खरगोन में कैसे शुरू हुई सांप्रदायिक हिंसा ? इन 6 बिंदुओं में समझें पूरी घटना

खरगोन हिंसा : मध्य प्रदेश का खरगोन ज़िला रविवार 10 अप्रैल 2022 को लगभग शाम 5 बजे सांप्रदायिक दंगों की चपेट में आ गया। खरगोन में रामनवमी के मौक़े पर निकल रही शोभायात्रा के समय शुरू इस उपद्रव ने देर शाम तक सांप्रदायिक दंगे का रूप ले लिया। भयानक पत्थरबाज़ी,आगज़नी और लूटमार की गई। इतने बड़े पैमाने पर इससे पहले खरगोन में सांप्रदायिक हिंसा नहीं देखी गई। आइये आपको पूरा घटनाक्रम विस्तार से बताते हैं।

10 अप्रैल को देश में रामनवमी के मौक़े पर जुलूस-शोभायात्राएं निकलीं। इसी दिन देश के अलग-अलग राज्यों से सांप्रदायिक हिंसा की ख़बरें आना शुरू हो गईं। आगज़नी, पत्थरबाज़ी, धार्मिक स्थलों पर तोड़फोड़ जैसी घटनाओं की ख़बर ने सबको हैरत में डाल दिया। हैदराबाद से लेकर गोवा तक। झारखण्ड से लेकर बंगाल तक। राजस्थान से मध्य प्रदेश तक। अचानक से देश सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में आ गया।

10 अप्रैल को जो शहर सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में अधिक आया। वो है मध्य प्रदेश का खरगोन ज़िला। यहां के तालाब चौक एवं टवडी इलाक़े में देर रात तक हिंसा होती रही। हिंसा के बाद जिस चीज़ की सबसे अधिक चर्चा है। वो है मध्य प्रदेश सरकार की एकतरफा कार्रवाई। मौजूदा बीजेपी सरकार ने यहां बिना किसी जांच पड़ताल के अगली ही सुबह एक ही समुदाय के लोगों को दोषी मानकर उनके घर,दुकानों पर बुल्डोज़र चलवा दिए। जिसपर अब राजनीति जारी है।

खरगोन में सांप्रदायिक हिंसा शुरू कैसे हुई ?

मध्य प्रदेश के खरगोन में हिंसा कैसे शुरू हुई, इसको लेकर अलग-अलग बयान सामने आ रहे हैं। खरगोन के एसपी सिद्धार्थ चौधरी को इस हिंसा के दौरान टांग में गोली लगी है। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा- ‘’शोभायात्रा निकलने में किसी कारण देरी हो रही थी। मैंने आयोजकों से धीरे-धीरे आगे बढ़ने को कहा। तालाब चौक के पास मस्जिद में आज़ान शुरू हो गई। यात्रा आगे बढ़ना शुरू ही हुई थी। तब ही किसी ने गली से पत्थर चलाना शुरू कर दिए।‘’

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ये बयान के विपरीत कई बयान और सामने आए हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि जैसे ही शोभायात्रा मस्जिद के नज़दीक़ पहुंची तो वहां तेज़ आवाज़ में आपत्तिजनक गाना बजना शुरू हो गया। तेज़ आवाज़ में गाना बचाकर एक विशेष समुदाए के खिलाफ़ ग़लत नारे लगाए जाने लगे। इसके बाद दूसरे समाज के लोग भड़क उठे और पत्थबाज़ी शुरू हो गई। फिर इसके बाद दोनों समुदाए आमने-सामने आ गए। आगज़नी,तोड़फोड़,लूटमार शुरू हो गई। वहीं इस घटना में खरगोन के पुलिस अधीक्षक (एसपी) सिद्धार्थ चौधरी को हिंसा में गोली लगी और उनके अलावा छह पुलिसकर्मियों सहित कम से कम 24 लोग घायल होने की जानकारी है।

देर शाम शुरू हुई हिंसा खरगोन शहर के अलग-अलग इलाकों में पहुंच गई। छोटी मोहन टाकीज, संजय नगर, मोतीपुरा, भाटवाड़ी, पोस्ट ऑफिस चौराहे के पास जुलूस के दौरान माहौल खराब हुआ। शाम 5 बजे से लेकर रात 3 बजे तक खरगोन में तांडव होता रहा। दोनों तरफ से दमभर ईंट-पत्थर चलाए गए। आगज़नी की गई। अब धीरे-धीरे CCTV फुटेज सामने आ रहे हैं। लेकिन अगली ही सुबह केवल एक ही समुदाए को सरकार ने दोषी बताकर उनके घर,दुकानों पर बुलडोज़र चलवाना शुरू कर दिया। एक ही समुदाए के लोगों को पुलिस चुन-चुनकर पकड़ने लगी।

गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने एकतरफा एक्शन को सही क़रार दिया

अलग-अलग मीडिया संस्थानों ने बात करते हुए मध्य प्रदेश के गृहमंत्री ने बिना किसी जांच-पड़ताल के मुस्लिम समुदाए को पूरी तरह से दोषी बता दिया। पत्रकार ने जब गृहमंत्री से सवाल किया कि दूसरे समुदाए ने भी हिंसा की,पत्थर चलाए और आगज़नी की। क्या उनपर कोई एक्शन होगा ? इस पर गृहमंत्री ने कहा-नहीं होगा कोई एक्शन। उन्होंने अपनी रक्षा में किया ये सब। बार-बार वो मुसलिम समुदाए को दोषी बताकर उनका सर कुचलने की बात कहते रहे।

खरगोन हिंसा के बाद अगली सुबह गृहमंत्री का बयान आया-जिन घरों से पत्थर आए हैं। उन घरों को हम पतथर का ढ़ेर बना देंगे। फिर क्या था। मुस्लिम घर,दुकानों पर बुलडोज़र कहर बनकर टूटे। चुन-चुनकर प्रशासन घर,दुकानो को ढहाना शुरू कर दिया। घर तोड़ने पर जब मीडिया ने सवाल किया तो जिला प्रशासन ने जवाब दिया कि खरगोन के चार इलाकों में 16 घर और 29 दुकानों तोड़ा गया है। उन सबको अवैध कब्ज़ा करके बनाया गया था। इस मामले पर प्रशासन और सरकार घिरते नज़र आ रहे हैं।

क्या प्रशासन द्वारा घर,मकान तोड़ना वैध है?

मध्य प्रदेश में फिलहाल ऐसा कोई क़ानून लागू नहीं है, जो ये कहता है कि दंगे में शामिल लोग या वो लोग जिन्होंने सड़कों पर उतर कर संपत्ति (सार्वजनिक या निजी) का नुकसान किया हो उनका घर गिरा दिया जाए।

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किसी आरोपी व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई तभी की जा सकती है, अदालत में वो दोषी पाया जाएगा। साथ ही कार्रवाई के रूप में जेल या फिर जुर्माना ही लगाया जा सकता है। उसकी संपत्ति को नष्ट करने का कोई प्रावधान नहीं होता। भारतीय कानून के तहत इसकी बिल्कुल अनुमति नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के एक वकील शादान फरासत ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “पत्थरबाज़ी की बात तो छोड़िए, अगर इससे भी गंभीर अपराध हो तो उसके लिए भी अधिकारी घरों या दुकानों को नष्ट नहीं कर सकते।”

उन्होंने आगे कहा, “यदि कोई अवैध निर्माण हैं, तो कानून के अनुसार नगरपालिका को पहले नोटिस जारी करना होगा. लेकिन इस तरह प्रशासन द्वारा सीधे इस तरह की कार्रवाई प्रथम दृष्टया मनमानी है।”

पुलिस ने चुन-चुनकर केवल एक समुदाए के लोगों को ही पकड़ा

पुलिस की कार्रवाई भी सवालों के घेरे में है। एकतरफा एकश्न लेते हुए पुलिस ने घर में घुस-घुसकर मुस्लिमों को पीटा और उन्हें गिरफ्तार कर ले गई। गृहमंत्री ने हिंदू समुदाए को पहले ही क्लीनचिट दे दी। उन्होंने केवल मुस्लमों को दोषी ठहरा कर सर कुचलने की बात कह डाली। पुलिस ने किया भी ऐसा ही। पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए अब तक 95 लोगों को गिरफ्तार किया है। इसके साथ ही अफवाह फैलाने के आरोप में 3 शासकीय मुस्लिम कर्मचारियों को नौकरी से बरखास्त कर दिया है और एक को सस्पेंड कर दिया।

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PM आवास योजना के तहत बना मकान भी अवैध बताकर गिरा दिया

खसखसवाड़ी क्षेत्र के रहने वाले अमजद खान, जिनका घर हिंसा के एक दिन बाद जिला प्रशासन द्वारा तोड़े गए 12 घरों में से एक था, ने दावा किया कि उनका घर प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत बनाया गया था।

हालांकि, खरगोन कलेक्टर अनुग्रह पी ने दावा किया, “ये नाम पहले से ही उन लोगों की लिस्ट में थे, जिन्होंने सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण करके घर बनाए हैं और संयोग से उनमें से कई दंगों में शामिल थे। गिराने का अभियान पूरी तरह से कानूनी है, सभी को पहले ही सूचना दी गई थी।”

गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने क़ानून की धज्जियां उड़ा दीं

खरगोन में एक समुदाए पर बुल्डोज़र का कहर और गिरफ्तारियां इस बात की ओर साफ इशारा करती हैं कि पुलिस और सरकार की मुस्लिम समुदाए के प्रति नफरत को उजागर कर दिया।देश में क़ानून का काम न्याय करना है। ना कि बदला लेना।

सवाल स्थानीय प्रशासन और सरकार दोनों से है। एक दिन में आखिर कैसे पता चला कि पत्थरबाज़ कौन था ? उस पत्थरबाज़ का घर कहां है? अगर कोई घर अवैध है तो क्या खाली करने का नोटिस दिया गया ? अगर कोई आरोपी है तो क्या उसके पूरे परिवार को सज़ा दी जाएगी? और सबसे अहम सवाल दोनों तरफ के दंगाइयों के घर क्यों नहीं गिराए गए, एक तरफा कार्रवाई क्यों हुई? इससे साफ़ ज़ाहिर है कि पुलिस प्रशासन-सरकार ने बदले की भावना से एक्शन लिया।

क्या गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा इन सवालों का जवाब दे सकते हैं ?

क्या गृहमंत्री ये बता सकते हैं कि सुरक्षा के लिए उनकी पुलिस की क्या तैयारी थी, करौली जैसी घटना के बाद उनके पास क्या इंटेल रिपोर्ट थी ? संवेदनशील इलाकों में ड्रोन से निगरानी करनी होती है ? नरोत्तम मिश्रा की पुलिस क्या सब कर पाई ? लगातार दूसरे दिन हिंसा क्यों नहीं रुक पाई ? जिले के कप्तान को क्या निर्देश थे? इन सब का जिम्मेदार कौन है ? किस अधिकारी पर कार्रवाई हुई ? इन सारे सवालों का जवाब देने के बजाय किसी राज्य का गृहमंत्री ये जवाब थे कि पत्थर आएगा तो पत्थर चलेगा।

हमारे देश में क्या अब बुलडोज़र जज है? क्या मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा जज हैं? या पुलिस जज है ? पूरे परिवार को सड़क पर ला देना ये कहां का न्याय है? अंतिम फैसला करना अदालत का काम है। अगर न्यायपालिका का काम यूं बुलडोज़र तले रौंदा जाएगा तो कहां का कानून और कैसा संविधान ? देश की अदालतों का होना ना होना फिर एक ही बात कहलाएगा।

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