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अब नहीं है कोई ‘धरतीपकड़’

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राकेश समाधिया।
भारत की राजनीति अगर कई तरह के वाद- विवादों से भरी पड़ी है तो कुछ ऐसे अपवाद हैं,  जिनकी चुनाव में हार के बाद भी छवि धूमिल नहीं हुई। उनके आत्मविश्वास की वजह से उन्हें याद रखा जाएगा। आज हम भारतीय राजनीति के ऐसे शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसने 350 बार चुनाव लड़ा लेकिन एक बार भी नहीं जीते। जनता के बीच उन्हें धरतीपकड़ के नाम से जाता है। नाम है काका जोगिंदर सिंह। जिन्होंने पार्षदी से लेकर विधानसभा, लोकसभा, राष्ट्रपति और यहां तक प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ भी चुनाव लड़ा।

 

कहा जाता है जोगिंदर काका की जिद से चुनाव आयोग भी परेशान हो गया था। चुनाव का माहौल है, देश अपने सांसद और फिर संसदीय प्रणाली के तहत प्रधानमंत्री चुनेगा, ऐसे वक्त काका का याद आना स्वाभाविक ही है। चलो आपको बताते चले कि आखिर जोगिंदर काका को धरतीपकड़ क्यों कहा जाता रहा है।

दरअसल, धरतीपकड़ कुश्ती का दांव होता है। इसमें चित हो चुका पहलवान ज़मीन से ऐसे चिपक जाता है। ऐसा लगता है कि उसने धरती को पकड़ लिया हो। इस तरह वह हारने से बच जाता है। पिछले कुछ समय से यह शब्द राजनीति में उन लोगों के लिए इस्तेमाल हो रहा है। जिन्होंने चुनाव भले ही बेहिसाब हारे हों, लेकिन उनके आत्मविश्वास ने मानो धरती पकड़ रखी है जो हिलने का नाम ही नहीं लेता।

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काका ने साल ने 1992 में राष्ट्रपति चुनाव में हाथ आजमाया। इस चुनाव में डॉ. शंकर दयाल शर्मा, जॉर्ज गिलबर्ट स्वेल और राम जेठमलानी थे। इस चुनाव में जब काका की तरफ से नमांकन भरा गया तो गड़बड़ी की वजह से रद्द कर दिया। लेकिन जब नामांकन की दोबारा जांच की गई तो उनके ना मांकन को स्वीकार कर लिया।

 

इस चुनाव में काका 1035 वोट के साथ चौथे स्थान पर थे। इस चुनाव में शंकरदयाल शर्मा राष्ट्रपति बने। वहीं राम जेठमलानी तीसरे स्थान पर रहे। काका का अपना अलग अंदाज था। वे हार का रिकॉर्ड कायम करना चाहते थे। इसलिए 350 बार चुनाव लड़े और जीते एक बार भी नहीं।

काका कहते थे कि चुनाव में खड़े होते रहेंगे। अगर चुनाव में जमानत जब्त भी होती है तो कोई बात नहीं। जमानत की जब्त राशि देश के खाते में जाती है। काका कभी किसी पार्टी से चुनाव नहीं लड़े। वे किसी पार्टी में शामिल नहीं हुए और हमेशा निर्दलीय चुनाव लड़ते रहे।

काका जोगिंदर सिंह

काका का जन्म 1934 गुजरांवाला (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ। उनके 16 भाई -बहन थे जिसमें उनका नंबर 14 था। वे यूपी में अपना टेक्सटाइल बिजनेस संभालते थे। इसी बिजनेस के बल पर वे चुनाव लड़ते थे। उन्होंने एक बार इंटरव्यू में कहा था कि किसी भी चुनाव में प्रचार में एक रुपया का खर्चा नहींं  किया है। उनका हमेशा खुद का घोषणापत्र होता था जिसमें कुछ मुद्दे विशेष रहते थे। जैैैैसे विदेशी कर्जा चुकाना, बच्चों का बचपन बचाना और देश की अर्थव्यवस्था कोो पटरी पर लाने के लिए बार्टर सिस्टम लागू करना शामिल थे।

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काका की हार ही काका की पहचान भारतीय राजनीति में रह गई। उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा। हर चुनाव में हार के बाद भी हार नहीं मानी। काका को याद करते हुए बस इतना कहना है , कि बदलती भारतीय राजनीति में उनसे सीख लेना जरूरी है।

जोगिंदर सिंह को 19 दिसंबर 1998 को पैरालाइसिसक अटैक के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया। 23 दिसंबर 1990 में उनका निधन हो गया। 80 साल की उम्र में उन्होंने 300 से ज्यादा चुनाव लड़ा। कम बात है।

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