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टूटा सब्र का बांध, खत्म हुआ कमलनाथ का समय

Kamalnath government in danger
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ग्राउंड रिपोर्ट । भोपाल

जहां पूरा देश होली के रंग में सराबोर है वहीं मध्यप्रदेश की राजनीति में भांग घुल गई है। 15 साल के वनवास के बाद बमुश्किल मध्यप्रदेश की सत्ता में लौटी कांग्रेस आपसी गुटबाजी के चलते महज़ 1 साल 4 महीने में ही गिरने की कगार पर आ पहुंची है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस दो ध्रुव पर काम करती है पहला है कमलनाथ और दूसरा ज्योतिरादित्य सिंधिया। पार्टी में हो रही लगातार उपेक्षा के चलते सिंधिया ने कांग्रेस का दामन छोड़ने का मन बना लिया है।

सिंधिया खेमें के करीब 17 विधायक बेंगलुरु की एक होटल में है इसमें 8 मंत्री भी शामिल है। अभी मध्य प्रदेश विधानसभा में 230 सीटें हैं, जिसमें से दो विधायकों के निधन होने की वजह से दो सीटें रिक्त हैं। ऐसे में फिलहाल सदस्यों की कुल संख्या 228 है। ऐसे में बहुमत का आंकड़ा 115 हुआ। अभी कांग्रेस के पास 114, भाजपा के पास 107, सपा के पास 1, बसपा के पास 2 और निर्दलीय चार विधायक हैं। सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों का कांग्रेस को समर्थन है। अगर बेंगलुरु गए 17 विधायक इस्तीफा दे देते हैं तो विधानसभा के सदस्यों की संख्या 211 रह जाती है। ऐसे में बहुमत का आंकड़ा होगा 106। कांग्रेस के पास केवल 97 विधायक रह जाएंगे और भाजपा के साथ 107 विधायक होंगे। अगर सपा, बसपा और निर्दलीय विधायक भी कांग्रेस को समर्थन देते हैं तो वह बहुमत का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगी। इन सबके समर्थन के साथ कांग्रेस के पास 104 विधायक होंगे। इससे साफ जाहिर हो रहा है कि इस तरह सत्ता भाजपा के हाथों में जा सकती है।

क्यों हुए बागी सिंधिया?

आपको बता दें कि ज्योतिरादित्य सिंधिया हमेशा से मध्यप्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे हैं लेकिन जब 2018 में राज्य में कांग्रेस की सरकार बनीं तो उनकी जगह कमलनाथ को मौका दिया गया। राहुल गांधी ने कमलनाथ और सिंधिया के साथ तस्वीर जारी करते हुए एक तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली जिसमें कहा कि सब्र और समय दोनों बड़े योद्धा हैं। इसके द्वारा राहुल गांधी ने यह संकेत दिया कि यह कमलनाथ का समय है और ज्योतिरादित्य को थोड़ा और सब्र करना होगा क्योंकि कमलनाथ कि यह आखिरी पारी होगी, सिंधिया के पास आगे और भी समय है। लेकिन धीरे-धीरे सिंधिया का सब्र टूटता गया क्योंकि मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ के साथ मिलकर उन्हें अलग-थलग करने की रणनीति पर काम शुरु कर दिया। सिंधिया को न तो प्रदेश अध्यक्ष का पद दिया गया न ही उप मुख्यमंत्री का। कहा जाता है कि उपमुख्यमंत्री का पद लेने से सिंधिया ने खुद ही मना किया था।

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दिग्विजय नें अपनी राज्यसभा सीट बचाने के चक्कर में गिरवा दी कमलनाथ की सरकार?

कहा जा रहा है कि मौजूदा राजनीतिक संकट मध्यप्रदेश से कांग्रेस के खेमे में जाने वाली दो राज्यसभा सीटों को लेकर शुरु हुआ। सिंधिया मध्यप्रदेश से राज्यसभा जाना चाहते थे। लेकिन कमलनाथ और दिग्विजय इसके खिलाफ थे क्योंकि एक सीट पर दिग्विजय की दावेदारी थी जो पक्की सीट थी और दूसरी सीट पर जोड़ तोड़ कर अपने सदस्य को राज्यसभा भेज सकती थी। इस सीट पर भी केटीएस तुलसी और प्रियंका गांधी के राज्यसभा भेजे जाने के कयास लगाए जा रहे थे। कांग्रेस में एक नियम है कि जो लोकसभा चुनाव हार जाता है उसे राज्यसभा सीट नहीं दी जाती। ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से लोकसभा चुनाव हार गए थे। ये सारी बातें सिंधिया के खिलाफ जा रही थी। अगर दिग्विजय अपनी सीट सिंधिया को दे देते तो शायद राज्य में इतना बड़ा संकट पैदा नहीं होता। हालांकि कांग्रेस दूसरे राज्य से सिंधिया को राज्यसभा भेजने के लिए तैयार थी लेकिन सिंधिया केवल मध्यप्रदेश से ही राज्यसभा जाना चाहते थे।

सिंधिया बन सकते हैं उप मुख्यमंत्री या मिल सकती है केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह?

मध्यप्रदेश में राजनीतिक जानकार बताते हैं कि सिंधिया अब इतने दूर जा चुके हैं किअब उनकी वापसी मुश्किल है। सिंधिया गृह मंत्री अमित शाह के साथ प्रधानमंत्री मोदी से मिलने उनके निवास लोक कल्याण मार्ग पहुंचे हैं, कयास लगाए जा रहे हैं कि सिंधिया जल्द ही भाजपा में शामिल हो जाएंगे। भाजपा उन्हें उप मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्रीमंडल में जगह दे सकती है। आपको बतां दें कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के परिवार का एक धड़ा बीजेपी में ही है। राजमाता विजयराजे सिंधिया ने मध्यप्रदेश में भाजपा को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई थी।

सिंधिया परिवार और बीजेपी

ग्वालियर पर राज करने वाली राजमाता विजयराजे सिंधिया ने 1957 में कांग्रेस से अपनी राजनीति की शुरुआत की। वह गुना लोकसभा सीट से सांसद चुनी गईं। सिर्फ 10 साल में ही उनका मोहभंग हो गया और 1967 में वह जनसंघ में चली गईं। विजयराजे सिंधिया की बदौलत ग्वालियर क्षेत्र में जनसंघ मजबूत हुआ और 1971 में इंदिरा गांधी की लहर के बावजूद जनसंघ यहां की तीन सीटें जीतने में कामयाब रहा। खुद विजयराजे सिंधिया भिंड से, अटल बिहारी वाजपेयी ग्वालियर से और विजय राजे सिंधिया के बेटे और ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया गुना से सांसद बने।

उनका विमान हादसे में 2001 में निधन हो गया। ज्योतिरादित्य सिंधिया इनके पुत्र हैं। तभी से ज्योतिरादित्य कांग्रेस में है। अगर अब वे भाजपा में आते हैं तो यह उनकी घर वापसी होगी।

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माधवराव सिंधिया ने रखा कांग्रेस में कदम

माधव राव सिंधिया अपने मां-पिता के इकलौते बेटे थे। वह चार बहनों के बीच अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे। माधवराव सिंधिया सिर्फ 26 साल की उम्र में सांसद चुने गए थे, लेकिन वह बहुत दिन तक जनसंघ में नहीं रुके। 1977 में आपातकाल के बाद उनके रास्ते जनसंघ और अपनी मां विजयराजे सिंधिया से अलग हो गए। 1980 में माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीतकर केंद्रीय मंत्री भी बने। 2001 में एक हादसे में माधवराव सिंधिया की मौत हो गई तो ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने पिता की विरासत संभालते रहे और कांग्रेस के मजबूत नेता बने रहे। गुना सीट पर उपचुनाव हुए तो ज्योतिरादित्य सिंधिया सांसद चुने गए। 2002 में पहली जीत के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया कभी चुनाव नहीं हारे थे लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें करारा झटका लगा। कभी उनके ही सहयोगी रहे कृष्ण पाल सिंह यादव ने ही सिंधिया को हरा दिया। अगर अब वे भाजपा में आते हैं तो यह उनकी घर वापसी होगी।

सिंधिया परिवार की बेटिंया भाजपा में ही रहीं

विजयराजे सिंधिया की बेटियों वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया ने भी राजनीति में एंट्री की। 1984 में वसुंधरा राजे बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल हुईं। वह कई बार राजस्थान की सीएम भी बन चुकी हैं। वसुंधरा राजे सिंधिया की बहन यशोधरा 1977 में अमेरिका चली गईं। उनके तीन बच्चे हैं लेकिन राजनीति में किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई। 1994 में जब यशोधरा भारत लौटीं तो उन्होंने मां की इच्छा के मुताबिक, बीजेपी जॉइन की और 1998 में बीजेपी के ही टिकट पर चुनाव लड़ा। पांच बार विधायक रह चुकी यशोधरा राजे सिंधिया शिवराज सिंह चौहान की सरकार में मंत्री भी रही हैं।

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