कश्मीर: मेरे लहू में जल उठे उतने ही ताज़ा-दम चराग़..

‘सबका साथ सबका विकास’, जैसे नारों को 2014 के आम चुनाव में मुद्दा बनाकर दिल्ली की कुर्सी पर क़ाबिज़ होने वाले नरेंद्र मोदी ने, 2019 के आम चुनाव में नारा तो ‘न्यू इंडिया’ का दिया और राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर फ़िर दिल्ली की कुर्सी पर क़ब्ज़ा जमा लिया। मोदी सरकार ने 2019 में धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर को नर्क में तब्दील कर दिया। मोदी के “न्यू इंडिया” ने कश्मीर में बीते पांच अगस्त को 370 का ख़ात्मा कर दिया।

सैन्य शक्ति के दम पर पूरे कश्मीर में कर्फ्यू लगाकर 80 लाख लोगों को अपने घरों में ही क़ैद कर दिया और फोन, इंटरनेट और टेलीविज़न कनेक्शनों को काटकर उन्हें दुनिया की मुख्यधारा से अलग कर दिया।  हजारों कश्मीरियों को गिरफ्तार कर उन्हें जेलों में डाल दिया गया। कुछ को गोली मारकार मौत के घाट उतार दिया गया है। कश्मीरी बहुत मुश्किल वक्त से गुज़र हैं। तकरीबन 80 लाख कश्मीरी, बीते 80 दिनों से कर्फ़्यू में बंद हैं। नेहरू और गांधी की जो धर्म निरपेक्षता थी, वो कहती थी कि हिंदुस्तान की बुनियाद धर्म निरपेक्षता है। वे सभी धर्म को बराबर मानते थे। आरएसएस की विचारधारा में नेहरू और गांधी की कोई जगह नहीं है। ये न अंतरराष्ट्रीय क़ानून को मानते हैं, न सुप्रीम कोर्ट, न हाई कोर्ट को मानते हैं, वे सिर्फ़ हिंदुत्व को मानते हैं।

कश्मीर के संबंध में, भाजपा ने दो बड़े झूठ फैलाए हैं। पहला यह कि सरदार वल्लभ भाई पटेल अनुच्छेद 370 के खिलाफ थे और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे जबरन संविधान में शामिल किया। तथ्य यह है कि पंडित नेहरू संयुक्त राज्य में थे जब वह 2 नवंबर 1949 को यह संविधान में शामिल किया गया। उनका पहले का समर्थन प्राप्त किया गया था, लेकिन सरदार पटेल ने खुद असेंबली को मनाने का काम लिया। उस समय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी विधानसभा में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने विरोध करने के बजाय चुप रहना पसंद किया। बाद में, जनसंघ की अध्यक्षता संभालने के बाद, वह राजनीतिक लाभ के लिए उनके खिलाफ हो गए।

भारत सरकार ने धारा 370 और अनुच्छेद 35A को रद्द करने का एकतरफ़ा फैसला किया। यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र से छेड़छाड़ करने वाला तथा मानवाधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है। इन विशेष प्रावधानों को तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने कश्मीर की जनता एवं कश्मीरी नेता शेख़ अब्दुल्ला के साथ विस्तृत वार्ताओं के बाद भारतीय संविधान में शामिल किया गया था।

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वास्तविकता यह है कि धारा 370 के तहत कश्मीर का विशेष दर्जा कोई अपवाद नहीं है, बल्कि भारतीय संविधान की एक विशेषता है। इसी तरह की विशेष स्थिति नागालैंड, मणिपुर और असम सहित कई अन्य राज्यों को दी गई है। हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों के निवासियों को भी संपत्ति के संबंध में विशेष अधिकार प्राप्त हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि इन राज्यों के निवासियों के पास दोहरी नागरिकता है अथवा इन पर भारतीय संविधान लागू नहीं होता। इसका अर्थ केवल यह है कि इन राज्यों की एक विशिष्ट क्षेत्रीय और सांस्कृतिक पहचान है, जिसकी वे रक्षा करना चाहते हैं तथा भारत का संविधान उनकी भाषा, रीति-रिवाजों और संस्कृति की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देने के उनके अधिकार को मान्यता देता है।

यह क़दम भारत सरकार और जम्मू-कश्मीर के लोगों के बीच विश्वास की कमी का अंत सिद्ध होगा। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के 80 दिन के बाद भारत प्रशासित कश्मीर के 10 ज़िलों में क़ानून व्यवस्था की क़रीब 300 घटनाएं हुई हैं। इनमें से 160 घटनाएं सिर्फ़ श्रीनगर में हुई हैं। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक इन घटनाओं में कम से कम 100 आम नागरिक पेलेट गन से ज़ख्मी हुए हैं।

कश्मीर पर हो रहे ज़ुल्म पर आज लोग ख़ामोश हैं। मानवता के सभी उसूलों को तोड़कर मोदी सरकार ने बंदूक की नोक पर 80 लाख लोगों पर ज़ुल्म किया और ज़ुल्म पर परदा भी डाला। अब सवाल यह है कि आख़िर कब तक सरकार कश्मीर को जेल में तब्दील कर के रखती है।

एक कश्मीरी के दर्द को पीरज़ादा की ये नज़्म बहुत ही बेहतर तरीक़े से बयान करती है…

क़त्ल-गाह की रौनक़

हस्ब-ए-हाल रखनी है

ग़म बहाल रखना है

जाँ सँभाल रखनी है

ज़ोर-ए-बाज़ू-ए-क़ातिल

इंतिहा का रखना है

दशना तेज़ रखना है

और बला का रखना है

और क्या मिरे क़ातिल

इंतिज़ाम बाक़ी है

कोई बात होनी है

कोई काम बाक़ी है

वक़्त पर नज़र रखना

वक़्त एक जादा है

हाँ बता मिरे क़ातिल

तेरा क्या इरादा है

वक़्त कम रहा बाक़ी

या अभी ज़ियादा है

मैं तो क़त्ल होने तक

मुस्कुराए जाउँगा

ये लेखक के निजी विचार हैं…

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