LIC Disinvestment

LIC: जिसने दिया हर भारतवासी का ज़िंदगीभर साथ, उसका साथ छोड़ने जा रही सरकार

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ग्राउंड रिपोर्ट । न्यूज़ डेस्क

भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) से हर देशवासी का गहरा नाता रहा है। सरकारी क्षेत्र की इस बीमा कंपनी ने हर भारतवासी का ज़िंदगी के साथ और ज़िंदगी के बाद साथ निभाया है। लेकिन अब सरकार ने एलआईसी (LIC) का साथ छोड़ने का फैसला ले लिया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने BUDGET 2020 में सरकारी क्षेत्र की बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की बड़ी हिस्सेदारी बेचने की घोषणा कर दी है। सरकार भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का आईपीओ लेकर आएगी और इसके जरिए एलआईसी में अपनी हिस्सेदारी बेचेगी।

IPO के ज़रिए सरकार बेचेगी LIC में हिस्सेदारी

वित्त मंत्री ने बजट 2020 पेश करते हुए कहा कि सरकार एलआईसी के आईपीओ की मदद से अपनी हिस्सेदारी को बेचकर फंड जुटाएगी। जीवन बीमा क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी एलआईसी बाजार में सूचीबद्ध नहीं है। इस आईपीओ के लिए सरकार को एलआईसी अधिनियम (एक्ट) में संशोधन करना होगा।

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कैसे कंगाल हो गई LIC

वित्त वर्ष 2019-20 के शुरुआती छह महीनों (अप्रैल-सितंबर) में एलआईसी की गैर निष्पादित संपत्त‍ि (NPA) में 6.10 प्रतिशत की बढ़त हुई है। एलआईसी पर नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट (एनपीए) का बोझ ज्यादा है। हाल ही में एलआईसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 30 सितंबर 2019 तक कुल 30,000 करोड़ रुपये का सकल एनपीए है।

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भारतीय जीवन बीमा निगम का इतिहास

भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) भारत की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी है। यह देश की सबसे बड़ी निवेशक कंपनी भी है। इसकी स्थापना साल 1956 में हुई थी। इसका मुख्यालय मुंबई में है। भारतीय जीवन बीमा निगम के 08 आंचलिक कार्यालय और 101 संभागीय कार्यालय भारत के विभिन्न भागों में स्थित हैं। इसके लगभग 2048 कार्यालय देश के कई शहरों में स्थित हैं और इसके 10 लाख से ज्यादा एजेंट भारत भर में फैले हैं। एलआईसी एजेंट बनकर कई लोग अपने घर की रोज़ी रोटी चलाते हैं। एलआईसी पर देश की एक बड़ी आबादी जमकर भरोसा करती रही है। देश के करोड़ों लोगों ने आंख बंद कर अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा एलआईसी की योजनाओं में लगा रखा है। लेकिन हाल की स्थितियों को देखा जाए तो एलआईसी के पास मौजूद नकदी के बड़े भंडार पर जोखिम बढ़ रहा है।

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विशेषज्ञों की मानें तो यह सराहनीय कदम

एलआईसी में सरकार द्वारा हिस्सेदारी बेचने की घोषणा को एक अच्छे कदम की तरह देखा जा रहा है। इससे एलआईसी को बर्बाद होने से बचाया जा सकेगा। और एलाईसी को वित्तीय संकट से बचाया जा सकेगा। साथ विनिवेश के बाद सरकार पर बोझ भी कम हो जाएगा।

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