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सामूहिक एकता के प्रतीक ‘दही हांडी’ के 111 साल पूरे, महाराष्ट्र के छोटे से गांव से ऐसे हुए थी शुरूआत

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देश भर में कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। इस खास मौके पर जगह-जगह मटकी फोड़, दही हांडी का भी आयोजन किया जाता है। लेकिन कैसे देश में दहि हांडी की शुरूआत हुई? इसका क्या महत्व है? क्यों ये मनाया जाता है? कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब हम आपको इस खबर के जरिए बता रहे हैं।

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दरअसल, दही हांडी की प्रथा साल 1907 में सबसे पहले महाराष्ट्र के घणसोली गांव से शुरू हुई थी लेकिन धीरे-धीरे ये प्रथा मुंबई और उसके आसपाल के इलाकों में फैल गई। समय के साथ अब दही हांडी न सिर्फ महाराष्ट्र बल्की देश के कई हिस्सों में भी पूरे रीति रिवाजों के साथ मनाई जाने लगी है।

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110 वर्षों से चली आ रही इस प्रथा का मुख्य उद्देश्य सामूहिक एकता को बढ़ावा देना है। इसमें गली मोहल्ले और गांवो नगरों की टीम बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती है जिसमें मानव पिरामिड बनाकर मटकी फोड़ी जाती है। मानव पिरामिड बनाने के लिए साहस, टीम वर्क और कॉर्डिनेशन की जरूरत होती है। और इन सबके लिए सबसे जरूरी चीज है सामूहिक एकता।

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मुंबई के पास स्थित घणसोली गांव के हनुमान मंदिर में एक सप्ताह पहले से ही भजन-कीर्तन और शुरू हो जाता है, जो जन्माष्टमी के दिन दही-हांडी फोड़ने के साथ सम्पन्न होता है। बदलते वक्त के साथ अब महिलाओं के द्वारा भी दही हांडी फोड़ने का प्रचलन अब देखने को मिल रहा है जो मन को आनन्द से भर देता है।

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