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Kunwar Narayan: कुंवर नारायण की चुनिंदा कविताएं

Kunwar Narayan Hindi Kavita
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Kunwar Narayan: कुंवर नारायण का जन्म 19 सितंबर 1927 को हुआ था। वो हिंदी जगत के प्रख्यात कवियों में से एक रहे। नई कविता शैली को उन्होने अपनी लेखनी से संपन्न बनाया। उन्होने 6 दशक तक लिखने का काम किया और यात्राएं की। यहां उनकी चुनिंदा कविताओं का संकलन किया गया है।

उजास

तब तक इजिप्ट के पिरामिड नहीं बने थे

जब दुनिया में

पहले प्यार का जन्म हुआ

तब तक आत्मा की खोज भी नहीं हुई थी,

शरीर ही सब कुछ था

काफ़ी बाद विचारों का जन्म हुआ

मनुष्य के मष्तिष्क से

अनुभवों से उत्पन्न हुई स्मृतियाँ

और जन्म-जन्मांतर तक

खिंचती चली गईं

माना गया कि आत्मा का वैभव

वह जीवन है जो कभी नहीं मरता

प्यार ने

शरीर में छिपी इसी आत्मा के

उजास को जीना चाहा

एक आदिम देह में

लौटती रहती है वह अमर इच्छा

रोज़ अँधेरा होते ही

डूब जाती है वह

अँधेरे के प्रलय में

और हर सुबह निकलती है

एक ताज़ी वैदिक भोर की तरह

पार करती है

सदियों के अन्तराल और आपात दूरियाँ

अपने उस अर्धांग तक पहुँचने के लिए

जिसके बार बार लौटने की कथाएँ

एक देह से लिपटी हैं

एक हरा जंगल / कुंवर नारायण

एक हरा जंगल धमनियों में जलता है।

तुम्हारे आँचल में आग…

चाहता हूँ झपटकर अलग कर दूँ तुम्हें

उन तमाम संदर्भों से जिनमें तुम बेचैन हो

और राख हो जाने से पहले ही

उस सारे दृश्य को बचाकर

किसी दूसरी दुनिया के अपने आविष्कार में शामिल

कर लूँ

लपटें

एक नए तट की शीतल सदाशयता को छूकर

लौट जाएँ।

कमरे में धूप / कुंवर नारायण – कुंवर नारायण

हवा और दरवाज़ों में बहस होती रही,

दीवारें सुनती रहीं।

धूप चुपचाप एक कुरसी पर बैठी

किरणों के ऊन का स्वेटर बुनती रही।

सहसा किसी बात पर बिगड़ कर

हवा ने दरवाज़े को तड़ से

एक थप्पड़ जड़ दिया!

खिड़कियाँ गरज उठीं,

अख़बार उठ कर खड़ा हो गया,

किताबें मुँह बाये देखती रहीं,

पानी से भरी सुराही फर्श पर टूट पड़ी,

मेज़ के हाथ से क़लम छूट पड़ी।

धूप उठी और बिना कुछ कहे

कमरे से बाहर चली गई।

शाम को लौटी तो देखा

एक कुहराम के बाद घर में ख़ामोशी थी।

अँगड़ाई लेकर पलँग पर पड़ गई,

पड़े-पड़े कुछ सोचती रही,

सोचते-सोचते न जाने कब सो गई,

आँख खुली तो देखा सुबह हो गई।

घंटी / कुंवर नारायण

फ़ोन की घंटी बजी

मैंने कहा- मैं नहीं हूँ

और करवट बदल कर सो गया

दरवाज़े की घंटी बजी

मैंने कहा- मैं नहीं हूँ

और करवट बदल कर सो गया

अलार्म की घंटी बजी

मैंने कहा- मैं नहीं हूँ

और करवट बदल कर सो गया

एक दिन

मौत की घंटी बजी…

हड़बड़ा कर उठ बैठा-

मैं हूँ… मैं हूँ… मैं हूँ..

मौत ने कहा-

करवट बदल कर सो जाओ।

इतना कुछ था / कुंवर नारायण

इतना कुछ था दुनिया में

लड़ने झगड़ने को

पर ऐसा मन मिला

कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा

और जीवन बीत गया

अच्छा लगा

पार्क में बैठा रहा कुछ देर तक

अच्छा लगा,

पेड़ की छाया का सुख

अच्छा लगा,

डाल से पत्ता गिरा- पत्ते का मन,

“अब चलूँ” सोचा,

तो यह अच्छा लगा…

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कभी पाना मुझे

तुम अभी आग ही आग

मैं बुझता चिराग

हवा से भी अधिक अस्थिर हाथों से

पकड़ता एक किरण का स्पन्द

पानी पर लिखता एक छंद

बनाता एक आभा-चित्र

और डूब जाता अतल में

एक सीपी में बंद

कभी पाना मुझे

सदियों बाद

दो गोलाद्धों के बीच

झूमते एक मोती में ।

जिस समय में / कुंवर नारायण

जिस समय में

सब कुछ

इतनी तेजी से बदल रहा है

वही समय

मेरी प्रतीक्षा में

न जाने कब से

ठहरा हुआ है!

उसकी इस विनम्रता से

काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव

कुछ अधिक

गहरा हुआ है ।

दीवारें

अब मैं एक छोटे-से घर

और बहुत बड़ी दुनिया में रहता हूँ

कभी मैं एक बहुत बड़े घर

और छोटी-सी दुनिया में रहता था

कम दीवारों से

बड़ा फ़र्क पड़ता है

दीवारें न हों

तो दुनिया से भी बड़ा हो जाता है घर।

उत्केंद्रित? / कुंवर नारायण

मैं ज़िंदगी से भागना नहीं

उससे जुड़ना चाहता हूँ। –

उसे झकझोरना चाहता हूँ

उसके काल्पनिक अक्ष पर

ठीक उस जगह जहाँ वह

सबसे अधिक बेध्य हो कविता द्वारा।

उस आच्छादित शक्ति-स्त्रोत को

सधे हुए प्रहारों द्वारा

पहले तो विचलित कर

फिर उसे कीलित कर जाना चाहता हूँ

नियतिबद्ध परिक्रमा से मोड़ कर

पराक्रम की धुरी पर

एक प्रगति-बिन्दु

यांत्रिकता की अपेक्षा

मनुष्यता की ओर ज़्यादा सरका हुआ…

जन्म-कुंडली

फूलों पर पड़े-पड़े अकसर मैंने

ओस के बारे में सोचा है –

किरणों की नोकों से ठहराकर

ज्योति-बिन्दु फूलों पर

किस ज्योतिर्विद ने

इस जगमग खगोल की

जटिल जन्म-कुंडली बनायी है?

फिर क्यों निःश्लेष किया

अलंकरण पर भर में?

एक से शून्य तक

किसकी यह ज्यामितिक सनकी जमुहाई है?

और फिर उनको भी सोचा है –

वृक्षों के तले पड़े

फटे-चिटे पत्ते—–

उनकी अंकगणित में

कैसी यह उधेडबुन?

हवा कुछ गिनती हैः

गिरे हुए पत्तों को कहीं से उठाती

और कहीं पर रखती है ।

कभी कुछ पत्तों को डालों से तोड़कर

यों ही फेंक देती है मरोड़कर …।

कभी-कभी फैलाकर नया पृष्ठ – अंतरिक्ष-

गोदती चली जाती…वृक्ष…वृक्ष…वृक्ष

अबकी बार लौटा तो / कुंवर नारायण

अबकी बार लौटा तो

बृहत्तर लौटूंगा

चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं

कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं

जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को

तरेर कर न देखूंगा उन्हें

भूखी शेर-आँखों से

अबकी बार लौटा तो

मनुष्यतर लौटूंगा

घर से निकलते

सड़को पर चलते

बसों पर चढ़ते

ट्रेनें पकड़ते

जगह बेजगह कुचला पड़ा

पिद्दी-सा जानवर नहीं

अगर बचा रहा तो

कृतज्ञतर लौटूंगा

अबकी बार लौटा तो

हताहत नहीं

सबके हिताहित को सोचता

पूर्णतर लौटूंगा

घर पहुँचना / कुंवर नारायण

हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर

अपने अपने घर पहुँचना चाहते

हम सब ट्रेनें बदलने की

झंझटों से बचना चाहते

हम सब चाहते एक चरम यात्रा

और एक परम धाम

हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं

और घर उनसे मुक्ति

सचाई यूँ भी हो सकती है

कि यात्रा एक अवसर हो

और घर एक संभावना

ट्रेनें बदलना

विचार बदलने की तरह हो

और हम सब जब जहाँ जिनके बीच हों

वही हो

घर पहुँचना

कविता

कविता वक्तव्य नहीं गवाह है

कभी हमारे सामने

कभी हमसे पहले

कभी हमारे बाद

कोई चाहे भी तो रोक नहीं सकता

भाषा में उसका बयान

जिसका पूरा मतलब है सचाई

जिसका पूरी कोशिश है बेहतर इन्सान

उसे कोई हड़बड़ी नहीं

कि वह इश्तहारों की तरह चिपके

जुलूसों की तरह निकले

नारों की तरह लगे

और चुनावों की तरह जीते

वह आदमी की भाषा में

कहीं किसी तरह ज़िन्दा रहे, बस

यक़ीनों की जल्दबाज़ी से

एक बार ख़बर उड़ी

कि कविता अब कविता नहीं रही

और यूँ फैली

कि कविता अब नहीं रही!

यक़ीन करनेवालों ने यक़ीन कर लिया

कि कविता मर गई,

लेकिन शक़ करने वालों ने शक़ किया

कि ऐसा हो ही नहीं सकता

और इस तरह बच गई कविता की जान

ऐसा पहली बार नहीं हुआ

कि यक़ीनों की जल्दबाज़ी से

महज़ एक शक़ ने बचा लिया हो

किसी बेगुनाह को ।

उनके पश्चात्

कुछ घटता चला जाता है मुझमें

उनके न रहने से जो थे मेरे साथ

मैं क्या कह सकता हूँ उनके बारे में, अब

कुछ भी कहना एक धीमी मौत सहना है।

हे दयालु अकस्मात्

ये मेरे दिन हैं?

या उनकी रात?

मैं हूँ कि मेरी जगह कोई और

कर रहा उनके किये धरे पर ग़ौर?

मैं और मेरी दुनिया, जैसे

कुछ बचा रह गया हो उनका ही

उनके पश्चात्

ऐसा क्या हो सकता है

उनका कृतित्व-

उनका अमरत्व –

उनका मनुष्यत्व-

ऐसा कुछ सान्त्वनीय ऐसा कुछ अर्थवान

जो न हो केवल एक देह का अवसान?

ऐसा क्या कहा जा सकता है

किसी के बारे में

जिसमें न हो उसके न-होने की याद?

सौ साल बाद

परस्पर सहयोग से प्रकाशित एक स्मारिका,

पारंपरिक सौजन्य से आयोजित एक शोकसभा:

किसी पुस्तक की पीठ पर

एक विवर्ण मुखाकृति

विज्ञापित

एक अविश्वसनीय मुस्कान!

दूसरी तरफ़ उसकी उपस्थिति

वहाँ वह भी था

जैसे किसी सच्चे और सुहृद

शब्द की हिम्मतों में बँधी हुई

एक ठीक कोशिश…….

जब भी परिचित संदर्भों से कट कर

वह अलग जा पड़ता तब वही नहीं

वह सब भी सूना हो जाता

जिनमें वह नहीं होता ।

उसकी अनुपस्थिति से

कहीं कोई फ़र्क न पड़ता किसी भी माने में,

लेकिन किसी तरफ़ उसकी उपस्थिति मात्र से

एक संतुलन बन जाता उधर

जिधर पंक्तियाँ होती, चाहे वह नहीं ।

किसी पवित्र इच्छा की घड़ी में

व्यक्ति को

विकार की ही तरह पढ़ना

जीवन का अशुद्ध पाठ है।

वह एक नाज़ुक स्पन्द है

समाज की नसों में बन्द

जिसे हम किसी अच्छे विचार

या पवित्र इच्छा की घड़ी में भी

पढ़ सकते हैं ।

समाज के लक्षणों को

पहचानने की एक लय

व्यक्ति भी है,

अवमूल्यित नहीं

पूरा तरह सम्मानित

उसकी स्वयंता

अपने मनुष्य होने के सौभाग्य को

ईश्वर तक प्रमाणित हुई!

आँकड़ों की बीमारी

एक बार मुझे आँकड़ों की उल्टियाँ होने लगीं

गिनते गिनते जब संख्या

करोड़ों को पार करने लगी

मैं बेहोश हो गया

होश आया तो मैं अस्पताल में था

खून चढ़ाया जा रहा था

आँक्सीजन दी जा रही थी

कि मैं चिल्लाया

डाक्टर मुझे बुरी तरह हँसी आ रही

यह हँसानेवाली गैस है शायद

प्राण बचानेवाली नहीं

तुम मुझे हँसने पर मजबूर नहीं कर सकते

इस देश में हर एक को अफ़सोस के साथ जीने का

पैदाइशी हक़ है वरना

कोई माने नहीं रखते हमारी आज़ादी और प्रजातंत्र

बोलिए नहीं – नर्स ने कहा – बेहद कमज़ोर हैं आप

बड़ी मुश्किल से क़ाबू में आया है रक्तचाप

डाक्टर ने समझाया – आँकड़ों का वाइरस

बुरी तरह फैल रहा आजकल

सीधे दिमाग़ पर असर करता

भाग्यवान हैं आप कि बच गए

कुछ भी हो सकता था आपको –

सन्निपात कि आप बोलते ही चले जाते

या पक्षाघात कि हमेशा कि लिए बन्द हो जाता

आपका बोलना

मस्तिष्क की कोई भी नस फट सकती थी

इतनी बड़ी संख्या के दबाव से

हम सब एक नाज़ुक दौर से गुज़र रहे

तादाद के मामले में उत्तेजना घातक हो सकती है

आँकड़ों पर कई दवा काम नहीं करती

शान्ति से काम लें

अगर बच गए आप तो करोड़ों में एक होंगे …..

अचानक मुझे लगा

ख़तरों से सावधान कराते की संकेत-चिह्न में

बदल गई थी डाक्टर की सूरत

और मैं आँकड़ों का काटा

चीख़ता चला जा रहा था

कि हम आँकड़े नहीं आदमी हैं

घबरा कर

वह किसी उम्मीद से मेरी ओर मुड़ा था

लेकिन घबरा कर वह नहीं मैं उस पर भूँक पड़ा था ।

ज़्यादातर कुत्ते

पागल नहीं होते

न ज़्यादातर जानवर

हमलावर

ज़्यादातर आदमी

डाकू नहीं होते

न ज़्यादातर जेबों में चाकू

ख़तरनाक तो दो चार ही होते लाखों में

लेकिन उनका आतंक चौकता रहता हमारी आँखों में ।

मैंने जिसे पागल समझ कर

दुतकार दिया था

वह मेरे बच्चे को ढूँढ रहा था

जिसने उसे प्यार दिया था।

ये शब्द वही हैं

यह जगह वही है

जहां कभी मैंने जन्म लिया होगा

इस जन्म से पहले

यह मौसम वही है

जिसमें कभी मैंने प्यार किया होगा

इस प्यार से पहले

यह समय वही है

जिसमें मैं बीत चुका हूँ कभी

इस समय से पहले

वहीं कहीं ठहरी रह गयी है एक कविता

जहां हमने वादा किया था कि फिर मिलेंगे

ये शब्द वही हैं

जिनमें कभी मैंने जिया होगा एक अधूरा जीवन

इस जीवन से पहले।

ये पंक्तियाँ मेरे निकट

ये पंक्तियाँ मेरे निकट आईं नहीं

मैं ही गया उनके निकट

उनको मनाने,

ढीठ, उच्छृंखल अबाध्य इकाइयों को

पास लाने:

कुछ दूर उड़ते बादलों की बेसंवारी रेख,

या खोते, निकलते, डूबते, तिरते

गगन में पक्षियों की पांत लहराती:

अमा से छलछलाती रूप-मदिरा देख

सरिता की सतह पर नाचती लहरें,

बिखरे फूल अल्हड़ वनश्री गाती…

… कभी भी पास मेरे नहीं आए:

मैं गया उनके निकट उनको बुलाने,

गैर को अपना बनाने:

क्योंकि मुझमें पिण्डवासी

है कहीं कोई अकेली-सी उदासी

जो कि ऐहिक सिलसिलों से

कुछ संबंध रखती उन परायी पंक्तियों से!

और जिस की गांठ भर मैं बांधता हूं

किसी विधि से

विविध छंदों के कलावों से।

बाकी कविता

पत्तों पर पानी गिरने का अर्थ

पानी पर पत्ते गिरने के अर्थ से भिन्न है।

जीवन को पूरी तरह पाने

और पूरी तरह दे जाने के बीच

एक पूरा मृत्यु-चिह्न है।

बाकी कविता

शब्दों से नहीं लिखी जाती,

पूरे अस्तित्व को खींचकर एक विराम की तरह

कहीं भी छोड़ दी जाती है…

प्यार के बदले

कई दर्द थे जीवन में:

एक दर्द और सही, मैंने सोचा —

इतना भी बे-दर्द होकर क्या जीना!

अपना लिया उसे भी

अपना ही समझ कर

जो दर्द अपनों ने दिया

प्यार के बदले…

रोते-हँसते

जैसे बेबात हँसी आ जाती है

हँसते चेहरों को देख कर

जैसे अनायास आँसू आ जाते हैं

रोते चेहरों को देख कर

हँसी और रोने के बीच

काश, कुछ ऐसा होता रिश्ता

कि रोते-रोते हँसी आ जाती

जैसे हँसते-हँसते आँसू!

ऐतिहासिक फ़ासले

अच्छी तरह याद है

तब तेरह दिन लगे थे ट्रेन से

साइबेरिया के मैदानों को पार करके

मास्को से बाइजिंग तक पहुँचने में।

अब केवल सात दिन लगते हैं

उसी फ़ासले को तय करने में −

हवाई जहाज से सात घंटे भी नहीं लगते।

पुराने ज़मानों में बरसों लगते थे

उसी दूरी को तय करने में।

दूरियों का भूगोल नहीं

उनका समय बदलता है।

कितना ऐतिहासिक लगता है आज

तुमसे उस दिन मिलना।

अगली यात्रा / कुंवर नारायण

“अभी-अभी आया हूँ दुनिया से

थका-मांदा

अपने हिस्से की पूरी सज़ा काट कर…”

स्वर्ग की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए

जिज्ञासु ने पूछा − “मेरी याचिकाओं में तो

नरक से सीधे मुक्तिधाम की याचना थी,

फिर बीच में यह स्वर्ग-वर्ग कैसा?”

स्वागत में खड़ी परिचारिका

मुस्करा कर उसे

एक सुसज्जित विश्राम-कक्ष में ले गई,

नियमित सेवा-सत्कार पूरा किया,

फिर उस पर अपनी कम्पनी का

‘संतुष्ट-ग्राहक’ वाला मशहूर ठप्पा

लगाते हुए बोली − “आपके लिए पुष्पक-विमान

बस अभी आता ही होगा।”

कुछ ही देर बाद आकाशवाणी हुई −

“मुक्तिधाम के यात्रियों से निवेदन है

कि अगली यात्रा के लिए

वे अपने विमान में स्थान ग्रहण करें।”

भीतर का दृश्य शांत और सुखद था।

अपने स्थान पर अपने को

सहेज कर बांधते हुए

सामने के आलोकित पर्दे पर

यात्री ने पढ़ा −

“कृपया अब विस्फोट की प्रतीक्षा करें।”

प्रस्थान के बाद

दीवार पर टंगी घड़ी

कहती − “उठो अब वक़्त आ गया।”

कोने में खड़ी छड़ी

कहती − “चलो अब, बहुत दूर जाना है।”

पैताने रखे जूते पाँव छूते

“पहन लो हमें, रास्ता ऊबड़-खाबड़ है।”

सन्नाटा कहता − “घबराओ मत

मैं तुम्हारे साथ हूं।”

यादें कहतीं − “भूल जाओ हमें अब

हमारा कोई ठिकाना नहीं।”

सिरहाने खड़ा अंधेरे का लबादा

कहता − “ओढ़ लो मुझे

बाहर बर्फ पड़ रही

और हमें मुँह-अंधेरे ही निकल जाना है…”

एक बीमार

बिस्तर से उठे बिना ही

घर से बाहर चला जाता।

बाक़ी बची दुनिया

उसके बाद का आयोजन है।

सृजन के क्षण

रात मीठी चांदनी है,

मौन की चादर तनी है,

एक चेहरा?  या कटोरा सोम मेरे हाथ में

दो नयन? या नखतवाले व्‍योम मेरे हाथ में?

प्रकृति कोई कामिनी है?

या चमकती नागिनी है?

रूप- सागर कब किसी की चाह में मैले हुए?

ये सुवासित केश मेरी बांह पर फैले हुए:

ज्‍योति में छाया बनी है,

देह से छाया घनी है,

वासना के ज्‍वार उठ-उठ चंद्रमा तक खिंच रहे,

ओंठ पाकर ओंठ मदिरा सागरों में सिंच रहे;

सृष्टि तुमसे मांगनी है

क्‍योंकि यह जीवन ऋणी है,

वह मचलती-सी नजर उन्‍माद से नहला रही,

वह लिपटती बांह नस-नस आग से सहला रही,

प्‍यार से छाया सनी है,

गर्भ से छाया धनी है,

दामिनी की कसमसाहट से जलद जैसे चिटकता…

रौंदता हर अंग प्रतिपल फूटकर आवेग बहता ।

एक मुझमें रागिनी है

जो कि तुमसे जागनी है।

प्यार की भाषाएँ

मैंने कई भाषाओँ में प्यार किया है

पहला प्यार

ममत्व की तुतलाती मातृभाषा में…

कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में:

दूसरा प्यार

बहन की कोमल छाया में

एक सेनेटोरियम की उदासी तक:

फिर नासमझी की भाषा में

एक लौ को पकड़ने की कोशिश में

जला बैठा था अपनी उंगुलियां:

एक परदे के दूसरी तरफ़

खिली धूप में खिलता गुलाब

बेचैन शब्द

जिन्हें होठों पर लाना भी गुनाह था

धीरे धीरे जाना

प्यार की और भी भाषाएँ हैं दुनिया में

देशी-विदेशी

और विश्वास किया कि प्यार की भाषा

सब जगह एक ही है

लेकिन जल्दी ही जाना

कि वर्जनाओं की भाषा भी एक ही है:

एक-से घरों में रहते हैं

तरह-तरह के लोग

जिनसे बनते हैं

दूरियों के भूगोल…

अगला प्यार

भूली बिसरी यादों की

ऐसी भाषा में जिसमें शब्द नहीं होते

केवल कुछ अधमिटे अक्षर

कुछ अस्फुट ध्वनियाँ भर बचती हैं

जिन्हें किसी तरह जोड़कर

हम बनाते हैं

प्यार की भाषा

मामूली ज़िन्दगी जीते हुए

जानता हूँ कि मैं

दुनिया को बदल नहीं सकता,

न लड़ कर

उससे जीत ही सकता हूँ

हाँ लड़ते-लड़ते शहीद हो सकता हूँ

और उससे आगे

एक शहीद का मकबरा

या एक अदाकार की तरह मशहूर…

लेकिन शहीद होना

एक बिलकुल फ़र्क तरह का मामला है

बिलकुल मामूली ज़िन्दगी जीते हुए भी

लोग चुपचाप शहीद होते देखे गए हैं

मैं कहीं और भी होता हूँ

मैं कहीं और भी होता हूँ

जब कविता लिखता

कुछ भी करते हुए

कहीं और भी होना

धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है

हर वक़्त बस वहीं होना

जहाँ कुछ कर रहा हूँ

एक तरह की कम-समझी है

जो मुझे सीमित करती है

ज़िन्दगी बेहद जगह मांगती है

फैलने के लिए

इसे फैसले को ज़रूरी समझता हूँ

और अपनी मजबूरी भी

पहुंचना चाहता हूँ अन्तरिक्ष तक

फिर लौटना चाहता हूँ सब तक

जैसे लौटती हैं

किसी उपग्रह को छूकर

जीवन की असंख्य तरंगें…

नई किताबें

नई नई किताबें पहले तो

दूर से देखती हैं

मुझे शरमाती हुईं

फिर संकोच छोड़ कर

बैठ जाती हैं फैल कर

मेरे सामने मेरी पढ़ने की मेज़ पर

उनसे पहला परिचय…स्पर्श

हाथ मिलाने जैसी रोमांचक

एक शुरुआत…

धीरे धीरे खुलती हैं वे

पृष्ठ दर पृष्ठ

घनिष्ठतर निकटता

कुछ से मित्रता

कुछ से गहरी मित्रता

कुछ अनायास ही छू लेतीं मेरे मन को

कुछ मेरे चिंतन की अंग बन जातीं

कुछ पूरे परिवार की पसंद

ज़्यादातर ऐसी जिनसे कुछ न कुछ मिल जाता

फिर भी

अपने लिए हमेशा खोजता रहता हूँ

किताबों की इतनी बड़ी दुनिया में

एक जीवन-संगिनी

थोडी अल्हड़-चुलबुली-सुंदर

आत्मीय किताब

जिसके सामने मैं भी खुल सकूँ

एक किताब की तरह पन्ना पन्ना

और वह मुझे भी

प्यार से मन लगा कर पढ़े…

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