जे पी नड्डा का भाजपा अध्यक्ष बनना और कांग्रेस का एक परिवार के चंगुल में फंसे रहना

Sharing is Important
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

विचार | पल्लव जैन

भारतीय जनता पार्टी ने आधिकारिक रूप से जगत प्रकाश नड्डा को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया। वे भाजपा के 11वे अध्यक्ष होंगे और अमित शाह की जगह लेंगे। इसी के साथ यह भी संदेश भाजपा ने दिया कि वह संगठन और काडर वाली पार्टी है। अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद जेपी नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था। तब लग रहा था कि पीछे से पार्टी की कमान अमित शाह शाह ही संभालेंगे लेकिन साढ़े 5 साल बाद नड्डा को निर्विरोध अध्यक्ष घोषित कर दिया गया।

मुश्किल दौर में नड्डा ने संभाली कमान

नड्डा ऐसे समय में भाजपा की कमान संभाल रहे हैं जब पार्टी बुरे दौर से गुज़र रही है। पिछले 2 सालों में पार्टी कई राज्यों में चुनाव हार चुकी है। जिन राज्यों में भाजपा ने जीत दर्ज की वहां भी उसका जनाधार गिरा है। NRC- CAA का चौतरफा विरोध और खराब अर्थव्यवस्था के बीच आगामी चुनावों में भाजपा को जीत दिलाने की चुनौती उनके सामने होगी। दिल्ली में फरवरी में चुनाव होने हैं उसके बाद बिहार और फिर पश्चिम बंगाल में चुनाव हैं। इन तीनों चुनावों में भाजपा के लिए जीत आसान नहीं होगी। बिहार में नीतीश कुमार के साथ सीटों का समझौता भी चुनौती भरा होगा।

विधायक से देश की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष पद तक का सफर

जगत प्रकाश नड्डा का सियासी सफर 1993 में हिमाचल विधानसभा चुनाव जीतने के साथ शुरू हुआ। 1998 में वे हिमाचल सरकार में कैबिनेट मंत्री बनें। 2008 में भी धूमल सरकार में उन्होंने कई अहम मंत्रालय संभाले। 2012 में राज्यसभा सांसद चुने जाने के साथ केंद्रीय राजनीति में उनका पदार्पण हुआ। मोदी सरकार-1 में उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री का पद संभाला और जून 2019 में भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए।

अब तक कौन-कौन बना है बीजेपी का अध्यक्ष…

अटल बिहारी वाजपेयी 1980-1986, लाल कृष्ण आडवाणी 1986- 1991, मुरली मनोहर जोशी 1991-1993, लाल कृष्ण आडवाणी 1993-1998, कुशाभाऊ ठाकरे 1998-2000, बंगारू लक्ष्मण 2000-2001, जेना कृष्णमूर्ति 2001- 2002, वेंकैया नायडु 2002- 2004, लाल कृष्ण आडवाणी 2004-2006, राजनाथ सिंह 2006-2009, नितिन गडकरी 2009-2013 राजनाथ सिंह 2013-2014, अमित शाह 2014-2020, जेपी नड्डा 2020 से 2023.

कब कौन बना बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष

जे पी नड्डा का कार्यकाल 3 साल का होगा इस दौरान वे पार्टी की चुनावी रणनीति देखेंगे। उनके सामने अमित शाह की तरह पार्टी को सफलता दिलाने की चुनौती होगी। अमित शाह ने भाजपा के चाणक्य की तरह काम करके पार्टी को हिंदी पट्टी के साथ-साथ उत्तर पूर्व और दक्षिण के राज्यों में विस्तार दिलाया। उन्होंने कई ऐसे राज्यों में पार्टी की सरकार बनवाई जहां भाजपा का जनाधार शून्य था। बतौर पार्टी भाजपा का सबसे अधिक विस्तार शाह के कार्यकाल में ही हुआ।

अब बात करते हैं देश की अन्य पार्टियों के वंशवाद की…

भाजपा की जनता के बीच पैठ की एक अहम वजह उसकी संगठन क्षमता भी है। भाजपा इकलौती ऐसे बड़ी पार्टी है जिसमें कोई भी आम नेता मेहनत कर फलक तक पहुंच सकता है। यहां किसी खास परिवार का प्रभुत्व न होना इसे आकर्षक बनाता है। नेतृत्व का संकट भी पार्टी में पैदा नहीं हुआ। अटल के बाद आडवाणी, आडवाणी के बाद राजनाथ-सुषमा, गडकरी-जेटली सरीखे दिग्गज नेता भाजपा से आए। अब नए नेता धीरे-धीरे ऊपर आ रहे हैं। वहीं अगर हम दूसरी पार्टियों पर नज़र डालें तो वहां परिवार विशेष और व्यक्ति विशेष का ही वर्चस्व बना रहा। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की बात की जाए तो स्वतंत्रता के बाद पार्टी के अध्यक्ष पद पर कई लोग काबिज़ हुए लेकिन इंदिरा गांधी के दौर के बाद से कांग्रेस गांधी परिवार की बपौती बन गई। अब कांग्रेस ऐसे दौर में आ चुकी हैं जहाँ उनके पास अध्यक्ष पद पर बैठाने के लिए कोई है ही नहीं। जब राहुल गांधी ने 2019 की हार के बाद अध्यक्ष पद त्यागा तो सोनिया गांधी को दोबारा कमान सौंप दी गई। आगे भी किसी गैर गांधी के अध्यक्ष बनने की संभावना कम दिखाई देती है।

ऐसे ही समाजवादी पार्टी मुलायम परिवार के आसपास घूमती है। बसपा में मायावती का कोई विकल्प नही है। शिवसेना ठाकरे परिवार की पार्टी है। NCP पवार परिवार से बाहर नहीं निकलती। आम आदमी पार्टी से कुछ उम्मीद थी, लेकिन योगेंद्र यादव सरीखे बड़े नेताओं के बाहर होने के बाद आप केजरीवाल के इर्द गिर्द सिमटती दिखाई देती है। ऐसे में भाजपा ही एक मात्र पार्टी दिखती है जहां पार्टी लोकतंत्र प्रभावी दिखाई देता है।

क्या शाह-मोदी के इशारे पर नाचेंगे नड्डा

भाजपा को करीब से समझने वाले कहते हैं कि भाजपा में वही होता है जो शाह-मोदी चाहते हैं। नड्डा अध्यक्ष ज़रूर बन जाए लेकिन सभी अहम फैसलों में शाह-मोदी का दखल होगा। यही ट्रेंड सरकार में भी देखा जाता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे सभी मंत्रालय प्रधानमंत्री मोदी ही चलाते हों। रक्षा संबंधी सभी बड़ी बैठकों से रक्षा मंत्री गायब होते हैं। विदेश मंत्रालय तो मानों सुषमा स्वराज के जाने के बाद खत्म ही हो गया है। और वित्त मंत्री भी वित्त से जुड़ी अहम बैठकों से नदारद रहती हैं।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नड्डा बतौर अध्यक्ष स्वतंत्रता से काम करेंगे या समय-समय पर शाह का दखल जारी रहेगा।

  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •