Sun. Sep 22nd, 2019

विवाद = इस्मत चुग़ताई

न्यूज़ डेस्क।। उनका लेखन मानो जलता हुआ लावा था। उनका हर एक शब्द पुरुष प्रधान समाज को कील की तरह चुभता था। उनकी लिखी कहानी भारत की दबी कुचली महिलाओं की आवाज़ थी। 20वी सदी की एक साहसी उर्दू साहित्यकार इस्मत चुगताई ने महिलाओं की आशाओं, अकांक्षाओं और ज़रूरतों को अपनी स्याही से आवाज़ दी। उनकी लिखी कहानियों ने जब महिलाओं की यौन इक्षाओं को रेखांकित किया तो विवादों की बाढ़ आ गई। उनकी लिखी ‘लिहाफ’ और अन्य कहानियों पर प्रतिबंध लगाने के लिए मुकदमे दायर किये गए। पर इस्मत झुकी नहीं, हर मुकदमा जीता और आगे बढ़ती गई।

इस्मत चुगताई की एक लघु कथा ‘लिहाफ’ पर उस समय भारत में बहोत विवाद हुआ था। यह कहानी एक बेगम और उनकी दासी के बीच समलैंगिक संबंधों पर आधारित थी। एक औरत की यौन इक्षाओं को बेबाक़ ढंग से उकेरती यह कहानी संकुचित सोच वाले समाज के गले नहीं उतरी और इस्मत पर कई मुकदमे दायर किये गए। वैसे समाज आज भी हमारा उसी जगह खड़ा है। अगर आज इस्मत ज़िंदा होती तो सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी का सामना कर रही होती।

इस्मत चुगताई जब एक बार एक परिचित लेखक के घर गयी तो उनसे उस लेखक ने सवाल किया तुम इतना अभद्र कैसे लिख सकती हो? इस्मत ने बेबाकी से जवाब देते हुए कहा आपकी कहानी ‘गुनाह की रातें’ भी तो अश्लील है उसमें तो सेक्स की क्रिया को इतने विस्तार से लिखा गया है। लेखक महाशय ने जवाब दिया कि मेरी बात अलग है, मैं मर्द हूँ।

इस्मत ने जवाब दिया इसमें मेरी क्या गलती की मैं एक औरत हूँ। जिस तरह कुछ भी लिखने के लिए आपको किसी की इजाज़त की ज़रूरत नहीं वैसे ही मुझे भी आपकी इजाज़त लेने की आवश्यकता नहीं है।

लेखक ने कहा तुम एक मुस्लिम परिवार की पढ़ी लिखी लड़की हो तुम्हे यह शोभा नहीं देता। इस्मत ने जवाब दिया आप भी तो सभ्य मुस्लिम परिवार के पढ़े लिखे बेटे हैं। लेखक ने कहा क्या तुम अब मर्दों से मुकाबला करोगी?

इस पर इस्मत ने बहुत सुंदर जवाब दिया कहा कि मैं हमेशा लड़कों से आगे रही हूं। मैं वही लिखती हूँ जो मैं देखती हूँ। मैं अपनी कलम को रोक नहीं सकती। जब मेरे हाथ में कलम होती है तो उस पर केवल मेरे मस्तिष्क का अधिकार होता है। उस समय मेरी कलम और दिमाग के बीच कोई दखलंदाज़ी नहीं कर सकता। मेरा लेखन एक आम कैमरे की तरह है, जिसमे वही रिकॉर्ड होता है जो दिखाई देता है, जो सच होता है।

21 अगस्त 1915 में उत्तरप्रदेश के बदायूं में जन्मी इस्मत ने उर्दू साहित्य को नारीवादी नज़रिये से अलग मक़ाम पर पहुंचाया। उन्होंने मध्यम वर्गीय भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को आईना दिखाया। महिलाओं की यौन इक्षाओं के बारे में बेबाक़ी से लिखकर उन्होंने समाज में इस विषय को चर्चा के लिए सहज बनाया। इस्मत को 1976 में भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से नवाज़ा।

आज गूगल ने उनका डूडल बनाकर उनको याद किया है।

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