विवाह किया था जब वह अपने पिता के राज्यकाल में विदिशा का कुमारामात्य था। सांची की कीर्ति राजपूत काल तक बनी रही किंतु औरंगजेब के काल में बौद्ध धर्म का केंद्र सांची गुमनामी में खो गया, उसके बाद यहां चारों ओर घनी झाडियां व पेड़ उग गए, 19वीं सदी में कर्नल टेलर यहां आए तो उन्हें सांची के स्तूप बुरी हालत में मिले, उन्होंने उनको खुदवाया और व्यवस्थित किया वहीं कुछ इतिहासकार मानते हैं उन्होंने इसके अंदर धन संपदा के अंदेशे से खुदाई करवाई जिसकी वजह से इसकी संरचना को काफ़ी नुकसान भी हुआ इसके बाद पुराविद मार्शल ने इसका जीर्णोद्धार करवाया, चारों ओर घनी झाड़ियों के मध्य सांची के सारे निर्माण का पता लगाना और उनका जीर्णोद्धार कराके मूल आकार देना बेहद कठिन था, किंतु उन्होंने बखूबी से इसकी पुरानी कीर्ति को कुछ हद तक लौटाने में मदद की।

READ:  लोग कोरोना से मर रहे हैं और बीजेपी नेता राजश्री गुटखा के लिए चिंतित है

यह भी पढें: मध्य प्रदेश उपचुनाव: ताज़ा सर्वे ने उड़ाई बीजेपी की नींद, कमलनाथ का मुख्यमंत्री बनना तय

मध्य प्रदेश की राजनीति में आज का औरंगजेब कौन?
साँची और उनके स्तूपों को पहले औरंगज़ेब ने क्षति पहुचायी और ये भी हो सकता था की विश्व में भारत को ख़्याति देने वाला साँची कही खो ही जाता और कभी न मिलता, सोचने वाली बात ये नहीं हैं, बात ये हैं कि आज का औरंगज़ेब कौन हैं जो मध्यप्रदेश की राजनीती और जनता को नुक्सान पंहुचा रहा हैं ?

Ground Report के साथ फेसबुकट्विटर और वॉट्सएप के माध्यम से जुड़ सकते हैं और अपनी राय हमें Greport2018@Gmail.Com पर मेल कर सकते हैं।