चाबहार रेल परियोजना से भारत के बाहर होने पर होगा ये बड़ा नुक़सान

चाबहार रेल परियोजना से बाहर होने के बाद भारत को क्या नुक़सान होने वाला है ?

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भारत-चीन सीमा विवाद अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हो पाया था कि ईरान ने भारत को एक बड़ी चोट पहुंचा दी है। बीते मंगलवार को ख़बर आई कि ईरान ने चाबहार रेल प्रोजेक्ट से भारत को अलग कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसकी वजह भारत से फंड न मिलना बताया गया। ईरान और भारत के बीच चार साल पहले चाबहार पोर्ट से अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर ज़ाहेदान तक रेल लाइन बिछाने को लेकर समझौता हुआ था। कहा जा रहा है कि इसके पीछे चीन का हाथ है।

अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू की एक ख़बर के मुताबिक़ ईरान अब ख़ुद ही इस प्रोजेक्ट को पूरा करेगा। ख़बर है कि ईरान ने चाबहार पोर्ट का काम शुरू भी कर दिया है। 628 किलोमीटर लंबे इस रेल मार्ग को बिछाने में ईरान ने भारत को एक बड़ा झटका दिया है।

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द हिंदू से बात करते हुए ईरान के यातायात और शहरी विकास मंत्री मोहम्मद इस्लामी ने कहा कि, “हम इस परियोजना को शुरू कर चुके हैं। यह चाबहार रेल प्रोजेक्ट को 2022 तक हर-हाल में पूरा कर लिया जाएगा। हम इस परियोजना के निर्माण में अब ईरान के नेशनल डेवलपमेंट फंड का इस्तेमाल करके इसको पूरा करेंगे”।

क्या है ये चाबहार रेल परियोजना?

2016 में जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान के दौरे पर गए थे, तब भारत और ईरान के बीच इस परियोजना को लेकर समझौता हुआ था। ये भारत-अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के बीच हुआ एक महात्वपूर्ण समझौता था। दोनो देशों में हुए समझौते के मुताबिक इस परियोजना के लिए भारत की ओर से इंडियन रेलवेज़ कंस्ट्रक्शन लिमिटेड (इरकॉन) को इस रेल ट्रेक के निर्माण में शामिल होकर काम करना था।

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चाबहार रेल परियोजना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक परियोजना थी। इस परियोजना के तहत भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ मिलकर एक अंतरराष्ट्रीय यातायात मार्ग स्थापित करना चाहता था। भारत इस रास्ते का इस्तेमाल अफ़ग़ानिस्तान तक पहुंचने के लिए करना चाहता है, लेकिन पाकिस्तान इस परियोजना को लेकर चिंतित रहा है।

हालही में, भारत-चीन विवाद के बाद ऐसा माना जा रहा है कि चीन की शह पर ईरान ने ऐसा फैसला किया है। हाल ही में चीन और ईरान के बीच चार सौ अरब डॉलर के रणनीतिक निवेश को लेकर समझौता हुआ है।

ईरान ने चाबहार रेल प्रोजेक्ट से भारत को क्यों किया अलग ?

पीएम मोदी के ईरान दौरे के समय एक एमओयू साइन किया गया था। भारत की ओर से इरकॉन ने ईरानी रेल मंत्रालय के साथ ये एमओयू साइन किया था। द हिंदू ने लिखा है कि  इरकॉन ने इस रेल प्रोजेक्ट के लिए सभी सेवाएं, सुपरस्ट्रक्टर वर्क और आर्थिक सहयोग (करीब $1.6 अरब) देने का वादा किया था।

जानकारो का कहना है कि भारत, अमेरिका की चक्कर में इस परियोजना को शुरू करने में देरी कर रहा था।  ईरान बार-बार इसकी शिकायत कर रहा था। इसी देरी के चलते ईरान को ऐसा क़दम उठाना पड़ा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसकी एक बड़ी वजह भारत से ईरान को फंड न मिलना भी बताया गया।

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इसके साथ ही दूसरी तरफ अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भारत ने काम शुरू नहीं किया था। भारत पहले ही ईरान के साथ तेल का आयात कम कर चुका है। भारत अभी तक ईरान के चाबहार बंदरगाह पर अरबों रुपये खर्च कर चुका है। हालांकि, अमेरिका की वजह से भारत और ईरान के संबंध नाजुक बने हुए हैं। 

चाबहार रेल परियोजना का हिस्सा न रहने से भारत को बड़ा नुक़सान

जानकारो का मानना है कि भारत के लिए ये बड़ा नुकसान है, क्योंकि ये प्रोजेक्ट रणनीतिक रूप से भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण था।भारत के लिए यह मध्य एशिया, रूस और यहां तक कि यूरोप तक पहुंचने का प्रयास था। चाबहार बंदरगाह को रेल नेटवर्क से भी जोड़ने का प्रस्ताव था और इसमें भारत भी मदद करने वाला था।

भारत इस रास्ते का इस्तेमाल अफ़ग़ानिस्तान तक पहुंचने के लिए भी करना चाहता था। वैसे भारत से अफ़ग़ानिस्तान पहुंचने का आसान तरीका तो पाकिस्तान के रास्ते है, लेकिन दोनों देशों के बीच संबंध लंबे दौर से अच्छे नहीं हैं। इसलिए अरब सागर के किनारे बाईपास लेने की कोशिश की जा रही थी। इस चाबहार पोर्ट को पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का जवाब भी माना जा रहा था। ग्वादर पोर्ट चाबहार से 70 किलोमीटर ही दूर है।

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चाबहार पोर्ट सिर्फ भारत की अफगानिस्तान नीति और अफगान में पाकिस्तान की घुसपैठ को कम करने के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि जिस रेल प्रोजेक्ट से भारत को अलग किया गया है वह भविष्य में भारतीय उत्पादों को रेल मार्ग से यूरोप तक बहुत ही कम समय में और कम लागत पर भेजने का काम करने वाला था। यह रेल प्रोजेक्ट चाबहार पोर्ट से जाहेदान के बीच की है। भारत की तैयारी इसे जाहेदान से आगे तुर्केमिनिस्तान के बोर्डर साराख तक ले जाने की थी।

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क्या ईरान लीज़ पर चीन को दे देगा चाबहार बंदरगाह ?

ये आशंका भी है कि चीन के साथ नज़दीकी बढ़ने के चलते ईरान चाबहार बंदरगाह चीन को लीज़ पर दे सकता है। यानी डर है कि चाबहार बंदरगाह पूरी तरह से भारत के हाथ से जा सकता है। हालांकि ईरानी अधिकारियों ने मीडिया से बातचीत में इस तरह की खबरों को खारिज किया है।

लेकिन ईरान ने खुद ही पिछले साल चीनी द्वारा चलाए जा रहे पाकिस्तानी ग्वादर पोर्ट और चाबहार के बीच टाई-अप का प्रस्ताव दिया था। साथ ही चाबहार ड्यूटी फ्री ज़ोन के लिए भी ऑफर दिया था।

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ईरान ने कुछ दिन पहले ही चीन के साथ एक समझौता किया है जिसके तहत वहां चीनी कंपनियां अगले 25 वर्षो में 400 अरब डॉलर का भारी-भरकम निवेश करेंगी। ईरान के इस फैसले पर भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं दिया है। लेकिन जानकार मान रहे हैं कि ईरान का फैसला चाबहार पोर्ट के जरिए रणनीतिक हित साधने की कोशिशों को धक्का लगा है।

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