क्या भारत में ‘लव-जिहाद’ के ख़िलाफ क़ानून संभव है, क्या कहता है संविधान?

‘लव जिहाद’ ये शब्द आपने पहली बार कब सुना या पढ़ा होगा? वर्तमान समय में इस शब्द को सुनने या पढ़ने के बाद आप क्या सोचते और समझते हैं? अगर आप इस शब्द को लेकर पड़ताल करेंगे तो पाएंगे कि भारत में 2014 से पहले पढ़ने और सुनने में बिल्कुल न के बराबर ही मिलेगा। इक्का-दुक्का हिंदुत्व संगठन या मीडिया पर होने वाली चर्चा में लव जिहाद जैसे शब्द चर्चा का हिस्सा बनते थे।

वर्तमान में हर आमजन की ज़ुबान से ये शब्द सुनने को मिल जाएगा या इस पर लोगों के बीच बहस होती नज़र आएगी। राजनीति की कोख से जन्मे इस शब्द को पाल-पोस कर हर एक की ज़ुबान तक पहुंचाने में भारतीय मीडिया ने सबसे अहम रोल अदा किया है। मीडिया इस शब्द की परवरिश से ही देश में एक समुदाय के प्रति नफरत फैलाने के लिय करती रही है। आज उसका असर ये हुआ कि लोग इस शब्द को सुनते ही एक समुदाय को बुरा भला करते हैं। यहां तक कि लोग हिंसा पर भी उतर आते हैं।

आख़िर ये लव जिहाद है क्या बला ?

आसान भाषा और कम शब्दों में आप इसे यूं समझ सकते हैं। लव जिहाद दो शब्दों से मिलकर बना है। अंग्रेजी भाषा का शब्द लव यानी प्यार, मोहब्बत, इश्क और अरबी भाषा का शब्द जिहाद। जिसका मतलब होता है किसी मकसद को पूरा करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देना।

यानी जब एक धर्म विशेष को मानने वाले दूसरे धर्म की लड़कियों को अपने प्यार के जाल में फंसाकर उस लड़की का धर्म परिवर्तन करवा देते हैं तो इस पूरी प्रक्रिया को लव जिहाद कहा जाता है। लव जिहाद की ये परिभाषा हमारे देश की मीडिया और कुछ कट्टर हिंदू संगठन ने मिलकर तय की है।

अबतक लव जिहाद जैसे शब्द को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया है कि लव जिहाद होता है और मुस्लिम युवक हिंदू लड़कियों को अपने प्यार के जाल में फंसाकर उनका धर्म परिवर्तन करवाकर लव जिहाद करते हैं। इसकी शुरुआत तब हुई जब केरल हाईकोर्ट ने 25 मई को हिंदू महिला अखिला अशोकन की शादी को रद्द कर दिया था। अखिला अशोकन ने दिसंबर 2016 में मुस्लिम शख्स शफीन से निकाह किया था।

लव जिहाद पर क्यों बढ़ता जा रहा विवाद ?

देशभर में इस मुद्दे को लेकर राजनीति बढ़ती ही जा रही है। कुछ हिंदू संगठन इस पर मरने-मारने पर उतारूं हैं। अब इस मुद्दे पर क़ानून बनाने की बात की जा रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषण में इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश का उल्लेख करते हुए कहा है कि ‘शादी-ब्याह के लिए धर्म-परिवर्तन आवश्यक नहीं है, नहीं किया जाना चाहिए और इसको मान्यता नहीं मिलनी चाहिए। सरकार भी निर्णय ले रही है कि हम लव-जिहाद को रोकने के लिए सख़्ती से कार्य करेंगे। एक प्रभावी क़ानून बनाएंगे।’

देश के अन्य राज्य भी लव जिहाद के मसले पह क़ानून बनाने की बात की लगातार कहते आ रहे हैं। हालही में दिल्ली से सटे हरियाणा में एक लड़की की गोली मार कर हत्या के बाद इस मामले ने काफी तूल पकड़ लिया है। वहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि महज शादी के लिए धर्म परिवर्तन वैध नहीं है। जस्टिस एससी त्रिपाठी ने प्रियांशी उर्फ समरीन व अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए नूरजहां बेगम केस के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने कहा है कि शादी के लिए धर्म बदलना स्वीकार्य नहीं है।

क्या हैं कानूनी प्रावधान ?

हालांकि ‘लव जिहाद’ शब्द की कोई क़ानूनी हैसियत नहीं है। इसे ना ही अबतक किसी क़ानून के तहत परिभाषित किया गया है और न ही केंद्र या राज्य की किसी एजेंसी ने किसी क़ानूनी धारा के तहत इम मामले में कोई केस दर्ज किया है। यहां तक की गृह मंत्रालय भी कहता है कि जबरन अंतरजातीय विवाह को ‘लव-जिहाद’ कहा जा रहा है।

लव जिहाद के ज़्यादातर केसों में यौन शोषण संबंधी कानूनों के तहत मुकदमे चलते रहे हैं। आरोपी को पेडोफाइल मानकर पॉक्सो और बाल विवाह संबंधी कानूनों के तहत भी केस चलते रहे हैं। इसके अलावा, बलपूर्वक शादियों के मामले में कोर्ट आईपीसी के सेक्शन 366 के तहत सज़ा दे सकते हैं। महिला की सहमति के बगैर यौन संबंध बनाने का आरोप साबित होने पर 10 साल तक की कैद की सज़ा हो सकती है।

ऐसे मामलों में कानूनी पेंच यहां फंसता रहा है कि मुस्लिम शादियां शरीयत कानून और हिंदू शादियां हिंदू मैरिज एक्ट के तहत कानूनन होती हैं। चूंकि मुस्लिम शादियों में सहमति दोतरफा अनिवार्य है इसलिए इन शादियों में अगर यह साबित हो जाता है कि सहमति से ही शादी हुई थी, तो कई मामले सिरे से खारिज होने की नौबत तक आ जाती है।

केंद्र का इस मसले पर रुख

केंद्र सरकार  कह चुकी है कि ‘लव जिहाद’ जैसा कोई टर्म मौजूदा कानूनों के तहत परिभाषित नहीं किया गया है और इससे जुड़ा कोई मामला केंद्रीय एजेंसियों के संज्ञान में नहीं आया है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी है। रेड्डी ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद किसी भी धर्म को स्वीकारने, उस पर अमल करने और उसका प्रचार-प्रसार करने की आजादी देता है।

उन्होंने कहा कि केरल उच्च न्यायालय सहित कई अदालतों ने इस विचार को सही ठहराया है। रेड्डी ने कहा, ‘यह ‘लव जिहाद’ शब्द मौजूदा कानूनों के तहत परिभाषित नहीं है। लव जिहाद का कोई मामला केंद्रीय एजेंसियों के संज्ञान में नहीं आया है।’ उन्होंने यह भी कहा कि एनआईए ने अब तक केरल में अलग-अलग धर्मों के जोड़ों के विवाह के दो मामलों की जांच की है।

क्या कहता है स्पेशल मैरेज एक्ट

संविधान में सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए गए हैं जिसमें से एक धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार भी शामिल है। इसके अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को किसी भी धर्म को मानने, पालन करने व प्रचार करने की स्वतंत्रता है। कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को कोई विशेष धर्म मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।

वहीं स्पेशल मैरेज एक्ट भी है जिसमें अलग-अलग धर्म से आने वाले लड़के और लड़की बिना अपना धर्म बदले शादी कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए कई प्रावधान भी किए गए हैं जिसे पूरा करने के बाद ही आप शादी कर सकते हैं।

अदालतें और अंतर धार्मिक विवाह

अदालतों के पास वैवाहिक दंपतियों की धार्मिक पहचान को मान्यता देने का अधिकार है, पर केवल तभी जब उनके समक्ष विवाद परिवार के कानूनों से संबंधित सवालों से जुड़ा हो। इस संबंध में साल 2000 में सुप्रीम कोर्ट ने लिली थॉमस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जहां एक हिंदू पत्नी ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उनका हिंदू पति दूसरी हिंदू महिला से शादी करने के लिए इस्लाम अपनाने जा रहा है।

अदालत ने फैसला सुनाया था कि हिंदू पर्सनल लॉ में दो शादियां वैध नहीं हैं इसलिए कोई शख्स मुस्लिम पर्सनल लॉ का लाभ नहीं उठा सकता। ऐसे में यह धर्म परिवर्तन कपटपूर्ण और अवसरवादी है।

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