Bombay High court slams modi Govt: Tablighi jamat Muslims bali ka bakra corona

क्या ‘व्यक्ति विशेष’ की भूमिका और उसकी छवि आज भी वही प्रभाव डालती है?

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चित्रांश सक्सेना | भोपाल

राष्ट्रवाद का पर्याय बन चुके नरेंद्र दामोदर दास मोदी की छवि आम जनमानस के मन में एक ऐसे नेता के रूप में बन चुकी है जो किसी जमाने में पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, की हुआ करती थी। भारत प्राचीन काल से ही एक राजतन्त्र से व्यवस्थित राष्ट्र रहा है, जिसमें समय समय पर अलग अलग राजाओं ने शासन किया और अपने अलग तरीके से नेतृत्व कर पहचान बनाईं।

लोकतंत्र में राजशाही तो समापत हो गई, लेकिन एक नेतृत्व के प्रति भेड़चाल ज्यों की त्यों है, इसे स्वामी भक्ति की संज्ञा दी जाए या इसकी कितनी ही विवेचना की जाए। ये बहस के लिए अलग विषय प्रतिपादित करती है। आज उक्त नेतृत्व या छवि को जनमानस अपना सर्वेसर्वा मानना चाहता है जो उन्हें बेहतरी के सपने दिखाए, अपने आचरण से उनकी संस्कृति को कट्टरता के साथ बल दे। इस कड़ी में परिवारवाद पर एकल व्यक्तित्व की छवि प्रारम्भ से ही हावी रही है।

चाहे आज पूरा देश गांधी परिवार को परिवारवाद के प्रति कोस रहा हो लेकिन पंडित नेहरू और महात्मा गांधी की राजनीतिक धरोहर को जिस तरह से इंदिरा गांधी ने आगे बढ़ाया उसमें उनके नेहरू पुत्री और गांधी जी के उपनाम से एक सहानुभूति तो मिली लेकिन स्वयं के व्यक्तित्व की कुशलता से ही समूचे विश्व ने उन्हें ‘आयरन लेडी’ जैसे शब्दों से परिभाषित किया।

वस्तुतः एक कुशल नेत्री होने के वावजूद, आपातकाल के दंश ने उन्हें व उनके दल कांग्रेस को अभी तक जकड़ रखा है इसका उत्तर आज भी किसी भी बुद्धि जीवी कांग्रेसी के पास नही है। इंदिरा के तिलिस्म को तोड़ने के लिए उनके द्वारा की गई यह भारी चूक का ही नतीजा था कि जय प्रकाश नारायण जैसे गांधीवादी व्यक्ति ने इंदिरा का विरोध किया और आज़ाद भारत का पहला इतना बढ़ा अहिंसक आंदोलन सामने आया जिसमें क्षेत्रीय युवाओं के विद्रोही स्वभाव के संबल से इतना उत्तेजित हुआ कि जो देश ‘इंदिरा इज इंडिया’ और ‘इंडिया इज इंदिरा’ के नारे लगा रहा था वो इंदिरा गांधी को विपक्ष में बैठने को मजबूर कर देता है।

लेकिन इंदिरा का स्वयं का यह तिलिस्म कहें या कूटनीतिक समझ जो उन्होंने समर्थन देकर फिर समर्थन वापस लेने के पैतरे से पुनः चुनाव करवा कर पूर्ण बहुमत से कांग्रेस को विजय श्री दिला दी लेकिन इसी दौरान कई विपक्षी दल जैसे बीजेपी जदयू राजद क्षेत्रय दलों को काफी बल मिल गया और अपनी अलग पहचान के साथ लोकतंत्र का मन्दिर मजबूत विपक्ष को लेकर और व्यवस्थित तो हुआ लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मचे कोलाहल और संवेदना ने उनके पुत्र राजीव गांधी को देश का सिरमौर बना लिया।

राजीव गांधी अपनी अलग पहचान और व्यक्तित्व के लिए धीमे से ही सही गांधी परिवार की पहचान से हट कर देश के ऐसे नेता के रूप में स्थापित हुए जिसमें नए सपने दिखाने की क्षमता भी थी और नई तकनीक का उपयोग करने की जिज्ञासा भी। भारत के राजनीतिक विकास के पथ पर उपजे क्षेत्रीय दलों ने स्वयं को धीमी रफ्तार से ही सही लेकिन इतना मजबूत कर लिया कि एक समय यह कहा जाने लगा कि भविष्य क्षेत्रीय दलों का ही है।

लेकिन क्षेत्रवाद, समाजवाद को विशेष धुरी बना उपजे दलों का मुकाबला गांधीवादी विचारधारा और एकात्म मानववाद की विचारधारा के आगे फीका रहा और एक क्षेत्र विशेष के कर्णधार के रूप में ही पहचान बना सके। कांग्रेस की कुशलता और अजय विरासत को लेकर कई राजनीतिक पंडितो ने समय-समय पर अपने अवलोकन दिए लेकिन जितनी बेहतरी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कांग्रेस को रोकने की समझ विकसित की कोई ओर न कर सका।

RSS ने राष्ट्रवाद के नाम पर हिंदुत्व को परम वैभव की ओर ले जाने वाली एक सरल दिखाई देने वाली विचार धारा ने पहले राममंदिर आंदोलन के तौर पर लालकृष्ण आडवाणी को स्थापित किया और अटल विहारी वाजपेयी को सेक्युलर छवि के साथ सबके सामने ला कर खड़ा कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस के ऊपर अन्य दल हावी रहे और एक लंबे अरसे के बाद भी कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा।

गांधी परिवार के प्रति खिंचाव और बीजेपी के खराब मैनेजमेंट का नतीजा ही 2009 का लोकसभा चुनाव रहा जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी के फील गुड फैक्टर और ‘इंडिया शाइन’ के नारों को सिरे से नकार दिया UPA को बहुमत मिलने से एक बात तो निश्चित हो गयी कि केंद्र में सरकार चलाने की काबिलियत के मामले में कांग्रेस अन्य दलों से कई कदम आगे है और बाकी दलों को अभी और सीखने की जरूरत है।

एक कुशल अर्थशास्त्री और विविध व्यक्तिगत उपलब्धियों के बावजूद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कभी भी स्वतंत्र प्रधानमंत्री की छवि को विकसित नहीं कर पाए। अपनी किताब में श्री बारू ने मनमोहन सिंह को ‘एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री’ की उपाधि तक दे डाली। जिसे विपक्षी दलों ने जमकर भुनाया। खैर यह एक ऐसा दौर का प्ररम्भ था जिसकी कल्पना राजीव गांधी ने ‘डिजिटल इंडिया’ की रूप रेखा रखते समय सोची होगी।

मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व भारतीय राजनीति के घटनाक्रम में एक बड़ी बहस का विषय बन जाने से एक ऐसा प्रश्न देश में एकाएक उठने लगा कि प्रधानमंत्री कैसा होना चाहिए? अब बात देश के बुनियादी मुद्दों से हट कर व्यक्तित्व की लड़ाई और श्रेष्ठ एवं सर्वश्रेठ के बीच उलझ कर रह गई है। इसमे सोनिया गांधी के इटली मूल से होने के चलते कांग्रेस के पास नवांकुर नेता राहुल और इंदिरा जैसी दिखने वाली प्रियंका के अलावा कोइ ओर विकल्प नजर नहीं आता।

ऐसी स्थिति में मनमोहन सिंह को चुनना एक तरह से सिख दंगो पर मलहम के तौर पर देखा गया लेकिन उनके कार्यों पर हाई कमान के निर्देश जैसे प्रश्नों का बार-बार उठना और विपक्ष के द्वारा भरपूर तौर से उनकी कार्यशैली और कमज़ोर हिंदी के विरोध ने पूरे देश मे एक कुशल अर्थशास्त्री को कटघरे में तो खड़ा किया ही साथ ही कांग्रेस के परिवारवाद में व्यक्तित्व कौशल की कमी के चलते कई कट्टर कांग्रेसी इस कदर हतोत्साहित हुए की 2014 में मोदी को अपना वोट देने से खुद को रोक नहीं पाए।

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में कई ने इसे ‘मोदी इफेक्ट’ बताया तो कई ने इसे हिंदुत्व की लड़ाई बताया लेकिन स्थिति इसके उलट ही नजर आती है। जिस तरह से इंदिरा के व्यक्तित्व के समक्ष कोई दूसरा नेता नहीं था ठीक उसी तरह मोदी के व्यक्तित्व को लेकर आरएसएस और बीजेपी की मेहनत के आगे कोई दूसरा दूर तक दिखाई नहीं दिया। कुछ समय नीतीश कुमार को लेकर बात बनी लेकिन वे भी मैनेज हो गए।

इसके बाद नरेंद्र मोदी एक चक्रवर्ती की तरह 2014 में 30 साल के रिकॉर्ड को तोड़कर प्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री बने। आज 2019 के लोकसभा चुनाव के 6 चरणों मे कई संसदीय क्षेत्रो में ‘मोदी इफेक्ट’ वही ज़ोर पकड़े हुए हैं जिसमें भोपाल की हाई प्रोफाइल सीट बड़ा उदाहरण है, लेकिन कांग्रेस और विपक्षी दलों का बिना नेता के सिर्फ मैनेजमेंट और प्रत्याशियों पर निर्भरता लोकतंत्र के निर्देश को तो स्पष्ट कर रहा है।

देखना ये है कि क्या वे एक ऐसे व्यक्तित्व के समक्ष जीत हासिल कर पाएंगे जिसके मुकाबले किसी भी दूसरे बड़े नेता को प्रधानमंत्री के रूप में स्पष्ट नहीं किया गया है। 2019 का चुनाव काई मायनों में अति महत्वपूर्ण है। साथ ही ये, क्या एक व्यक्ति विशेष की भूमिका और उसकी छवि आज भी वही प्रभाव डालती है? जो इंदिरा राजीव के जमाने मे डालती थ। क्या मैनेजमेंट और प्रत्याशियों की सीधे भूमिका ज्यादा फायदेमंद साबित होती है? जैसे कई सवाल हमारे सामने खड़े करता है।

(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता और संचार विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं)