दूसरों का मत अस्वीकारने वाले कर रहे हैं प्रज्ञा ठाकुर का विरोध…

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सौरभ कुमार | विचार

जब सुकरात ने अपना दर्शन विश्व के सामने रखा तो तात्कालीन शासन ने जहर देकर उन्हें मौत के घात उतारने की सजा दी, उस वक्त सुकरात पर आरोप लगे की उन्होंने युवाओं को दिग्भ्रमित करने और ईशनिंदा के लिए प्रेरित करने का आरोप लगा। जब वैज्ञानिकों ने सबसे पहले यह कहा की पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ घुमती है तो पूरा समाज उनके विरोध में खड़ा हो गया। मैं सोचता हूँ की आखिर क्यूँ यह समाज बदलाव को स्वीकार करना नहीं चाहता, आखिर क्यूँ हम इतने जड़ हैं कि तमाम साक्ष्य आँखों के सामने होने के बाद भी बस इसलिए उसे देखना नहीं चाहते क्यूंकि वह हमारे पूर्वाग्रह के विपरीत है।

इस समाज को क्या करना चाहिए इसका जवाब भी सुकरात हीं देते हैं, जब जहर का प्याला सुकरात के हाथों में होता है और मृत्यु बस होठों से लगकर उन्हें जीवन से मुक्त करने वाली होती है तब सुकरात कहते हैं – “आत्मा ऐसे शरीर को बार बार धारण करती है अत: इस क्षणिक शरीर की रक्षा के लिए भागना उचित नहीं है। क्या मैंने कोई अपराध किया है? जिन लोगों ने इसे अपराध बताया है उनकी बुद्धि पर अज्ञान का प्रकोप है। मैंने उस समय कहा था-विश्व कभी भी एक ही सिद्धांत की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता।

मानव मस्तिष्क की अपनी सीमाएँ हैं। विश्व को जानने और समझने के लिए अपने अंतस् के तम को हटा देना चाहिए। मनुष्य यह नश्वर कायामात्र नहीं, वह सजग और चेतन आत्मा में निवास करता है। इसलिए हमें आत्मानुसंधान की ओर ही मुख्य रूप से प्रवृत्त होना चाहिए। यह आवश्यक है कि हम अपने जीवन में सत्य, न्याय और ईमानदारी का अवलंबन करें।”

आखिर क्यूँ कुछ लोग यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि सत्य उनके ज्ञान और तर्क की परिधि से बाहर भी हो सकता है, आखिर क्यूँ वह न्यायालय के फैसले से पूर्व हीं किसी को दोषी ठहरा देने पर तुले हैं? क्या विश्व के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि कोई आरोपित व्यक्ति निर्दोष साबित हुआ हो?

साध्वी प्रज्ञा का मामला पहला नहीं है
दिल्ली के रहने वाले मो। आमिर खान को 1998 में तब गिरफ्तार कर लिया गया जब वह अपनी बीमार माँ के लिए दवा लेने जा रहा था। 8 दिनों तक आमिर पुलिस के हिरासत में रहा, आमिर ने भी पुलिस पर उसी बर्बरता के आरोप लगाये जो आज साध्वी प्रज्ञा ATS पर लगा रहीं हैं। आमिर से पुलिस ने 500 पन्नों के दस्तावेज पर दस्तखत करवाए और कोर्ट में पेशी के वक़्त आमिर को पता चला कि उसपर दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में बम लगाने और विस्फोट करने के आरोप लगे हैं।

लगभग वही धाराएं आमिर के खिलाफ पुलिस ने दायर की थीं जो प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ हैं। 14 सालों तक आमिर जेल में सड़ता रहा उसके पिता मो हाशिम खान की जिंदगी के आखरी दिन जवान बेटे के लिए वकील खोजने में लग गए। आमिर के पिता के मौत के बाद पूरा जिम्मा उसकी माँ मियामुना बी पर आ गया, वह इस दबाव को झेल नहीं पाई और 2010 में उन्हें लकवा मार गया।

कहते हैं न्याय देर से हो लेकिन होता जरूर है 2012 में आमिर निर्दोष साबित हुआ और जेल से बहार आया। आमिर ने 14 साल जेल में रहने के बाद बाहर आने के बाद आलिया से शादी की जो 14 सालों से उसका इंतज़ार कर रही थी। आज आमिर ‘अमन बिरादरी’ नाम के एक NGO के लिए काम करते हैं और पुरानी दिल्ली में अपनी बेटी अनुषा और पत्नी के साथ रहते हैं।

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12 दिसम्बर, 2005 दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने नार्थ दिल्ली के सुल्तानपुर में रहने वाले इरशाद अली को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ़्तारी के 2 महीने बाद 9 फरवरी, 2006 को इरशाद को कोर्ट के सामने पेश किया गया। इरशाद ने स्पेशल सेल के हवालात में कितने जुर्म झेले इसका जिक्र करने की जरुरत मुझे नहीं लगती।

स्पेशल सेल ने इरशाद के तार अल-बद्र नामक आतंकी संगठन से जोड़े और उसपर आतंकवाद निरोधी धाराओं के साथ देश के खिलाफ जंग छेड़ने के आरोप लगे। उसके बाद जांच की जिम्मेदारी CBI को मिली और एक बिल्कुल अलग कहानी निकलकर सामने आई, दरअसल इरशाद पर IB के लिए जासूसी करने का दबाव बनाया जा रहा था, जब इरशाद ने इससे इनकार किया तो स्पेशल सेल उसे उठा कर ले गयी। साल 2016 में इरशाद को न्याय मिला और दिल्ली पुलिस की तरफ से हर्जाने में 5 लाख रूपए 11 साल की यातना के बदले। आज इरशाद टैक्सी चलता है और बीवी शबाना और दो बेटों वकार और इमरान के साथ रहता है।

आपके मन में सवाल उठेंगे कि जरुरी नहीं की प्रज्ञा ठाकुर के साथ भी जरुरी नहीं की वही हुआ हो जो आमिर और इरशाद के साथ हुआ, और मैं इसका दावा भी नहीं कर रहा। लेकिन क्या प्रज्ञा ठाकुर को चीख चीख कर आतंकी कहने वाले शत प्रतिशत जानते हैं की प्रज्ञा ठाकुर के साथ ऐसी ज्यादती नहीं हुई ? क्या आपका जमीर आपको इसकी इजाजत देता है कि आप इस सम्भावना को पूरी तरह से नकार दें?

संदेह के घेरे में है ATS की जांच
8 सितम्बर, 2006 को मालेगांव में बम धमाके हुए इन धमाकों में 40 लोगों की मौत हुई और 125 लोग घायल हुए, यह धमाके मुस्लिम बहुल इलाके में हुए थे और धमाके के वक़्त पास के मस्जिद में जुम्मे की नमाज पढ़ी जा रही थी।

पहली सुचना यह मिली की 9 सिम्मी के लोग इस धमाके के लिए पकडे गए हैं और उन्होंने अपना जुर्म भी कबूला और इसके तार अहल-ए-हदीथ से जोड़े गए। मगर फिर जांच का जिम्मा मिला मुंबई ATS को उसके बाद तो जैसे जांच की पूरी दिशा ही बदल गयी। सिम्मी के सारे गिरफ्तार लोग छोड़ दिए गए।

जब बात सिम्मी की हो तो दिमाग में दिगविजय सिंह का नाम अपने आप आ जाता है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए दिगविजय सिंह पर दर्जनों बार सिम्मी को समर्थन देने के आरोप लगे हैं, सिम्मी के सदस्य दिगविजय के साथ मंच पर देखे गए हैं। ज्यादा विस्तार से दिगविजय और सिम्मी के रिश्ते जानने के लिए या तो मध्यप्रदेश में दिगविजय का राज देखे किसी भी व्यक्ति से पूछ लीजिये या फिर गूगल पर सिम्मी एंड दिग्विजय सिंह सर्च कर लीजिये। दिगविजय सिंह के कार्यकाल में न सिर्फ सिम्मी मध्यप्रदेश में फला-फुला था बल्कि अपनी जडें देश भर में फैलायीं थीं।

जांच के दौरान दिगविजय सिंह और ATS चीफ हेमंत करकरे के रिश्तों कि भी चर्चा खूब हुई है, मुंबई हमले में जब हेमंत करकरे शहीद हुए थे तब भी दिगविजय ने यह दावा कर दिया था कि अपनी मौत से कुछ देर पहले हेमंत करकरे से उनकी फ़ोन पर बात हुई थी और उन्होंने कहा था कि हिन्दू संगठनो से उन्हें जान से मारने की धमकी मिली थी, एक प्रेस कांफ्रेंस में तो दिगविजय सिंह ने हेमंत करकरे का फ़ोन नंबर भी मीडिया को बता दिया था, बाद में जांच पर हेमंत करकरे के फ़ोन पर दिगविजय के बताये गए समय में न तो कोई इनकमिंग कॉल की जानकारी मिली न ही आउटगोइंग कॉल की, और हाँ हेमंत करकरे के पास एक हीं फ़ोन था?

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क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए की दिगविजय ने वह झूठ क्यूँ बोला था? हेमंत करकरे की पत्नी ने बाकायदा उस समय मीडिया से यह कहा था कि दिगविजय सिंह के इन बयानों से पाकिस्तान को मदद मिलेगी, और मिली भी थी।

(NDTV की यह रिपोर्ट देखिये)

दिगविजय सिंह और हेमंत करकरे की नजदीकियां
इन हमलों के दौरान भारत के गृह मंत्रालय में अवर सचिव के पद पर कार्यरत आर। वी। एस। मणि ने अपनी किताब “द मिथ ऑफ़ हिन्दू टेरर” में इन घटनाओं का बहुत बारीकी से लिखा है और तथ्यों और रिपोर्टों के हवाले से, मैं आपसे बस गुज़ारिश कर सकता हूँ कि एक बार इस किताब को पढ़ें। अभी इस किताब का थोडा सन्दर्भ मैं आपको देता हूँ –

आरवीएस मणि नागपुर में आरएसएस मुख्यालय में 2006 बम विस्फोट के बाद हेमंत करकरे के साथ अपनी बैठक के बारे में बात करते हैं। उन्होंने कहा कि वह उस समय आंतरिक सुरक्षा में काम कर रहे थे और उन्हें गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने बुलाया था। जब उन्हें अंदर ले जाया गया, तो उन्होंने शिवराज पाटिल के कक्ष में दिग्विजय सिंह और हेमंत करकरे को देखा। वह लिखते हैं कि हेमंत करकरे और दिग्विजय सिंह उनसे पूछताछ कर रहे थे, जबकि शिवराज पाटिल थोड़े असंबद्ध दिख रहे थे। उन्होंने उनसे विस्फोट के बारे में कई सवाल पूछे। आरवीएस मणि लिखते हैं कि हेमंत करकरे और दिग्विजय सिंह आरवीएस मणि की जानकारी से बहुत खुश नहीं थे कि एक विशेष मज़हबी समूह अधिकांश आतंकवादी हमलों में शामिल था।

वह लिखते हैं कि कमरे में बातचीत से, वे खुश नहीं थे कि खुफिया सूचनाओं के अनुसार, मुसलमान आतंकवादियों का समर्थन कर रहे थे। उनका कहना है कि उनकी बातचीत में नांदेड़, बजरंग दल आदि के बार-बार संदर्भ थे। वह नांदेड़ विस्फोट के बारे में आगे बात करते हैं और कहते हैं कि यह पहला मामला था जिसमें ‘हिंदू आतंक’ शब्द का पहली बार इस्तेमाल किया गया था।

आरवीएस मणि कई सवाल उठाते हैं कि दिग्विजय सिंह और हेमंत करकरे इतने करीब क्यों थे? जैसा कि दिग्विजय सिंह ने खुद भी दावा किया था। इनकी करीबी खुद ही कई सवाल खड़े करती है। आरवीएस मणि लिखते हैं, “यह याद रखना दिलचस्प हो सकता है कि दिग्विजय सिंह ने एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया था कि वह उस समय के एक पुलिस अधिकारी के साथ व्यक्तिगत संपर्क में थे, जो उनके साथ केंद्रीय गृह मंत्री के कमरे में थे और जिन्हे नांदेड़ हमले की जानकारी थी।

इससे दिग्विजय सिंह ने कुछ विशेष सूचनाएँ हासिल करने का दावा भी किया था। सिंह ने मीडिया में इस पुलिस अधिकारी का निजी मोबाइल नंबर भी जारी कर दिया था। यह उस समय के मीडिया रिपोर्टों से सत्यापित किया जा सकता है।

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वे आगे लिखते हैं, “जो पेचीदा था, जिसे मीडिया में से किसी ने भी उस समय या फिर बाद में नहीं पूछा था कि एक राजनीतिक नेता और पड़ोसी राज्य कैडर के आईपीएस अधिकारी के बीच क्या संबंध था? दरअसल, एक राज्य का मुख्यमंत्री रहने के बाद, सिंह को अपने राज्य के कई पुलिस अधिकारी जानते होंगे। लेकिन पड़ोसी राज्य के एक सेवारत IPS अधिकारी के साथ इतना दोस्ताना व्यवहार? एक ऐसी बात है जिसका जवाब दिया जाना चाहिए। बिना किसी विशेष मकसद के एक आईपीएस अधिकारी एक पड़ोसी राज्य के राजनेता के साथ क्या कर रहा था?

ऑल इंडिया सर्विसेज (एआईएस) आचरण नियम स्पष्ट रूप से अधिकारियों के कार्यों के निर्वहन को छोड़कर अन्य किसी साजिश या विशेष मक़सद के तहत राजनीतिक नेताओं के साथ अखिल भारतीय सेवा कर्मियों का इस तरह का व्यवहार नियमों का उल्लंघन हैं।

आरवीएस मणि अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि इसके तुरंत बाद का घटनाक्रम यह था कि “हिंदू आतंक” रिकॉर्ड में आ गया था, जहाँ यह दावा किया गया था कि नांदेड़ के समीर कुलकर्णी कथित रूप से अपनी कार्यशाला में विस्फोटक का भंडारण कर रहे थे, जिसमें 20।4।2006 को विस्फोट हो गया।

पुस्तक के एक अन्य भाग में, आरवीएस मणि कहते हैं कि जब हेमंत करकरे एटीएस प्रमुख थे, तो अहले-ए-हदीथ/हदीस जो मालेगाँव विस्फोट में शामिल थे, इसका सबूत होने के बाद भी उसे एक साइड कर दिया गया था और इस नैरेटिव को पूरी तरह से बदल दिया गया था। मणि कहते हैं कि यह पहली बार था कि हिंदू संगठनों की भागीदारी की रिपोर्ट मुंबई एटीएस से गृह मंत्रालय को भेजी गई थी और साध्वी प्रज्ञा को मुख्य आरोपी बनाया गया था।

वह कहते हैं कि उन्हें पता नहीं है कि मोटरसाइकिल, जो एटीएस के अनुसार प्रमुख साक्ष्य था (जिसकी बाद में व्याख्या हुई कि साध्वी प्रज्ञा द्वारा बेच दी गई थी) को प्लांट किया गया था या नहीं, लेकिन एटीएस द्वारा लगाए गए समय ने कई सवाल खड़े कर दिए थे। उनका कहना है कि मुंबई धमाकों के दौरान एटीएस को गिरफ्तारी करने में 5 महीने से अधिक का समय लगा जबकि मालेगाँव मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी में केवल 35 दिन लगे।

आपको बता दें, हालाँकि बाद में मीडिया द्वारा यह रिपोर्ट भी किया गया था कि एनआईए इस नतीजे पर पहुँची थी कि कर्नल पुरोहित को फँसाने के लिए महाराष्ट्र एटीएस द्वारा आरडीएक्स लगाया गया था। मैं आपसे पूछता हूँ एक राज्य के मुख्यमंत्री के पूर्व मुख्यमंत्री का किसी दुसरे राज्य के ATS चीफ से क्या रिश्ता था, दिगविजय किस हैसियत से गृह मंत्रालय की बैठक में हेमंत करकरे से रिपोर्ट ले रहे थे ?

यह सवाल आप भी पूछिए और नए भारत के जागरूक युवा की तरह पूर्वाग्रह पर नहीं उपलब्ध जानकारियों और तथ्यों के आधार पर फैसला कीजिये। मेरे कुछ मित्र कहते हैं की NIA सरकार के दबाव में काम कर रही है इसलिए प्रज्ञा ठाकुर को क्लीन चीट मिला, आपके भी दोस्त कहेंगे। लेकिन जब वह ऐसा कहें तो याद रखियेगा यह लोग CAG, सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई, IB, चुनाव आयोग और यहाँ तक की राष्ट्रपति को भी नहीं छोड़ते।

(डिस्क्लेमर : लेखक युवा पत्रकार और राजनीति विज्ञान के छात्र हैं)