जौन एलिया : यूपी के अमरोहा में जनमा वो दरवेश, जो नीत्शे और कांट से बातें करता था

जौन एलिया
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उर्दू अदब के गुलशन में यूं तो बहुत से फूलों ने अपनी जादुई ख़ुशबू से सबको सराबोर किया है। मगर इसी गुलशन में एक फूल ऐसा भी गुज़रा है जिसकी जादुई शायरी आज भी लोगों को शेर के एक-एक अल्फ़ाज़ों में डूबा देती है। जिसकी शायरी आज भी अपनी ख़ुशबू से मोयत्तर कर रही है उस मक़बूल शायर को जौन एलिया कहते हैं।

जौन यूपी के अमरोहा में पैदा हुए। पिता अल्लामा शफीक हसन एलिया जाने-माने विद्वान और शायर थे। 14 दिसंबर 1931 को जन्मे जॉन एलिया 8 नवंबर, 2002 में इंतकाल। बंटवारे के 10 साल बाद न चाहते हुए जौन पाकिस्तान के कराची जा बसे।

आज भी हिंदुस्तान और पाकिस्तान में जान और जान की शायरी के बेशुमार शैदाई मौजूद हैं। उनकों सुनने,पढ़ने वाले और उनकी शायरी को चाहने वाले जान की शायरी को किसी आसमानी सहीफ़े कम नहीं मानते। शायरी में ये मर्तबा और मक़ाम शायद ही किसी और शायर को मिलो हो।

अजमल सिद्दीक़ी  ने जान साहब पर क्या ख़ूब लिखा। अलमल कहते हैं, “जौन एलिया ने कभी कोशिश भी नहीं की समाज की उस रस्म को निभाने की, जिसमें अपने ज़ख़्मों को छुपाया जाता है, उनकी सर-ए-आम नुमाइश नहीं की जाती। रोया तो बीच महफ़िल रो दिया। मातम किया तो ठहाकों के शोर में मातम की सदा गूंजी, ख़ून थूका तो इस मुहज़्ज़ब मआशरे के सफ़ेद उजले कपड़ों पर थूका, और ये सब ऐलानिया किया।

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सुख़न की शमअ’ को जौन की ज़िन्दगी की शक्ल में इज़हार का वो आइना-ख़ाना नसीब हुआ जिसकी मिसाल दूर तक नज़र नहीं आती, हर शेर उनकी ज़िन्दगी और ज़िन्दगी के कर्ब का ऐसा अक्कास और तर्जुमान बना कि ऐसा महसूस होता है जैसे किसी अफ़्साने के अलग अलग बाब आपके सामने पेश किये जा रहे हों।“

वो ज़बान ओ कलाम का आख़री पैग़म्बर जो अबू इताहिया से मुराक़बा करता था , जो नीत्शे और कांट से बातें करता था, जिसकी बकवास एक अक़ानीमी बदायत थी, जो सिर्र-ए-तूर था, जो ऐसा कलीम था जिसमें हारुन और मूसा यकजा थे, जो बुद्ध को जानता था, जो अफ़लातून का यार था, जो फ़िरदौसी का दोस्त भी था और उसका नक़्क़ाद भी, जो शेक्सपियर का महरम-ए-राज़ था ।

कहीं “सफ़र के वक़्त” नज़्म में वो अपनी याद के सफ़र में अपने क़ारी को शामिल-ए-हाल कर लेता है, कहीं वो “शायद” के दीबाचे में अपने बाप को जब ये कहता है कि “बाबा मैं बड़ा न हो सका” तो उसका क़ारी भी उसके साथ उस एहसास-ए-नदामत से भर जाता है जो जौन की शख़्सियत का एक अहम उन्सुर बना।

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समाज के परवरदा झूठ, फ़र्ज़ी शर्म-ओ-हया, नक़ली तहज़ीब को अपने जूते की नोक पर रखने वाला वो दरवेश जिसने कभी कोई लॉबी न बनाई न किसी धड़े में शामिल हुआ, आज ख़ुद एक मज़हब बन गया है।

उसी दौर के एक मायानाज़ और मक़बूल शायर पीरज़ादा क़ासिम ने जान की ज़िन्दगी के दर्द को बख़ूबी समझा और एक दिन मंज़र-ए-आम पर जान साहब की ज़िन्दगी पर एक ग़जल कह डाली। पीरज़ादा ने ये ग़जल एक मुशायरे में जॉन की मौजूदगी में पढ़कर जान साहब को चौंका दिया था।

ग़म से बहल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

दर्द में ढल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

साया-ए-वस्ल कब से है आप का मुंतज़िर मगर

हिज्र में जल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

अपने ख़िलाफ़ फ़ैसला ख़ुद ही लिखा है आप ने

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हाथ भी मल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

वक़्त ने आरज़ू की लौ देर हुई बुझा भी दी

अब भी पिघल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

दायरा-वार ही तो हैं इश्क़ के रास्ते तमाम

राह बदल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

अपनी तलाश का सफ़र ख़त्म भी कीजिए कभी

ख़्वाब में चल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

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