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गाँधी के ‘सपनों के भारत’ पर कुठाराघात है सरकारों की नीतियाँ

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सौरभ कुमार | भोपाल

भारत की इस भूमि ने आज नहीं सदियों से विश्व को अनेक महान विचारक और विचार दिए हैं, आधुनिक विश्व के परिपेक्ष्य में देखें तो आजादी आन्दोलन के समय उभर कर आये महात्मा गाँधी के विचारों को सम्पूर्ण विश्व ने स्वीकार किया। बिहार के चंपारण में 19 अप्रैल, 1916 से शुरू हुआ चंपारण सत्याग्रह में आवाज़ तो नील किसानों के समस्याओं पर उठाया गया, लेकिन इस आन्दोलन का प्रभाव सिर्फ चंपारण या बिहार तक सीमित नहीं था। चंपारण के इस आन्दोलन ने सम्पूर्ण भारत के नागरिकों को एक ऐसा नेता दिया जिसके साथ खड़े होकर वह आजाद राष्ट्र का सपना देख रहे थे।

आज जब हम इतिहास के उन पन्नों को पलटें तो एक सवाल हमें खुद से पूछना चाहिए। सवाल… कि क्या यह देश एक व्यक्ति मोहनदास करमचंद गाँधी के साथ खड़ा था, या यह देश खड़ा था महात्मा गाँधी के विचारों के साथ? क्या इस विश्व ने छोटे-दुबले धोती लपेटे एक व्यक्ति का सम्मान किया या उनके विचारों का?

गाँधी को लेकर मचे इस घमासान में आज गाँधी के नाम की चर्चा हो रही है, गाँधी के विचारों कि नहीं। वह गाँधी जिन्होंने जीवन में कभी हिंसा को स्थान नहीं दिया उनके नाम से आज खुलेआम शाब्दिक हिंसा हो रही है। यह नादान इतना नहीं समझते कि गाँधी के विचारों को किसी के संरक्षण की आवश्यकता नहीं है, गाँधी के विचार इतने सक्षम हैं की वह हर आलोचना और बहस के बाद भी प्रासंगिक रहेंगे।

आज की कांग्रेस पार्टी समय-समय पर खुद के गाँधी की पार्टी होने का दावा करती है, कांग्रेस दावा करती है की वह महात्मा गाँधी के विचारों का प्रतिनिधित्व करती है और इसके साथ हीं दुसरे दलों को इसकी दुहाई भी देती है। वैसे तो महापुरुष राष्ट्र की संपत्ति होते हैं और उनपर, उनके विचारों पर सम्पूर्ण राष्ट्र का अधिकार होना चाहिए लेकिन यह हमारे देश की विडम्बना है की हमनें महापुरुषों को भी दलों में बाँट दिया है – गाँधी कांग्रेस के हो गए, अम्बेडकर पर दलित राजनीति करने वाले दलों ने अधिकार जमा लिया, सावरकर को भाजपा ने अपने हिस्से में ले लिया।

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क्या थे गाँधी के विचार ?
अपने सम्पूर्ण जीवन में महात्मा गाँधी ने सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों के साथ बात की स्वराज और स्वदेशी की, स्वराज का नारा बुलंद करके उन्होंने पुरे देश को एक साथ खड़ा करने का काम बखूबी किया। गाँधी के विचारों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले देश के बुद्धिजीवियों को पहले गाँधी के विचारों को समझने का प्रयास करने चाहिए।

गाँधी के इस स्वराज को समझाते हुए गाँधी लिखते हैं “राजनीतिक रूप से स्वराज स्व-सरकार है और अच्छी सरकार नहीं (गाँधी के लिए अच्छी सरकार स्व-सरकार का विकल्प नहीं है) और इसका मतलब है सरकारी नियंत्रण से स्वतंत्र होने के लिए निरंतर प्रयास करना, चाहे वह विदेशी सरकार हो या चाहे वह राष्ट्रीय सरकार हो। दुसरे शब्दों में, यह शुद्ध नैतिक अधिकार के आधार पर लोगों की संप्रभुता है।” (यंग इंडिया, अगस्त 6, 1925 page 276 और हरिजन – मार्च 25, 1939 page 64)।

बात अपने निजी जीवन में बकरी पालने की हो या लोगों से चरखा चलाने की अपील। गाँधी ने हमेशा इस बात को महत्व दिया की सरकारों पर जनता की निर्भरता कम से कम होनी चाहिए। हमें एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना चाहिए जिसमें सरकार का काम एक सुरक्षित और विकास के लिए अनुकूल माहौल बनाने का है। सरकारें विकास नहीं कर सकतीं, विकास जनता को करना होगा तभी यह देश या कोई भी देश आगे बढ़ सकता है।

वर्तमान विश्व में स्वराज
दुनिया का हर वो देश जो आज विकास के शिखर पर बैठा है उनमें कुछ समान है तो यह कि उन्होंने अपने देश के नागरिकों को अवसर उपलब्ध करवाए न की खैरात। उन्होंने यह सुनिश्चित किया की हर व्यक्ति को वह काम करने का अवसर मिले, वह खोज और अनुसंधान करने का अवसर मिले जो उसके और देश लिए बेहतर संभावनाओं का सृजन कर सके। अमेरिका और जापान जैसे देशों ने अपने नागरिकों को नए आविष्कार करने के लिए प्रेरित किया, वहीँ चाइना और रूस ने अपने लोगों के लिए बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाए ताकि हर व्यक्ति सम्मान से अपनी आजीविका कमाकर अपने देश और समाज के विकास में योगदान करे।

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इसे मैं स्वराज की परिभाषा से जोड़ रहा हूँ क्यूंकि इनके तरीके भले अलग रहे हों लेकिन उद्देश्य यही रहा की जनता को ज्यादा से ज्यादा मौके तलाश करने दिए जायें, रोजगार के नए अवसर ढूंढने का अवसर दिया जाये और फिर वह जिस रास्ते बढ़ना चाहें सरकारें यह सुनिश्चित करे की उनको सुरक्षित माहौल, आवश्यक सहयोग और खुला बाज़ार उपलब्ध करवाया जाये।

सरकारों ने स्वावलंबन पर नहीं दिया ध्यान
आजादी के बाद देश की आर्थिक हालात बहुत हीं ज्यादा ख़राब थी और इसका तात्कालिक समाधान निकलने के लिए नेहरु की सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की लेकिन व्यक्तिगत स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता पर बल नहीं दिया गया। एक ही पार्टी का लम्बे समय तक सत्ता में बने रहने का नुकसान यह है कि पुराने योजनाओं और तरीके को रीती मान लिया जाता है, आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी विकास और योजनाओं का ब्लूप्रिंट आजादी के पहले दशक से अलग नहीं होता।

सरकारों द्वारा निरंतर कर्जमाफी की बात हो या देश के गरीब तबके तक मुफ्त में अनाज पहुंचाए जाने की योजनायें, देश की सरकारों ने सरकार पर जनता की निर्भरता कम करने की बजाये हमेशा बढ़ाने की कोशिश हीं की। सवाल है कि ऐसा क्यूँ किया गया ? जब आप हमारे देश के नीतिनिर्माताओं के फैसलों का गहराई से अध्यन करते हैं तो यह बात साफ़ हो जाती है कि जान बुझकर वोट बैंक की राजनीति करने के लिए जनता को मिलने वाले लाभों पर नियंत्रण रखा गया और दीर्घकालीन उपायों की जगह तात्कालिक लाभ मिले ऐसी योजनओं को जारी किया गया।

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एक मिनट को मान भी लें कि आजादी के बाद के बरसों में नागरिकों को सीधा जीवन जीने के साधन उपलब्ध करवाना देश की जरुरत थी क्यूंकि हमारी जनता गरीबी और भूख से संघर्ष कर रही थी लेकिन आज जब स्तिथियाँ उस दौर से कहीं ज्यादा बेहतर हो गयी हैं हमारा प्रयास यह होना चाहिए की हम जनता को खैरात कम और अवसर ज्यादा उपलब्ध करवाएं।

मोदी सरकार में कितनी बदली नीतियाँ
2014 में पूर्ण बहुमत से बनी भाजपा सरकार ने इस निति को बदलने के कुछ प्रयास तो किये मगर अभी तक उसका यह प्रयास सफल होता नहीं दिख रहा। कौशल विकास और स्टार्टअप इंडिया जैसी योजनाओं के माध्यम से हर व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास तो किया गया लेकिन यह प्रयास जमीन पर उतना सफल रूप नहीं हुआ। कौशल विकास के लिए बने केंद्र भ्रष्टाचार का केंद्र बन गए और इसका लाभ जनता को नहीं मिल पाया।

भाजपा की वर्तमान सरकार भी कांग्रेस की नीतियों से ज्यादा दूर नहीं जा पाई और उसने अपने कार्यकाल के आखिरी महीनों में किसान सम्मान निधि के माध्यम से 2-2 हज़ार की किश्त में 6 हज़ार रूपए प्रतिवर्ष किसानों के खाते में दिया। जबकि इसी राशि के इस्तेमाल से किसानों को उन्नत बीज और तकनिकी सहायता भी उपलब्ध करवाई जा सकती थी।

गाँव में एक कहावत कहते हैं कि “मछली लाकर देने से अच्छा है मछली पकड़ना सिखा देना”, अब समय आ गया है कि भारत की सरकार गाँधी के विचारों की तरफ लौटे और जनता को निर्भर बनाने के बजाए सक्षम बनाने पर ध्यान दें।

(डिस्क्लेमर : यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक युवा एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं)