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कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन से मिला `जन-गण-मन`

कोलकाता अधिवेशन
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देश की बड़ी आबादी के लिए आजादी का आंदोलन तब की कांग्रेस हुआ करती थी। तब के कांग्रेसी क्रांति और शान्ति दोनों को बराबर का महत्व दिया करते थे। वर्तमान की उन्मादी भीड़ कांग्रेस को आंदोलनों तक सीमित रखती है। पर सच्चाई यह है कि कांग्रेस ने आंदोलन से क्रांति और क्रांति से शांति का मार्ग इख्तियार किया है। इसीलिए कांग्रेस में कई गुट रहे। जिन पर कभी कोई खास चर्चा नहीं हुई। बात हमेशा गरम दल और नरम दल की ही होती रही। कांग्रेस का यह हाल बनने से लेकर आजादी तक, तो स्पष्ट दिखाई दिया।

कांग्रेस बीस वीं सदी के प्रारंभ से ही उन्नति के कई पैमानों को छूने लगी थी। लोगों को कांग्रेस में उम्मीद दिखाई देने लगी थी। पर इस उम्मीद ने विश्वास का रूप धारण करने में बहुत समय लिया। सन्- 1930 आते-आते ‘आजादी के दीवानों’ का विश्वसनीय अड्डा बन गई थी, कांग्रेस। इन्हीं ‘आजादी के दीवानों’ ने कांग्रेस का मतलब आंदोलन और संघर्ष बनाया। ऐसा नहीं है कि उस समय आजादी के लिए केवल कांग्रेस बस संघर्ष कर रही थी। और भी संगठन और समीतियां थी, पर वह कांग्रेस से किसी-न-किसी रूप में जुड़ी थी। या फिर कांग्रेस से अलग हुए लोगों ने ही अलग से बनाई थी।

चाहे वह मुस्लिम लीग हो, आरएसएस हो, समाजवादी, गांधीवादी, अंबेडकरवादी, या हिन्दू महासभा ही क्यों न हो। यह सभी जाने-अनजाने कांग्रेस के ही अंग थे। उपरोक्त अंगों को तो आसानी से गिना दिया। लेकिन कांग्रेस में ही कितने अंग थे, यह बता पाना बहुत मुश्किल है। पर यह बात न तो कभी कांग्रेस से छुपी, और न ही कांग्रेस ने कभी छुपाई। यदि इस बात की पुष्टि करनी है, तो तथ्यों के रूप में मात्र कांग्रेस के कुछ चर्चित अधिवेशनों को देख लेते हैं। और समझने की कोशिश करते हैं कि कांग्रेस कैसै असहमत लोगों का सहमत समूह रहा है।

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सन्- 1886 में कांग्रेस का द्वितीय अधिवेशन कोलकाता में हुआ जिसकी अध्यक्षता दादा भाई नौरोजी ने की थी। इस अधिवेशन में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की नेशनल कॉन्फेंस का कांग्रेस में विलय हुआ। इस मुद्दे पर कांग्रेसी एकमत नहीं थे। सन्- 1896 में कांग्रेस का 12 वां अधिवेशन भी कोलकाता में ही हुआ था। इस अधिवेशन की अध्यक्षता रहीमतुल्ला मोहम्मद सयानी ने की थी। इसी अधिवेशन में सर्व प्रथम ‘वंदे मातरम’ गाया गया था। कुछ वर्षों में ही ‘वंदे मातरम’ पर विवाद खड़ा हुआ। जिस पर 12 वें अधिवेशन के लोगों में ही मतभेद थे, इस मुद्दे पर।

साल- 1907 में कांग्रेस का 23 वां अधिवेशन सूरत में सम्पंन हुआ। इस अधिवेश की अध्यक्षता रासबिहारी बोस ने की थी। इस अधिवेशन में कांग्रेस दो हिस्सों में बँट गई थी, नरम दल और गरम दल। सन- 1909 का लाहौर अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता मदनमोहन मालवीय ने की थी। इस अधिवेशन में मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन पद्धति व्यवस्था को अस्वीकृत कर दिया गया था। यह प्रस्ताव अधिवेशन को दो हिस्सों में बाँटता हुआ दिखाई दिया। अंबिकाचरण मजूमदार की अध्यक्षता में कांग्रेस का लखनऊ में अधिवेशन हुआ, सन- 1916 में। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने अपनी धुरविरोधी रही मुस्लिम लीग के साथ समझौता किया।

भले ही यह समझौता ज्यादा कारगर न रहा हो, पर हुआ तो था। इसी अधिवेशन में नरम दल और गरम दल के बीच भी समझौता होता है। कांग्रेस की यह परंपरा बहुत लंबी है। जिसमें सन- 1924 का 39 वां अधिवेशन कौन भूल सकता है जिसकी अध्यक्षता गांधी जी ने बैलगांव में की थी। जब नेहरू और गांधी स्पष्ट रूप से आमने-सामने दिखाई देते हैं, किसानों के मुद्दे पर। यह मामला यही नहीं रुकता। गांधी और नेहरू के मध्य इसी मुद्दे पर कई महिनों तक लगातार पत्र व्यहार होता है। यह बानगी सन- 1929 के लाहौर अधिवेशन में देखने को मिलती है।

इस अधिवेशन की अध्यक्षता पंडित नेहरू कर रहे थे, जिसमें पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित हुआ था। इस अधिवेशन के दौरान जावहर लाल नेहरू अपने गुरू (परछायी) गांधी और अपने पिता मोतीलाल नेहरू का ही कई मुद्दों पर विरोध करते हैं। कांग्रेसी विरोधियों को हमेशा याद रहने वाला 52 वां अधिवेशन कौन भूल सकता है। सन्- 1939 के त्रिपुरा अधिवेशन में अध्यक्षता सुभाषचन्द्र बोस कर रहे थे। बोस ने गांधी की असमति के कारण अध्यक्षीये पद छोड़ दिया था। बोस की जगह राजेन्द्र बाबू को नियुक्त किया गया था। यहां सवाल उठता है कि कांग्रेस में जब इतना मत भिन्न था, तो एकजुटता कैसे रही। और कैसे उसने आजादी के लिए संघर्ष किया।

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इसका उत्तर है टैगोर का जन गण मन जैसा राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत गीत। इस गीत ने आजादी के परवानों के लिए आजादी की अलख जगाई। साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले रवीन्द्रनाथ टैगोर स्वयं भारतीय संस्कृति के संरक्षक भी थे। इसे ऐसा न कह कर, यह भी कह सकते हैं कि गुरूदेव भारतीय संस्कृति के योद्धा थे। जिन्होंने संस्कृति का संचार और संरक्षण किया। उनका लिखा गन गण मन भारतीय आजादी का संघर्ष वाक्य था।

इसे सर्वप्रथम 27 दिसंबर 1911 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दूसरे दिन गाया गया था। इसे बाद में अमृत बाजार पत्रिका ने छापा था। बंगला भाषी इस पत्रिका में लिखा गया कि कांग्रेस के अधिवेशन में दिन के प्रथम सत्र की शुरुआत गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित प्रार्थना से हुई। तो वहीं बंगाली नामक समाचार पत्र ने छापा कि दिन की शुरुआत गुरुदेव द्वारा रचित एक देशभक्ति गीत से की गई। टैगोर की यह रचना संस्कृतनिष्ठ बंग-भाषा में है, ऐसा ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ अख़बार ने शोधकर उस समय लिखा था।

गुरूदेव पर आरोप लगे कि जन-गण-मन उन्होंने अंग्रेजों के शासन का गुणगान किया है। सत्तापक्षी अखबारों ने यह भांति फेलाई थी जिसका खंडन स्वयं गुरूदेव ने की थी लेकिन तब से लेकर आज तक यह बात कही जाती है, बिना किसी तथ्य के। टैगोर ने कहा था कि गाने में वर्णित ‘भारत भाग्य विधाता’ के केवल दो ही मतलब हो सकते हैं: देश की जनता, या फिर सर्वशक्तिमान ऊपर वाला—चाहे उसे भगवान कहें, चाहे देव।

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टैगोर ने विवाद को ख़ारिज करते हुए साल 1939 में एक पत्र लिखा, ”मैं उन लोगों को जवाब देना अपनी बेइज़्ज़ती समझूँगा जो मुझे इस मूर्खता के लायक समझते हैं.” टैगोर का यह गीत अन्य राष्ट्रगीतों से अलग था। इसमें उस वक्त व्याप्त आक्रामक राष्ट्रवादिता से हटकर, इसमें देश प्रेम के नाम पर हिंसा की बात नहीं थी। कुछ समय बाद टैगोर ने एक बुकलेट लिखी थी। उसका शीर्षक ‘नेशनलिज़्म’ था जिसमें वह देश की आबाम को समझाते हैं कि सच्चा राष्ट्रवादी वही हो सकता है जो दूसरों के प्रति आक्रामक न हो।

आने वाले सालों में ‘जन गण मन अधिनायक जय हे’ ने एक भजन का रूप ले लिया। कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशनों की शुरुआत इसी गाने से की जाने लगी। 1917 में टैगोर ने इस गीत को धुन प्रदान की। इस गीत ने लाखों-लाख लोगों को देश की आजादी के लिए प्रेरित किया। और जल्द ही यह गीत आजादीकारों के लिए मंत्र बन गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बात इसे राष्ट्रगीत का दर्जा मिला।

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शिवाषीश तिवारी
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