Lok Sabha Election 2019 : How much Madhya Pradesh Congress holds strong after Assembly election

मध्य प्रदेश: विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद लोकसभा के लिए कितनी मजबूत है कांग्रेस

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सौरभ कुमार | भोपाल

राजनितिक गलियारों में रोज मच रही हलचलों में आजकल कांग्रेस मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान का जिक्र कुछ ज्यादा कर रही है, यह वही राज्य हैं जिनका इस्तेमाल पहले बीजेपी कांग्रेस को डराने के लिए करती थी। जहाँ एक तरफ मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में लगातार 15 सालों से भाजपा की राज्य सरकारें थीं वहीँ राजस्थान में भी पिछले 5 सालों से एक मजबूत भाजपा सरकार थी। कांग्रेस को इस लोकसभा चुनाव में इन तीनों राज्यों से बहुत ज्यादा उम्मीद है क्यूंकि उसने यहाँ भाजपा को पिछले साल हुए चुनावों में हराकर अपनी राज्य सरकार बनाई है।

यह तीनों राज्य भारत की राजनीति में उत्तरप्रदेश के बाद सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में से हैं, यह राज्य मिलकर 65 सांसदों को दिल्ली भेजते हैं जो की अभी कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हो सकता है। 2014 के पिछले लोकसभा चुनावों की बात करें तो इन 65 सीटों में 62 पर बीजेपी और 3 पर कांग्रेस ने परचम फ़हराया था, और पिछले 5 सालों में कांग्रेस के पक्ष या बीजेपी के विपक्ष में ऐसी कोई हवा नहीं बनी है की इस सीटों के अनुपात में कोई बड़ा बदलाव होता दिखे।

मध्यप्रदेश में क्या हैं हालात?
जिन 3 राज्यों में कांग्रेस ने पिछले साल अपनी राज्य सरकारें बनाई हैं उनमें से मध्यप्रदेश लोकसभा चुनावों के लिए सबसे ज्यादा महत्पूर्ण है क्यूंकि यहाँ की 29 सीटें जिनमें से 26 बीजेपी के पास हैं वह कांग्रेस के लिए बड़ी गेमचेंजर साबित हो सकती हैं, लेकिन इन सीटों पर बीजेपी की पकड़ कमजोर होती नहीं दिख रही है।

कांग्रेस के लिए उम्मीद की सबसे बड़ी लहर यह है की उसने 2018 में सरकार बना ली उसका फायदा उन्हें लोकसभा में भी मिलेगा लेकिन अगर पिछले कुछ सालों में मतदाताओं के मूड को देखने पर समझ आता है की अब लोग लोकसभा और विधानसभा के चुनावों को लेकर ज्यादा जागरूक हुए हैं। इसकी बानगी दिल्ली में दिखी थी जहाँ लोगों ने बीजेपी को 2014 में सात की सात लोकसभा सीटें दीं लेकिन विधानसभा में आप को रिकॉर्ड 67 सीटें देकर अरविन्द केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाया। बिहार की बात करें तो जहाँ 2014 में बीजेपी 22 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी वह 2015 में हुए विधानसभा चुनावों में तीसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी।

क्या विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए खुश होने की वजह हैं?
विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 114 सीटें मिलीं वहीँ बीजेपी की झोली में 109 सीटें आईं, अगर बात वोट प्रतिशत की करें तो कांग्रेस और बीजेपी के बीच का अंतर 0.1% था (कांग्रेस-41.4%, बीजेपी 41.3%) जिसे जीताऊ बढ़त नहीं माना जा सकता। इन चुनावों में बीजेपी को पिछले चुनावों के मुकाबले 56 सीटों का नुकसान हुआ वहीँ कांग्रेस को 56 सीटों की बढ़त मिली थी, गौर करने वाली बात है की कांग्रेस 27 ऐसी सीटों पर हारी जहाँ पहले उसके विधायक थे। अपनी सीट हारने वालों में कांग्रेस के बड़े नेता अरुण यादव और अजय सिंह का भी नाम है, जो की जनता का प्यार मिलने के कांग्रेसी दावे को झुठलाती है।

अपने चुनाव प्रचारों में कांग्रेस ने किसान कर्ज माफ़ी, राम वन गमन पथ निर्माण जैसे वादे किए थे जिसका लाभ उनको मिला इसके साथ हीं बीजेपी की शिवराज सिंह सरकार को सवर्ण आन्दोलन से काफी नुकसान हुआ क्यूंकि सवर्ण हमेशा से बीजेपी के कोर वोटर माने जाते रहे हैं और इस आन्दोलन के कारण नोटा पर 1.4 % वोट पड़े। नोटा पर पड़े यह वोट 22 सीटों पर जीत-हार के अंतर से ज्यादा थे और संख्या के मामले में नोटा को आम आदमी पार्टी और सपा जैसी पार्टियों से ज्यादा वोट मिले थे, इसके साथ हीं सवर्ण आन्दोलन के नाम पर बनी छुटपुट दलों ने भी बीजेपी के वोट काटने का काम किया था। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों से ठीक पहले शुरू हुआ यह आन्दोलन अब शांत हो गया है और इसका इसका सीधा लाभ बीजेपी को लोकसभा चुनावों में मिलेगा, बीजेपी के कोर वोटर्स वापस लौटकर बीजेपी की तरफ जायेंगे। केंद्र सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर दिया गया सवर्ण आरक्षण भी मरहम का काम करेगा, और जो लोग इस आन्दोलन की वजह से बीजेपी से दूर हुए थे करीब आयेंगे।

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क्या कहते हैं आंकड़े?
मध्यप्रदेश में बीजेपी के विधानसभा चुनाव न जीत पाने की वजह उनका वोटों का सही प्रबंधन न कर पाना रहा, जहाँ कांग्रेस ने जिताऊ सीटों पर ज्यादा वोट्स लिए वहीँ बीजेपी के वोट संख्या में ज्यादा होने के बावजूद बहुत ज्यादा फैले हुए था। आकड़ों से समझिये तो – 17 सीटों पर जीत-हार का अंतर 1 प्रतिशत से कम रहा, जबकि 13 सीटों पर यह अंतर 1 से 2 प्रतिशत के बीच था। इनमें से अधिकतर सीटें ऐसी हैं जिनपर बीजेपी उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे।

बीजेपी को इन चुनावों में केवल 2 सीटों पर 20 प्रतिशत से कम वोट मिले जबकि कांग्रेस को 11 सीटों पर 20 प्रतिशत से कम वोट मिले, यानी की ज्यादा सीटें जितने के बाद भी कांग्रेस के जनाधार में कोई बड़ा बदलाव आया हो ऐसा नहीं लगता।

2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने 29 में से 27 सीटों पर जीत दर्ज की थी और 2 सीटें कांग्रेस की झोली में आईं थीं, इनमें से केवल एक सीट सतना में जीत हार का अंतर 1% रहा था, जबकि 2 और सीटों (बालाघाट -8.6% और ग्वालियर -3.0%) पर जीत-हार का अंतर 10 प्रतिशत से कम रहा था, बाकी 24 सीटों पर भाजपा ने कांग्रेस को भारी मतों से हराया था।

विधानसभा चुनाव के बाद का माहौल
जिस विधानसभा चुनाव को जितने का कांग्रेस जश्न मना रही है वह उसके गले की हड्डी भी बन सकता है क्यूंकि चुनाव जितने के बाद अपने 3 महीने के कार्यकाल में कांग्रेस कोई ऐसा बड़ा फैसला नहीं ले पाई है जिसको वह लोकसभा चुनावों से पहले उपलब्धि के तौर पर पेश कर सके। 29 अक्टूबर को उज्जैन की अपनी रैली में राहुल गाँधी ने ऐलान किया था की अगर 10 दिन में कर्ज माफ़ नहीं हुआ तो मुख्यमंत्री बदल देंगे, राहुल का यह ऐलान उनपर भारी पड़ता दिख रहा है क्यूंकि 3 महीने बीत जाने के बाद भी कर्ज माफ़ नहीं हो पाया है और लोकसभा चुनाव के लिए आचार संहिता लगने से पहले कांग्रेस ने किसानों को SMS भेजकर चुनाव आचार संहिता का हवाला देकर कर्ज माफ़ी में असमर्थता जताई है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस मामले को बिना देर किए उठाना शुरू किया है और उसके साथ ही नेशनल मीडिया के साथ प्रेस कांफ्रेंस करके कांग्रेस पर किसानों के साथ धोखा करने का आरोप लगाया है।

वहीँ दूसरी तरफ केंद्र की मोदी सरकार ने गज़ब की प्रशासनिक फुर्ती का परिचय देते हुए चुनावों से ठीक पहले छोटे किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत 6 हज़ार रूपए प्रति वर्ष की सहायता की घोषणा की, घोषणा के तत्काल बाद कुछ ही सप्ताह में 2000 की पहली किश्त किसानों के खाते में पहुँच गयी।

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इस योजना से बीजेपी यह सिद्ध करने में कामयाब रही है की कांग्रेस सिर्फ कहती है, कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने की क्षमता बीजेपी में है। इससे पहले भी शिवराज सिंह की छवि मध्यप्रदेश में किसान मुख्यमंत्री की रही है, जिनके कार्यकाल में राज्य ने लगातार पांच बार प्रतिष्ठित कृषि कर्मण अवार्ड जीता है। इसके साथ ही फसलों की कीमत और बोनस जैसे मसलों पर भी काफी कल्याणकारी फैसले लिए हैं।

मध्यप्रदेश कांग्रेस में आपसी खींचतान
वरिष्ट पत्रकार महेश श्रीवास्तव कहते हैं कि , “मध्यप्रदेश सरकार में शरीर तो कमलनाथ का है लेकिन आत्मा दिग्विजय सिंह की है और जिसमें सिंधिया की आत्मा घुसने की कोशिश कर रही है, जिसके चक्कर में इस सरकार को प्रेत दोष हो गया है”।

यह बात बहुत ही सटीक तरीके से मध्यप्रदेश कांग्रेस के आपसी टकराव को दर्शाता है, मध्य प्रदेश में कांग्रेस हमेशा से आपसी गुटबाजी के लिए बदनाम रही है। विधानसभा चुनाव से पहले भी कभी सभा स्थल पर दिग्विजय सिंह का पोस्टर न होना, कभी दिग्विजय का बयान “मेरे बोलने से पार्टी के वोट कट जाते हैं” या युवा विधायक और वर्तमान उच्च शिक्षा और खेल एवं युवा कल्याण मंत्री जीतू पटवारी का बयान “पार्टी जाए तेल लेने ” जैसे मुद्दे खूब चले, खबर यहाँ तक आई की दिल्ली में टिकट बंटवारे के दौरान पार्टी अध्यक्ष के सामने ही दिग्विजय और सिंधिया भीड़ गए। कांग्रेस ने इस खबर से इनकार किया और दिग्विजय ने भी ट्वीट कर के इन आरोपों का खंडन किया लेकिन इन दोनों की खटपट से कांग्रेस के पार्टी कार्यकर्ता भी अनजान नहीं हैं।

चुनाव के परिणाम आ जाने के बाद मधयप्रदेश के मुखयमंत्री तो कमलनाथ बने लेकिन दिग्गी गुट के ज्यादा विधायक होने के कारण सरकार पर दिगविजय का नियंत्रण ज्यादा है, इसकी एक बानगी तब दिखी जब अपने गुट के एक नेता के टिकट के बारे में जानकारी लेने के लिए उन्होंने कमलनाथ को सबके सामने स्पीकर पर ही फोन कर दिया। मध्यप्रदेश में मचे इस घमासान के बीच सिंधीया को पार्टी महासचिव बनाकर उत्तर प्रदेश भेज दिया गया।

पिछले लोकसभा चुनाओं में जिन दो सिटों पर मोदी लहर के बावजुद कांग्रेस जीती थी वहां भी इस बार कमजोर होने की संभावनांए हैं क्योंकी कमलनाथ मुख्यमंत्री होने के कारण छिंदवाडा से चुनाव नहीं लड़ पाएंगे वहीं सिंधिया के भी गुना से चुनाव लड़ने पर संशय बना हुआ है।

जाग रहा है बंटाधार के वापस लौटने का डर
मध्यप्रदेश में भाजपा ने हमेशा दिग्वीजय सिंह के मुख्यमंत्री कार्यकाल का नाम लेकर जनता को डराया है, क्युंकी यह वो दौर था जब यहां की जनता मूलभुत सुविधाओं के लिए भी संघर्ष कर रही थी। आज देश के सबसे साफ शहरों में से एक भोपाल – गर्दा, पर्दा और जर्दा का शहर कहा जाता था। गांव-देहात या छोटे शहरों में बड़े बुजुर्गों से बात करने पर वह अभी भी दिग्वीजय के कार्यकाल की कहानियां सुनाते हैं और उस दौर के लौट आने के ख्याल मात्र से काँपते हैं। ऐसे में जब दिगविजय सिंह ने भोपाल से चुनाव लड़ने की बात की तो लोगों को एहसास हो रहा है कि सरकार कमलनाथ के पिछे बैठे दिग्वीजय चला रहे हैं और वह दुबारा मध्यप्रदेश की राजनीति में लौटने की कोशिश कर रहे हैं तो जनता में उस डर का वापस लौटना लाजमी है।

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दिग्वीजय की इस छवी के पिछे भाजपा का लंबा प्रचार अभियान है, वरिष्ट पत्रकार दिपक तिवारी अपनी किताब राजनीतिनामा मध्यप्रदेश में लिखते हैं “भाजपा की सरकार मध्यप्रदेश में बन जाने के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय से अखबारों को निर्देश था की वह कांग्रेस की खबरें बेशक छापें लेकिन उसके साथ दिग्वीजय की तस्वीर जरुर लगांए”, भाजपा को इस बात का भरोसा था की जबतक लोगों को दिग्वीजय के कार्यकाल के काले दिन याद रहेंगे वह तबतक कांग्रेस को वोट नहीं देगें। यही कारण था कि विधानसभा चुनाव प्रचार के समय दिग्गी न तो मंचों पर दिखते थे ऐर न हीं रोड़ शो में, बस पर्दे के पिछे का काम संभाल रहे थे।

पिछले कुछ समय में मध्यप्रदेश में वापस जाग रहे अपहरण सिंडीकेट की बात हो या बात हो दुबारा दिन में घंटो बिजली कटने की, इन खबरों ने बंटाधार दौर की यादों को दूबारा लोगों के जेहन में जिंदा किया है और इसका फायदा भाजपा को आने वाले चुनावों में मिलेगा।

क्या कहते हैं चुनावी सर्वे
चुनावों को लेकर सर्वे और ओपिनीयन पोल्स का दौर भी शुरु हो गया है, अबतक तीन बड़े चैनल्स ने अपना सर्वे जारी किया है, इस सर्वे में जहाँ टाइम्स नाउ- वी.एम.आर के सर्वे ने एनडीए को सबसे ज्यादा 24 और युपीए को सबसे कम 5 सिटें दी हैं, वहीं इंडिया टीवी- सी.एन.एक्स ने एनडीय को सबसे कम 18 और युपीए को सबसे ज्यादा 11 सिटें दी हैं।

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चुनाव में वोट प्रतिशत को लेकर भी दो सर्वे जारी हो चुके हैं जिसमें से एक टाइम्स नाउ-वी.एम.आर के सर्वे में एन.डी.ए. को 49.2% और यु.पी.ए. को 39.70% वोट मिलने का अंदेशा लगाया गया है वहीं रिपब्लीक टीवी- सीवोटर के सर्वे में एन.डी.ए. को 48.4% और यु.पी.ए. को 44.1% वोट मिलने की बात कही गई है।

इन सर्वे के अनुसार भाजपा को पिछले चुनावों के मुकाबले नुकसान होता तो दिख रहा है लेकिन कांग्रेस अभी भी सीटों के मामले में भाजपा से काफी पिछे है।

बीजेपी की मोदी सरकार के खिलाफ राहुल का अब तक का सबसे बड़ा आरोप राफेल में भ्रष्टाचार का रहा है, जिसको लेकर राहुल गांधी ने “चौकिदार चोर है” का नारा दिया है। जनवरी 2019 में जारी इंडिया टुडे के सर्वे की मानें तो 32% लोगों को विश्वास है की यह आरोप झुठे हैं वहीं 23% लोगों को इस विषय में कोई जानकारी नहीं है। केवल 30% लोगों ने माना कि भ्रष्टाचार की राहुल के आरोप सही हो सकते हैं। इस सर्वे के बाद प्रधानमंत्री के द्वारा शुरू किये गए “मैं भी चौकीदार” अभियान से जहाँ बीजेपी को सकारात्मक प्रचार मिला वहीँ कार्यकर्ता भी दुबारा एक पहचान से संगठित हुए।

अब चुनावी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है, प्रधानमंत्री ने “चौकीदार चोर है” के नारे का जवाब “मैं भी चौकीदार” के नारे से दिया है जो देखते ही देखते ट्वीटर पर टॉप ट्रेंडिंग में शामील हो गया।

इस बार लोकतंत्र के उस महोत्सव में जनता जीत का सेहरा किसके माथे बांधेगी यह जानने के लिए हमें 23 मई का इंतजार करना होगा। इस बीच आप अपना फर्ज जरुर निभांए, अपने मताधिकार का इस्तेमाल करें और एक मजबुत सरकार चुनें।

(डिस्क्लेमर : लेखक युवा पत्रकार और राजनीति विज्ञान के छात्र हैं)