Lok Sabha Election 2019 : Prime minister Narendra modi kedarnath visits viral pictures fake news

सावधान! झुठों की फौज़ आपके दिमाग को बनाना चाहती है कचराघर

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सौरभ कुमार | विचार

चुनाव प्रचार का आखिरी दिन बीत चुका था, देश भर के नेता महीने भर से ज्यादा चली चुनावी अभियानों के बाद सुस्ता रहे थे कि तभी अचानक टीवी और मोबाइल के स्क्रीन्स पर एक तस्वीर तैरने लगी जिसमें देश के प्रधानमंत्री अलग अलग पोज करते हुए दिखे और एक पूरी फ़ौज सोशल मीडिया उन्हें ट्रोल करने के लिए टूट पड़ी। पिछले कुछ समय से यह घटनाक्रम अब सामान्य सा लगने लगा है कि तस्वीर या विडियो के आते हीं उसे जांचे और परखे बिना, सच्चाई जाने बिना ट्रोलर्स की भीड़ कूद पड़ती है और प्रधानमंत्री पद की गरिमा का ख्याल किये बिना उनकी भाषा गाली गलौच तक उतर जाती है। प्रधानमंत्री अपनी माँ से मिलने जायें या साधना करने, वह अक्षय कुमार के साथ इंटरव्यू में अपने निजी अनुभवों पर चर्चा करें या राडार पर अपनी सलाह बताएं।

भारत के किसी भी नागरिक के लिए यह देखना दुखद है कि किस तरह विपक्ष का पूरा प्रचार तंत्र अपनी निति या योजना के प्रचार के बजाये प्रधानमंत्री की छवि को धुंधला करने पर केन्द्रित है और इसमें सिर्फ कार्यकर्ता और कंप्यूटर स्क्रीन पर बैठी टीम नहीं बल्कि राष्ट्रीय नेता भी शामिल हैं। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए बहुत ही ज्यादा खतरानाक है कि विपक्ष के सबसे बड़े नेता राहुल गाँधी अपनी विश्वसनीयता को खूंटे में टांगकर, देश तो छोडिये विदेशी संस्थाओं का हवाला देकर झूठ फैलाने का प्रयास कर रहे हैं और इन प्रयासों का कई बार भंडाफोड़ हुआ है। पहले फ्रांस के प्रधानमंत्री का हवाला देकर राहुल ने संसद की बहस में झूठ बोला जिसका खंडन करने के लिए खुद फ्रांस की सरकार को आगे आना पड़ा।

राफेल को लेकर आंकड़ों और आरोपों के कई झूठ फैलाने के प्रयास किये गए, आप इसे निर्लज्जता की इन्तेहाँ कह लीजिये या अमानवीयता की हद, जब गोवा के मुख्यमंत्री और पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर परिकर गंभीर बिमारी के हालत में अस्पताल में भर्ती थे तब उनसे मिलने पहुँचे राहुल गाँधी ने वहां से बाहर आकर मीडिया के सामने मनोहर पर्रिकर के हवाले से झूठ कहा जिसके खंडन के लिए खुद परिकर को उस बीमार हालत में भी मीडिया के सामने आना पड़ा।

सोचिये की यह कितने शर्म की बात है कि मनोहर पर्रीकर के स्पष्ट खंडन के बाद भी जब आज पर्रीकर हमारे साथ इस दुनिया में नहीं हैं, राहुल गाँधी हर मीडिया इंटरव्यू में अपने दावे को दुहरा रहे हैं और कोई उनसे सवाल नहीं कर रहा। भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ होगा जब इतने बड़े नेता को अपने गलत बयान के लिए देश के सर्वोच्च अदालत से माफ़ी मांगनी पड़ी हो, जब नेता के भ्रामक ट्वीट के लिए ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी को अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से उसका खंडन करना पड़ा हो।

खैर अभी हम ज्यादा इतिहास न खंगालते हुए नरेन्द्र मोदी की केदारनाथ के गुफाओं में ध्यान करने सम्बन्धी सोशल मीडिया पर आये प्रतिक्रियाओं पर बात करते हैं। पिछली सरकारों ने जिस तरह अपनी राजनीति के शीर्ष काल में भगवा को अछूत बना दिया था उसके बाद कोई प्रधानमंत्री अगर भगवा में लिपटा हुआ दिखे तो लोगों के पेट में मरोड़ उठना स्वाभाविक है और इसपर एक अच्छे स्वस्थ बहस की सम्भावना भी है, लेकिन प्रायोजित एजेंडा चलाने वालों ने इसे बस एक ट्रोल भर बनाकर रख दिया, देश के प्रधानमंत्री के लिए फूहड़ से फूहड़ भाषा का खुलेआम इस्तेमाल किया गया।

प्रधानमंत्री के केदारनाथ दौरे के क्या हैं मायने?
हम में से शायद ही कोई हो जिसने 2013 में केदारनाथ में हुई भीषण तबाही के दृश्य न देखें हों, एक बसा बसाया शहर तिनकों के ढेर की तरह बिखर गया था और न जाने कितने लोगों ने अपने जान-माल से हाथ धोया था। हम सब यह अच्छे से जानते हैं कि केदारनाथ जैसे धार्मिक स्थलों में सालभर पर्यटक और भक्त बाबा भोलेनाथ के दर्शन के लिए आते हैं। उनकी यह यात्रा उनके धार्मिक आस्था के लिए तो महत्वपूर्ण है हीं मगर उसके साथ ही इसी धार्मिक पर्यटन से आस-पास रहने वाले हजारों लोगों का रोजगार चलता है।

केदारनाथ धाम में लगने वाली हजारों दुकानें उन परिवारों के आय का एकमात्र श्रोत है। कई अखबारों और सरकार के रिपोर्ट्स के अनुसार इस पर्यटन में 2013 के बाद 85 प्रतिशत की गिरवाट आई है और आज 6 सालों के बाद भी आने वाले भक्तों की संख्या 2012 के आंकड़े तक नहीं पहुँच पाई है।

इसके साथ ही इंडिया टुडे ने यह भी रिपोर्ट किया है कि यात्रा के पिछले 10 दिनों में 7 लोगों की मौत ऊंचाई में ऑक्सीजन की कमी के वजह से हुई है, इन हालातों में सिर्फ सरकारी खजाने में आने वाले पैसे पर ही नहीं बल्कि हजारों लोगों के रोजगार पर भी सीधा असर पड़ रहा है।

प्रधानमंत्री के प्रवास का लोगों को मिलेगा सीधा लाभ
इसमें किसी को संदेह नहीं है कि नरेन्द्र मोदी देश के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में से एक हैं। जवाहर लाल नेहरु, इंदिरा गाँधी के बाद कोई और प्रधानमंत्री लोकप्रियता के मामले में नरेन्द्र मोदी के बराबर नहीं है। आज प्रधानमंत्री सिर्फ एक नेता नहीं बल्कि इन्फ्लुएंसर हैं ऐसे में क्या प्रधानमंत्री के केदारनाथ दौरे और उस को मिले मीडिया अटेंशन का सीधा फायदा केदारनाथ के लोगों को नहीं मिलेगा? प्रधानमंत्री की अधिकतर तस्वीरें वाइड शॉट्स हैं जिसमें यह स्पष्ट तौर पर दिख रहा है कि मंदिर के आस-पास निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और फिर से बन कर खड़ा केदारनाथ दुबारा पर्यटकों के स्वागत के लिए तैयार है।

बीमार मानसिकता विकास का भी उड़ा रही मजाक
मानसिक विकृति इस स्तर पर पहुँच चुकी है कि लोगों द्वारा विकास कार्यों का भी मजाक बनाया जा रहा है। ख़बरों में छपा कि जिस गुफा में प्रधानमंत्री रुके हैं वहां वाइफ़ाय, लाइट्स, टॉयलेट और टेलीफोन जैसी सुविधाएं भी हैं, कुछ तस्वीरों में गुफा के दीवारों पर लगा कपडे लटकाने का हेंगर भी दिखा और मज़े की बात देखिये की यह खबर भी आँख बंद करके ट्रोल करने वालों के पोस्ट्स पर तैरने लगा।

अब आप खुद सोचिये कि एक धाम जो 2013 में पूरी तरह तबाह हो गया था वह 6 सालों के अन्दर अपनी पुरानी गरिमा में लौट आया है और इसके साथ हीं ध्यान के लिए बनाये गए गुफाओं में भी दैनिक जरूरतों की सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। जिस गुफा में मोदी रुके हैं वह केदारनाथ जाने वाले हर भक्त के लिए उपलब्ध हैं न कि सिर्फ प्रधानमंत्री के लिए, आप बताइए कि आखिरी बार अपने किस देवस्थान में ऐसा देखा था की शौचालय की इतनी उत्तम व्यवस्था हो ?

ट्रोल करने वाले कथाकथित बुद्धिजीवी एक और तस्वीर का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं जिसमें मोदी मंदिर के उलटी तरफ मुंह करके हाथ जोड़े खड़े हैं, इसको लेकर यह कहा जा रहा है कि मंदिर के उलटी तरफ देखकर प्रणाम कौन करता है? यह लोग वह मुर्ख हैं जिन्होंने शायद अपने घर में के पूजा भी नहीं की, अगर किया होता तो उनको यह पता होता कि हिन्दू धर्म में चारों दिशाओं को प्रणाम किया जाता है। यह एक सामान्य विधि है जिसमें हम चारों दिशाओं में स्थित चार धामों को नमन करते हैं।

यह स्पष्ट है कि मोदी का विरोध अब एक प्रायोजित झूठ की शक्ल में तब्दील हो चुका है और ट्रोलर्स की पूरी फौज एक बस इस फेर में लगी है कि वह मोदी की छवि को बर्बाद कर दे। इस दौर में भारत की जनता को यह सुनिश्चित करना होगा की वह अपनी राय आँकडों और सत्य के आधार पर बनाए न की झुठ की अस इमारत पर जो अपनी ही बातों का वजन नहीं उठा पा रहा।

(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता और संचार विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं)