Prime Minister Narendra Modi Jawaharlal Nehru

नेहरू तुम बहुत याद आते हो; हम भुला नहीं पाए, बस बदनाम कर दिया

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जब पंडित जवाहरलाल नेहरू का उदय भारतीय राजनीति में हुआ, तब तक गांधी भारत सहित दुनिया भर में अपनी अमिट छाप छोड़ चुके थे। गांधी का प्रभाव भारतीय समाज पर तो था ही लेकिन अंग्रेजों ने भी गांधी की बात सुननी प्रारंभ कर दी थी। ऐसे में उनसे 20 वर्ष छोटा, विदेश में पढ़ा-लिखा और विलायती सभ्यता से प्रभावित युवक (नेहरू) हमेशा गांधी के साथ तर्क-वितर्क करता रहा। चाहे वह आजादी के मसले पर हो, या विदेश नीतियों पर, या फिर आर्थिक मामला ही क्यों न रहा हो..? उस युवक ने कभी भी गांधी की हां में हां नहीं मिलाई।

खुलकर बोला, और जब तक वह प्रस्तावित विषय के तर्कों से संतुष्ट नहीं हुआ। तब तक वह अपनी बात पर ही अडिग रहा। चाहे वह बात नेहरू के सर्वस्य गांधी ने कही हो या उनके साथी पटेल-बोस कही हो; चाहे प्रतिष्ठित वकील, प्रभावशाली नेता और नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू ही क्यों न कही हो…? नेहरू को जहां जिनकी बातें उचित नहीं लगी, उन्होंने खुलकर असहमति व्यक्त की। जब वह किसी के विचारों से असहमत हुए तो उन्होंने अपने पिता से लेकर गुरू गांधी तक का विरोध किया।

जिसका एक बड़ा उदाहरण कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन था। जब वह अपने दोस्त सुभाषचन्द्र बोस के लिए अपने पिता सीनियर नेहरू से भिड़ गए थे और गांधी के मसोदे को नामंजूर किया था। उन्हीं सुभाष को आज के दौर में ऐसे प्रस्तुत किया जाता है कि वह न सिर्फ नेहरू के प्रतिद्वंद्वी थे, बल्कि दुश्मन थे। बात साल 1928 की है, जब कांग्रेस के अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे। देश का विधायी कामकाज(संविधान निर्माण) मोतीलाल नेहरू कर रहे थे। उस ऐतिहासिक काम को ‘नेहरू रिपोर्ट’ के नाम से जाना जाता है।

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इस रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया जाना था, यह वही रिपोर्ट थी जिसमें ब्रिटिश ताज के मातहत भारत को किस तरह से सीमित आजादी दी जाए और उसमें भारत कैसे काम करे। इसे आसान भाषा में कहे तो यह रिपोर्ट ‘डोमिनियन स्टेटस’ की वकालात करती थी। पर जैसे ही बोस ने इस रिपोर्ट पर कड़े रुख में सख्त ऐतराज जाहिर किया, तो उन्हें पहला साथ मिला जवाहलाल नेहरू का। इन दोनों नेताओं ने इस विषय पर अपनी बात रखी और काफी जद्दोजहद के बाद मद्रास अधिवेशन में यह रिपोर्ट रद्द हुई।

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यहीं से हमें संपूर्ण आजादी का सपना मिला
1947 में विश्व इतिहास के पटल पर दो देश बने थे, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान। दोनों ने लोकतंत्र को चुना था। पर आप खुद ही देख लीजिए कि पाकिस्तान आज हर पैमाने में कहां है औऱ हिन्दुस्तान कहां पहुंच गया है। इसके पीछे नेहरू का अहम योगदान है। यह नेहरू की ही देन है कि हम लोकतंत्र के इतने पास आए है। पर संकट कम नहीं हुआ है।

हम वही सब कर रहें है, जो इस देश को कमजोर बनाने के लिए पर्याप्त हैं, जिसकी नेहरू ने ताउम्र नसीहत दी। चाहे सांप्रदायिकता का मुद्दा हो, या फिर संविधान को मजबूत करने वाली संस्थाएं ही क्यों न हो, सभी सवालों के घेरे में हैं। पर कभी ‘आप’ और ‘नेहरू विरोधी’ सोचिए कि जब बिखरे हुए देश की बाग-डोर नेहरू के हाथों में सौंपी गई होगी, तो नेहरू के सामने क्या लक्ष्य रहे होगें और वह व्यक्ति किस प्रकार से सोच रहा होगा। राजनीतिक दलों ने नेहरू की काफी आलोचना उनके जीते-जी की। पर उन्होंने कभी किसीकों जेल नहीं भेजा और न ही जांचे बिठाईं।

यह नेहरू की सफलता ही है कि नेहरू की बुराई करते-करते लोग प्रधानमंत्री बन गए पर दिल में चाहत नेहरू बनने की ही है। यदि ऐसा नहीं होता तो विदेश मंत्री के रहते हुए भी खुद दुनिया नहीं घूम रहे होते। उठने-बैठने से लेकर पहनावे तक में नेहरू की कॉपी नहीं कर रहे होते। तत्कालीन प्रधानमंत्री हर एक मौके पर नेहरू की आलोचना करते हैं, जिसका स्वरूप बुराई जैसा होता है। पर असल में वह नेहरु ही तो बनना चाहते हैं। जब नेहरू लाल किले की प्राचीर से अपने आपको प्रधानमंत्री की जगह ‘प्रथम सेवक’ बताते हैं, तो आज के मुखिया अपने आपको ‘प्रधानसेवक’ कहते हैं।

नेहरू वैज्ञानिकों से हमेशा मिलते-जुलते रहा करते थे। वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन और होमी जांगीर भाभा जैसे कई लोगों से व्यक्तिगत और औपचारिक संबंध हुआ करते थे। शायद यही वजह है कि आप ‘चंद्रायान-2’ के समय इसरो पहुच गए थे। ऐसे कई बातें गिनाई जा सकती हैं। और-तो-और ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ का ऑडियो वर्जन है ‘मन की बात’ लेकिन इतने बस से नेहरू नहीं बना जा सकता है। इसके लिए विपक्षियों को दुश्मन मानने वाली प्रवृत्ति को छोड़ना पड़ेगा। सीखना पड़ेगा कि नेहरू लोहिया, जेपी, अंबेडकर, मुखर्जी और शेख अब्दुल्ला से किस प्रकार के संबंध रखा करते थे। और वह किस प्रकार से अपने फैसले पर पुनः विचार किया करते थे।

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नेहरू की आप चाहे जितनी बुराई कर लीजिए या करवा दीजिए, नेहरू इतनी आसानी से लोगों की स्मृतियों से नहीं जाने वाला है क्योंकि भारत की आत्मा ही नेहरू की आत्मा है। ऐसे ही नहीं भगत सिंह ने पंजाब के लोगों से गुजारिश की थी कि वह नेहरू और सुभाष में से नेहरू को तरजीह दें। और कुछ बात तो रही होगी तभी गांधी ने कहा था-‘वह निःसंदेह एक चरमपंथी हैं, जो अपने वक्त से कहीं आगे की सोचते हैं। लेकिन वह इतने विनम्र और व्यावहारिक हैं कि रफ्तार को इतना तेज नहीं करतेकि चीजें टूट जाएं। वह स्फटिक की तरह शुद्ध हैं। उनकी सत्यनिष्ठा संदेह से परे है। वह एक ऐसे योद्धा हैं, जो भय और निंदा से परे हैं। राष्ट्र उनके हाथों में सुरक्षित है।’ यदि इतने लोग नेहरू से प्रभावित थे तो इसका कारण इनका जीवन और सोच थी।

लेखक शिवाषीश तिवारी

(यह लेख शिवाषीश तिवारी ने लिखा है। यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक शिवाषीश तिवारी को “सेंटर फॉर फाइनेंस अकाउंटेबिलिटी, नई दिल्ली” द्वारा ‘स्मृतु कोठरी फेलोशिप’ प्रदान की गई है। लेखक भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं एवं वर्तमान में मध्यप्रदेश सर्वोदय मंडल के कार्यलय सचिव होने के साथ-साथ लेखक और पत्रकार भी हैं। गांधीवादी शिवाषीश मूलतः सामाजिक सरोकार से जुड़े हुए मुद्दों पर समय-समय पर अपने विचार प्रकट करते रहते हैं।)

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