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JNUSU Election 2019 : कभी 40 रुपये दिहाड़ी तो कभी मनरेगा में मजदूरी, लेकिन आज दलित छात्र की अध्यक्ष पद पर दावेदारी

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नेहाल रिज़वी | नई दिल्ली

हर इंसान कभी ना कभी अपने जीवन में उतार-चढ़ाव के दौर से गुज़रता है. संघर्ष करता है. जीवन की धारा को आगे बढ़ाने के लिये हर कोशिश में लगा रहता है. हमारे इस समाज में अक्सर ऐसी घटनाएं पढ़ने और सुनने को मिल जाती हैं जहां लोग ज़िन्दगी में संघर्ष के आगे अपना जीवन हार जाते हैं. कुछ लोग जीवन के एक पड़ाव पर आकर संघर्ष करते हैं और कुछ लोग जन्म लेने के बाद से ही जीने के लिय संघर्ष करना शुरू कर देते हैं.

कुछ लोगों के संघर्ष की कहानियां ऐसी होती हैं जो समाज के लिये एक बेहतरीन आईने का काम करती हैं और लोगों को हर हालात से लड़ने और जीने का हौसला देती हैं. ऐसी ही एक कहानी है दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे जितेंद्र सुना की। जितेंद्र अब जेएनयू छात्र संघ चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने जा रहे हैं.

पिता मजदूर, माली हालत के चलते अनुदान में मिली ज़मीन रखी गिरवी –
ओडिशा के कालाहांडी ज़िले के पौरकेला गांव में जन्में जितेंद्र सुना बचपन से ही शारीरिक श्रम से अच्छी तरह से अवगत थे. जितेंद्र की मां सब्ज़ी बेचा करती थीं और पिता मज़दूरी और किसानी किया करते थे. 1960 के भूमि सुधार अधिवेशन के समय जितेंद्र के परिवार को एक एकड़ ज़मीन दी गई थी जिसका कुछ हिस्सा अब गिरवी है.

दूसरों के खेतों में मजदूरी पर 30-40 रुपये की दिहाड़ी, मनरेगा में भी की मजदूरी –
इंडियन एक्सप्रेस को दिए साक्षात्कार में जितेंद्र बताते हैं कि, “मेरी मां की मृत्यु तब हुई जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था. हम 6 भाई-बहन हैं. ख़राब होती आर्थिक स्थिति के चलते मैंने दूसरों के खेतों में बुवाई करना शुरू कर दिया. रोज़ाना बुवाई करने पर मुझे प्रति-दिन के हिसाब से लगभत 30-40 रूपये मिला करते थे. मनरेगा से जुड़कर मैने सड़कों और तालाबों को भी खोदना शुरू कर दिया था. मनरेगा में काम करने पर मुझे रोज़ाना 100-150 रूपये मिला करते थे”.

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मजदूरी करने के बावजूद नहीं छोड़ी पढ़ाई –
जितेंद्र जब एक मज़दूर के रूप में काम कर रहे थे तब भी उन्होंने स्कूल जाना बंद नहीं किया और स्कूल की पढ़ाई पूरी की. स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो कमाने के लिए दिल्ली आ गए. जितेंद्र को अपना घर बनाने के लिय भी पैसा जमा करना था. जितेंद्र के भाई IGL में काम करते थे .जितेंद्र ने भी अपने भाई के साथ काम शुरू कर दिया. 2009 में जितेंद्र ने दिल्ली के इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (IGL) में एक सहायक के रूप में काम किया, गैस पाइपलाइनों को फिट करने, स्टोव को ठीक करने और सड़कों को खोदने तक का काम किया.

जातिगत भेदभाव ने बना दिया अंदर से मजबूत –
जितेंद्र अब अपनी जाति की पहचान को लेकर सबकुछ जान चुके थे. उन्होंने बताया, “मैंने बचपन से ही देखा था कि कैसे हमारे साथ अलग तरह से व्यवहार किया जाता था, अलग-अलग बैठकर भोजन करना, अलग बस्ती में रहना. मेरे भाई से लोग बार-बार उसका उपनाम पूछते थे लेकिन वो किसी को जवाब नहीं देता था और इन सब चिज़ों लेकर वो भी अंदर से बहुत मज़बूत हो चुका था”.

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3500 रूपये की नौकरी छोड़ वापस घर लौटे और पूरा किया ग्रेजुएशन –
3500 रूपये प्रतिमाह में जितेंद्र सुना ना तो पैसे घर भेज पा रहे थे ना उनका गुज़ारा हो पा रहा था. जितेंद्र ने स्नातक की शिक्षा पूरी करने का फैसला किया और वे घर वापस आ गए. जितेंद्र के जीवन में एक बड़ा मोड़ उनके स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद आया जब एक दोस्त ने उन्हें नागपुर के एक संस्थान के बारे में बताया जो मुफ्त यूपीएससी कोचिंग दे रहा था.

अंबेडकरवाद और बौद्ध धर्म में 10 महीने का कोर्स –
जितेंद्र आगे बताते हैं, “जब मैं नागपुर पहुंचा, तो मुझे लगा कि यह अंबेडकरवाद और बौद्ध धर्म में 10 महीने का कोर्स है. मैंने वहां जाति और अस्पृश्यता की समझ विकसित की और इसलिए मैंने इतिहास का अध्ययन करने और हमारे (दलित) इतिहास को लिखने का फैसला किया.

अम्बेडकर और सीमांत’ के इतिहास पर कर रहे हैंं पीएचडी –
इसके बाद जितेंद्र ने अपने इंटरव्यू में कहा, संस्थान में पढ़ते समय मैंने एचसीयू और जेएनयू के छात्रों से मुलाकात की और जेएनयू से एमए करने के लिय प्रवेश परीक्षा देने का फैसला किया. 2013 में विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, और सामाजिक अध्ययन और समावेशी नीति के अध्ययन के लिए केंद्र से इतिहास में एमए और एमफिल किया. वर्तमान में जितेंद्र एक पीएचडी छात्र के रूप में नामांकित हैं और पहचान और बहिष्करण, अम्बेडकर और सीमांत’ के इतिहास पर अपनी पीएचडी लिख रहे हैं.

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BAPSA के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं जितेंद्र –
जितेंद्र ‘BAPSA’ के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. जितेंद्र कहते हैं, “हम देख रहे हैं कि आरएसएस और बीजेपी लोकतांत्रिक संस्थानों को कैसे नष्ट कर रही है. लेफ्ट के नेतृत्व वाला जेएनयूएसयू BAPSA को खड़ा करने में विफल रहा है. जितेंद्र कहते हैं कि उनका एजेंडा जेएनयू में ड्रॉपआउट दर और छात्रों को उनकी फ़ेलोशिप सुनिश्चित करना है.

किसी प्रेरणा से कम नहीं है जितेंद्र सुना की कहानी –
बतौर मजदूर आर्थिक तंगी से जुझ रहे जितेंद्र सुना जातिगत भेदभाव के चलते समाज से लड़ने के बजाए अगर अपने संघर्ष को ख़त्म कर देते तो क्या आज वे इस मुक़ाम पर पहुंच अन्य लोगों की आवाज़ बन पाते हैं। जितेंद्र सुना जैसे छात्रों के संघर्ष की कहानी उन लोगों के लिये किसी प्रेरणा से कम नहीं है जो जातिगत आधार के चलते शारीरिक और मानसिक दबाव को झेल नहीं पाते और अपने जीवन का अंत कर लेते हैं.