एक पुरानी याद – तार में अटकी पतंग लूटते समय जब इरफ़ान खान की टूट गई थी कलाई

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जयपुर में टायर की दुकान चलाने वाले इरफ़ान के पिता यासीन खान शिकार के शौक़ीन थे. बचपन से ही पतंगबाजी और क्रिकेट में दिलचस्पी रखने वाले इरफ़ान को कभी-कभी अपने अब्बू के साथ शिकार अभियानों में जाने का मौक़ा भी मिलता था. इरफ़ान को बंदूकें तो पसंद थीं लेकिन जानवर मारने का आइडिया नहीं जंचता था. उन्हें मांस खाना भी पसंद नहीं था. इस वजह से पिता अक्सर कहा करते थे कि इरफ़ान तो एक ब्राह्मण है जो गलती से पठानों के खानदान में पैदा हो गया.

माँ-बाप के बीच हमेशा एक तनाव बना रहता था. सईदा बेगम को न तो अपने पति का शिकार पसंद था न अपने बेटों को जंगल ले जाया जाना. इरफान ने एक इंटरव्यू में अनुपम खेर से कहा था – “वे एक मुलायम और दार्शनिक तबीयत की इंसान थीं. शिकारबाजी उन्हें कभी पसंद नहीं आई. उन दोनों की केमिस्ट्री कभी मैच नहीं कर सकी.”

एक दफा बिजली के तार में अटकी हुई पतंग लूटते समय इरफ़ान नीचे गिरे और उनकी बाईं कलाई और कोहनी टूट गईं. पिताजी शिकार पर गए हुए थे और घर पर किसी को नहीं पता था ऐसे में क्या किया जाय. एक मालिश करने वाला बुलाया गया जिसने खींच-खांच कर हड्डी बिठा तो दी मगर चोट को पूरी तरह ठीक होने में दो बरस लगे.

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पिता के अक्सर घर से बाहर रहने की वजह से उसके जीवन में परिवार की औरतों की बहुत मजबूत उपस्थिति रही- माँ, बहन, चाची, नानी वगैरह. सबसे बड़ी उपस्थिति उसकी माँ की थी लेकिन उस सम्बन्ध में हमेशा एक अजीब तरह की कसमसाहट बनी रही. वह भावनात्मक रूप से उनके नजदीक रहना चाहता था लेकिन न चाहते हुए भी उनके बीच अक्सर लडाइयां हो जाती थीं. इसके बावजूद वह किसी भी तरह अपनी अम्मी को खुश करना चाहता था. उसकी नानी ने अलबत्ता उसके भीतर के खोखल को भरने में बड़ी भूमिका निभाई.

नानी हकीम का काम जानती थीं. नन्हे इरफ़ान को उनकी ममताभरी गोद में बहुत सुकून आता था. ‘ओपन मैगजीन’ को दिए एक साक्षात्कार में उसने कहा था – “उनके हाथों से जड़ी-बूटियों की महक आती रहती थी जिनकी मदद से वे बीमारों का इलाज किया करती थीं. वे पॉजिटिविटी का प्रतिमान थीं. वे मुझे इतने लाड़ के साथ देखती थीं. वे बगैर कुछ कहे मुझे छू सकती थीं. मेरे लिए इतना ही बहुत था. मैं उनकी मोहब्बत के लालच से भरा रहता था.”

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सन 2006 में अमेरिका में मीरा नायर की फिल्म ‘द नेमसेक’ की शूटिंग चल रही थी. लोकेशन न्यू जर्सी के एक उपनगरीय इलाके के घर में थी. माहौल को प्रामाणिक बनाने की नीयत से प्रोडक्शन डिजाइन की टीम ने बेडरूम की दीवारों पर इरफ़ान और तब्बू के परिवारों के बहुत सारे असली फोटो टांग रखे थे. इन के सामने से गुजरते हुए इरफ़ान अचानक ठिठक कर रह गया. एक फोटो में वह और उसकी नानी थे. वह एक सर्रियल क्षण था. उसी इंटरव्यू में उसने अनुपम खेर को आगे बताया – “मैंने खुद से कहा देखो मेरी नानी पूरा रास्ता तय करके न्यू जर्सी तक आ पहुँची है. मैं रोने लगा.”

इरफ़ान को सेंट पॉल स्कूल भेजा गया. अम्मी चाहती थीं उनका बेटा लेक्चरर बने. पढ़ाई-लिखाई को ज्यादा महत्त्व ने देने वाले उसके पिता चाहते थे वह कोई पेशा सीख ले. एक दिन उसके चाचा ने उसे बताया कि उसके पिता को बाथरूम में कुछ हो गया है. उसके पैरों तले जमीन खिसक गयी और किसी डाक्टर को बुलाने के लिए उसने बदहवास भागना शुरू किया. जब वह डाक्टर के साथ घर पहुंचा सब कुछ समाप्त हो चुका था. इरफ़ान अठारह का था.

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