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पहली बार संघ के आगे नतमस्तक हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया

ज्योतिरादित्य सिंधिया व उनके सचिव पर चुनाव के टिकट बेचने का आरोप !
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मामला है, हाल ही में कांग्रेस से बीजेपी में आए ग्वालियर के महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया के पहली बार नागपुर दौरे का। भाजपा में शामिल होने के बाद बीजेपी नेता और राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया मंगलवार को नागपुर में स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पहुंचे हुए थे। जहां उन्होंने आरएसएस के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों से मुलाकात की।

नागपुर पहुंचे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सबसे पहले आरएसएस के संस्थापक के बी हेडगेवार के आवास का दौरा किया। इसके बाद वे हेडगेवार स्मृति भवन गए जहां उन्होंने श्रद्धांजलि अर्पित की। मीडिया से बात करते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि-


यह जगह सिर्फ एक निवास नहीं है। यह एक प्रेरणादायक जगह है जो देश की सेवा करने के लिए मुझे उर्जा प्रदान करती है। यह लोगों के लिए एक प्रेरणा का स्थान है। 

-ज्योतिरादित्य सिंधिया

तो आप सोच रहे होंगे इसमें क्या चौंकाने वाला है अगर ज्योतिरादित्य भाजपा में आए हैं तो संघ से रिश्ते तो बनाने ही होंगे। वजिब बात है। लेकिन यहां जो गौर करने वाली बात है वह यह है कि जब सिंधिया कांग्रेस में थे तब वो संघ को दलित विरोधी, किसान विरोधी, लोकतंत्र विरोधी बताया करते थे अब वो संघ को ऊर्जा का केंद्र बता रहे हैं। तो जनता किस सिंधिया पर भरोसा करे? पहले वाले पर या अभी वाले पर? क्या व्यक्ति रातों रात अपनी विचारधारा बदल सकता है? तो आप कहेंगे कुछ फायदा हो तो इतना मुश्किल भी नहीं है। राजनीति में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाएंगे जहां हमने नदियों के दो किनारों को मिलते देखा है। वाम का संघी हो जाना, संघी का वामपंथी हो जाना, कांग्रेसी का भाजपाई हो जाना, समाजवादी का बहुजन समाजवादी हो जाना। भारतीय राजनीति में सारे एक्सपेरिमेंट किए जा चुके हैं।

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व्यक्ति और संगठन बिना विचार के कुछ नहीं होता, बेशक हम आत्मा को नहीं देख सकते लेकिन व्यक्ति के विचार उसकी आत्मा के अच्छे, बुरे, दयालू और क्रूर होने का प्रमाण ज़रुर देते हैं। ऐसे ही राजनीति में नेता को पार्टी की विचारधारा पर चलना होता है। अमेरिकी राजनीति में हर नेता के अपने अलग विचार हो सकते हैं। वह पार्टी से इतर भी अलग-अलग मुद्दों पर अपने विचार रख सकता है। लेकिन भारत में नेताओं को पार्टी के विचारों के विरुद्ध जाने के परिणाम भुगतने पड़ते हैं।

खैर जैसा कि हमने कहा भारत में अगर नेता के तौर पर कहीं पहुंचना है तो पार्टी की विचारधारा पर चलना ही होगा। जब सिंधिया बीजेपी में गए थे तब राहुल गांधी ने कहा था कि-

 
‘सिंधिया जी को बहुत अच्छी तरह जानता हूं. उनकी विचारधारा को जानता हूं. वह मेरे साथ कॉलेज में थे. उन्हें अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर डर लगा.  उन्होंने अपनी विचारधारा को जेब में डाल दिया और आरएएसएस के साथ चले गए.’

राहुल गांधी

हम बेफिज़ूल में विचारधारा को इतना तूल देते हैं और लोग कपड़ों की तरह विचारधारा बदल लेते हैं। इसलिए हंसिए मुस्कुराईए यह सर्कस है इसे सीरियसली लेने की ज़रुरत नहीं है।

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