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अभिव्यक्ति की आज़ादी पर मंड़राते ख़तरे को पहचानना ज़रूरी…!

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बीते अक्तूबर में बांग्लादेश में कई स्थानों पर दुर्गा पूजा पंडाल और मंदिरों में तोड़फोड़ हुई थी। जिसकी चर्चा दुनिया भर में हुई और वहां के कई वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुए। बांग्लादेश सरकार ने इस घटना पर संज्ञान लेते हुए कार्यवाही तो शुरु कर दी लेकिन इसका खामियाजा देश के उत्तर पूर्वी राज्य त्रिपुरा को भुगतना पड़ा। बीजेपी और संघ से जुड़े हिंदूवादी दलों ने मुस्लिम लोगो के घर, दुकान सहित उनकी मस्जिदों पर हमला किया।

हिंसा का ये तांडव पूरे राज्य में कई दिनों तक होता रहा और राज्य का पुलिस प्रशासन इस दौरान मूक दर्शक बना दिखा। इस घटना के बाद देश के कई सामाजिक व राजनैतिक संगठनों व उससे जुड़े लोगों ने इसकी कड़ी आलोचना की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर पर इस हिंसा के विरोध में #TripuraIsBurning #MuslimLivesMatter जैसे हैशटैग चले और मानवाधिकार कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता व देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने सोशल मीडिया पर गुस्सा ज़ाहिर किया। और इसके बाद त्रिपुरा पुलिस का एक नया खेल शुरु हो गया।

पुलिस ने बड़ी संख्या में सोशल मीडिया यूज़र्स पर यूएपीए क़ानून के तहत मामला दर्ज कर दिया और आरोप लगाया कि इन लोगों ने कथित तौर पर ‘फ़र्जी फोटो और जानकारियां ऑनलाइन अपलोड कीं जिनके कारण सांप्रदायिक तनाव बढ़ने का ख़तरा था। जो पुलिस हिंसा के समय मूक दर्शक बनी थी उसी पुलिस ने कड़ी कार्रवाई करते हुए ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब को नोटिस भेज दिया कि वह इस तरह की खबरें पोस्ट करने या शेयर करने वालें अकाउंट्स की जानकारी पुलिस को दें। जिन लोगों पर यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज हुआ उनमें वह वकील भी शामिल हैं जो त्रिपुरा हिंसा की जांच के लिए बनी फैक्ट फाइंडिंग टीम का हिस्सा थे। पत्रकार श्याम मीणा को यूएपीए के तहत नोटिस केवल इस लिए भेज दिया गया क्योंकि उन्होंने ट्विटर पर लिख दिया था TripuraIsBurning।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत भारत के सभी नागरिकों को विचार करने, भाषण देने और अपने व अन्य व्यक्तियों के विचारों के प्रचार की स्वतंत्रता प्राप्त है।

त्रिपूरा के इस पूरे प्रकरण से जो मुख्य प्रश्न उठता है वह यह कि क्या देश में अभिवक्यक्ति की स्वतंत्रता का जो अधिकार प्रत्येक भारतीय नागरिक को मिला था वह वास्तव में बचा भी है या समाप्त हो चुका है? क्योंकि यह कोई पहला मामला नहीं है जहां यूएपीए अर्थात गैर कानूनी अधिनियम का सत्ता पक्ष द्वारा अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए दुरुपयोग किया गया हो। ठीक इसी प्रकार पिछले वर्ष पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के बाद आसिफ इकबाल, मीरान हैदर, उमर खालिद समेत दर्जनों लोगों को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया था जिसमें से अभी भी आधे से अधिक लोगों की ज़मानत नहीं हो सकी है। उमर खालिद को दिल्ली हिंसा केस में ज़मानत मिल जाने के बाद भी यूएपीए के तहत जेल में ही रहना पड़ रहा है। इसी प्रकार जनता की वाक्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने और राजनीतिक हथकंडे के रुप में उत्तर प्रदेश में रासुका का दुरुपयोग करने का लंबा इतिहास मौजूद है। लेकिन हाल के दिनों में पूर्वोत्तर राज्य में इस तरह के मामले तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं।

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इसी साल मई में एक समूह ने त्रिपुरा के ही वरिष्ठ पत्रकार समीर धर के आवास को देर रात निशाना बनाया था। असेंबली ऑफ़ जॉर्नलिस्ट नामक संगठन के उपाध्यक्ष समीर धर के घर पर 2018 के बाद तीन बार ऐसे हमले हो चुके हैं। उन्हें बार-बार धमकियां भी मिली हैं।

मीडिया अधिकारों के संरक्षण के लिए काम करनेवाली असेंबली ऑफ़ जर्नलिस्ट्स ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब द्वारा जारी एक कथित धमकी के बाद पिछले छह महीनों में राज्य में कम से कम 23 पत्रकारों पर हमले हो चुके हैं। आरोप है कि मुख्यमंत्री देब ने कहा था कि कोरोनो वायरस संकट के कथित कुप्रबंधन की कहानियों को प्रकाशित करने के लिए मीडिया के एक वर्ग को माफ़ नहीं करेंगे।

त्रिपुरा में भाजपा प्रवक्ता नबेंदु भट्टाचार्य ने तो एक बार मीडिया के समक्ष यह तक कह दिया था कि पत्रकारों पर हमले की घटनाओं को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उनके राज्य में पत्रकारों पर हमले वाम मोर्चा शासन के दौरान बहुत अधिक हुए थे।

मणिपुर जैसे छोटे राज्य में बीते दो सालों में पत्रकारों पर राजद्रोह लगाने के कई मामले सामने आ चुके हैं। साल 2018 में स्थानीय पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम पर मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह पर कथित अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगा दिया गया था जिसके बाद उन्हें साढ़े चार महीने जेल में रहना पड़ा।

जनवरी 2021 में एक अन्य मामले में न्यूज़ पोर्टल ‘द फ्रंटियर मणिपुर’ के दो संपादकों को ’24 घंटे से अधिक’ समय तक पुलिस हिरासत में रखा गया। रिहाई तब हो पाई जब दोनों ने लिखित आश्वासन दिया कि वे ऐसी ग़लती दोबारा नहीं करेंगे। मई में मणिपुर सरकार ने इम्फ़ाल स्थित पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम और राजनीतिक कार्यकर्ता एरेन्ड्रो लेचोम्बाम को उनकी एक फ़ेसबुक पोस्ट के लिए गिरफ़्तार किया और दोनों पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगाया गया था।

किसी भी लोकतांत्रिक देश का अस्तित्व उस देश के नागरिक की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर टिका होता है। अमेरिकी सरकार के एक एनजीओ फ्रीडम हाउस और स्वीडन के वी-डेम इंस्टीट्यूट ने अपनी अपनी रिपोर्ट में भारतीय लोकतंत्र की पड़ताल करते हुए यह चिंता व्यक्त की थी कि भारत में अब लोकतंत्र कमज़ोर हो चुका है।

वी-डेम की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से चुनावी तानाशाह वाले देश में बदल गया है। रिपोर्ट में भारत को हंगरी और तुर्की के साथ रखा गया है और कहा गया है कि देश में लोकतंत्र के कई पहलुओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। रिपोर्ट कहती है, “सेंशरशिप के मामले में भारत पाकिस्तान के जैसा तानाशाह देश हो गया है और उसकी स्थिति पड़ोसी देशों बांग्लादेश और नेपाल से भी बदतर हो गयी है।” विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2021 में भारत 180 देशों में 142वें स्थान पर है और यकीनन पत्रकारों के लिए पृथ्वी पर सबसे खतरनाक स्थानों में से एक है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की कुंजी है। बोलने की आज़ादी और पत्रकारों को अपना काम करने व सच्चाई के साथ रिपोर्ट करने के लिए बंद करके एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की नींव को खोखला कर देते हैं। उत्तर प्रदेश की हाल किसी से छुपी नहीं है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार वाले बीजेपी शासित राज्य उत्तर प्रदेश ने इस प्रक्रिया को एक तरह की मानक संचालन प्रक्रिया में बदल दिया है।

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जब कोई राज्य या सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाती है तो वह अनजाने में प्रगतिशीलता को सीमित कर रही होती है और यह तो हर कोई भलि भांति जानता है कि किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए वहां के नागरिकों का प्रगतिशील होना कितना आवश्यक होता है। समाजशास्त्री मानते हैं कि समाज के विकास का आधार उस समाज में मौजूद नए विचारों की प्रवृत्ति पर होता है। नए विचार जिज्ञासाओं को जन्म देते हैं और जिज्ञासा व्यक्ति व समाज को प्रगति की ओर ले जाती है। लेकिन जब हम उस प्रगतिशीलता के पहले की चरण पर प्रतिबंध लगाकर समाज में डर का माहौल बना देते हैं तो सामाजिक विकास को चरम तक पहुंचाने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं और भय और नफरत के वातावरण के परिणामस्वरुप कुंठित मानसिकता जन्म लेने लगती है और समाज का नैतिक पतन शुरु हो जाता है।

हमारे देश का लोकतांत्रिक ढांचा तो पहले ही तानाशाही में तब्दील होने लगा था अब इस कुंठित मानसिकता के परिणाम भी समाज पर दिखाई देने शुरु हो गए हैं। नफरत समाज में इतनी बढ़ गई है कि हर कोई दूसरे को शक की निगाह से देखता है। गंगा जमुनी तहज़ीब इस नफरत की आंधी में लगभग बह चुकी है। इसलिए अगर सभ्य समाज और देश में लोकतंत्र के अस्तित्व को बरकरार रखा जा सकता है तो उसके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बेहद ज़रुरी है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुने जाने के अधिकार के लिए जिन लोगों को उसके पक्ष में खड़े होना चाहिए उनमें विपक्षी नेता, बुद्धीजवी वर्ग, वकील व पत्रकार होते हैं जो देश के भविष्य की दिशा और दशा तय करते हैं। लेकिन विंडबना यह है कि विपक्षी दल अपने हित से आगे की सोचते नहीं है। हालांकि राहुल गांधी ने त्रिपुरा केस की निंदा करते हुए एक ट्वीट किया था लेकिन वह केवल एक ट्वीट तक ही सीमित रहा। किसी अन्य विपक्षी नेता ने तो उतना भी करने की ज़रुरत नहीं दिखाई। रहा बुद्जीवी वर्ग, वकील व पत्रकार तो सरकार उन्हें डरा धमका कर चुप करा देती है। ना डरने वालों के लिए सरकार के पास यूएपीए, रासुका, एनडीपीएस, पीएएसए जैसे कानूनी हथियार मौजूद हैं जिनके ज़रिए सालों तक ज़मानत के लिए जेल की सलाखों के पीछे से लंबा इंतज़ार करना पड़ता है।

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