जबलपुर मेडिकल कॉलेज: इंटर्न डॉक्टर्स को मास्क तक नहीं हो रहे उपलब्ध

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देश में कोरोना मामलों की संख्या 20 लाख पार कर चुकी है लेकिन किसी के माथे पर शिकन मात्र नहीं है। हमारे डॉक्टर्स यह लड़ाई फ्रंट लाइन पर आकर लड़ रहे हैं। अपनी जान दांव पर लगाकर, अपने परिवारों से दूर रहकर स्वास्थ्यकर्मी इस महामारी से लड़ रहे हैं। लेकिन हमारी सरकार उन्हें मास्क तक उपलब्ध करवाने की ज़हमत नहीं उठा रही है। शुरुवाती दौर में हेलीकॉप्टर से फूल बरसाकर डॉक्टर्स को कोरोना योद्धा तो बना दिया लेकिन उस योद्धा को बिना हथियार ही जंग के मैदान में उतरने को मजबूर कर दिया है।

ताज़ा मामला मध्य प्रदेश के जबलपुर में बने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस मेडिकल कॉलेज का है। जहां कोरोना काल में अपना जीवन दांव पर लगा कर कोरोना संकट से लड़ रहे इन्टर्न डाक्टर्स को सरकार भी किसी तरह की मदद करती नहीं दिखाई दे रही है।

इन इन्टर्न डाक्टर्स को खुद की सुरक्षा के लिए दिए जाने वाले मास्क, ग्लव्स, किट प्रशासन द्वारा नहीं दिए जा रहे है। इसके साथ ही विगत 4 महीनों से इंटर्न्स को स्टाइपेंड नहीं दी जा रही है जो कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में वैसे ही सबसे कम है। मुख्यमंत्री द्वारा घोषित किये गए प्रोत्साहन राशि की भी अनदेखी की जा रही है। एक डॉक्टर ने नाम न बताने की शर्त पर ग्राउंड रिपोर्ट को बताया को वे पिछले एक महीने से एक ही मास्क का इस्तेमाल कर रहे हैं। मास्क मांगने पर कहा जाता है कि इंटर्न डॉक्टर को मास्क नहीं दिया जाएगा। किल कोरोना मुहिम के ज़रिए मध्यप्रदेश सरकार ने घर घर जाकर लोगों का टेस्ट करने की तो ठान ली लेकिन जो डॉक्टर्स इसके तहत अपनी सेवा दे रहे हैं उन्हें प्रशासन वाहन तक उपलब्ध नहीं करवा रहा है। उन्हें खुद के साधन से यह काम करना पड़ रहा है।

जबलपुर स्थित मेडिकल कॉलेज में इंटर्न डॉक्टर्स से भेदभाव की घटना शर्मसार करने वाली है। इंटर्न डॉक्टर्स यहां तन मन से अपनी सेवा दे रहे हैं। लेकिन अस्पताल प्रशासन का रवैया इन डॉक्टर्स के प्रति ठीक नहीं है। जब इंटर्न डॉक्टर मास्क की मांग करते हैं तो उनसे कहा जाता है कि से मास्क मास्क सिर्फ डॉक्टर के लिए है, इन्टर्नस के लिए नही। यह घटना हमारी सरकार द्वारा किये जा रहे है दावों की पोल खोलती नज़र आती है।

इंटर्न डॉक्टर्स ने अपनी तमाम मांगे प्रशासन के सामने रखने का प्रयास किया लेकिन उनकी बात सुनने से इनकार कर दिया गया। डॉक्टर्स को कोविड में डयूटी करने के बावजूद 7 दिवस का क्वारंटाइन नही दिया जा रहा है। 2 इंटर्न छात्राएं कोविड पॉजिटिव पायी गयी इसके बावजूद बाकियों को काम करने के लिए विवश किया जा रहा है जबकि उनकी रिपोर्ट अभी नही आई है।

डीन को इसके बारे में सूचित करने पर कोई भी कार्यवाही नही की जा रही है। माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पर लेकर आदेश जारी किया जा चुका है। इन सब अंदेखियों के कारण इंटर्न छात्र छात्राओं ने काम करने से मना कर दिया है जब तक इन सब चीजों पर विचार नही किया जाएगा।

कोरोना वायरस ने भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता की असलियत सामने रख दी है। भारत में कोरोना वायरस के मामले दिन- प्रतिदिन बढ़ते जा रहे है। पिछले दो दिनों से भारत में अमेरिका से भी ज्यादा कोरोना मामले सामने आए है। इसी बीच देश के कई अस्पतालों में बेड, पीपीई और डॉक्टरों की कमी से संबंधित कई खबरें सामने आ चुकी है। वहीं, भारत अपनी जीडीपी का केवल 1.28 प्रतिशत ही स्वास्थ्य पर खर्च करता है।

नेशनल हेल्थप्रोफाइल प्रोफाइल -(NHP) 2019 के जारी किए गए आकड़ों के मुताबिक, भारत ने सार्वजनिक रुप से अपने सकल घरेलू उत्पाद (2017-18) का केवल 1.28 फीसदी ही स्वास्थ्य पर खर्च किया है, यानी प्रति व्यक्ति पर स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च मात्र 1,657 रुपये ही हुआ है।

वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन– (WHO) के अनुसार, भारत में 1,000 लोगों के इलाज के लिए एक डॉक्टर उपलब्ध है, और 11,500 से अधिक लोगों के लिए एक सरकारी डॉक्टर मौजूद है। इसके अलावा, शहरी और ग्रामीण इलाकों की स्वास्थ्य सेवाओं में भारी अंतर है।

नेशनल हेल्‍थ प्रोफाइल– (NHP) के आकड़ों के अनुसार, दक्षिण पूर्व एशिया के 10 देशों में से भारत केवल बांग्लादेश से ही आगे है। स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भारत अपने पड़ोसी देशों, जैसे श्रीलंका, म्यांमार, इंडोनेशिया और नेपाल से भी कम खर्च करता है। तो विकसित देशों जैसे अमेरिका, जापान और फ्रांस की स्वास्थ्य सेवाओं के समाने भारत की स्वास्थ्य सेवा शून्य के सामान है।

ऐसे में सवाल खड़ा होता है जब देश को सबसे अधिक स्वास्थ सेवाओं की आवश्यकता है। डॉक्टर्स एक सैनिक की तरह कोरोना से जंग लड़ रहे हैं और सरकार ने अपने सैनिकों को बिन हथियार शहीद होने को छोड़ दिया है। क्या संकट की घड़ी में ऐसा व्यवहार उचित है?

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