सिंधु जल विवाद: जब समझौते के पांच साल बाद ही पाकिस्तान ने घोंप दिया भारत की पीठ में छूरा

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नई दिल्ली, 29 अगस्त। सिंधु नदी जल समझौते पर बुधवार से भारत और पाकिस्तान के बीच दो दिवसीय बातचीत शुरू हो रही है। पाकिस्तान में इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह पहला मौका है जब भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी जल विवाद पर द्वीपक्षीय बात चीत हो रही है। दो दिनों तक चलने वाली इस वार्ता के लिए भारतीय जल आयोग के नौ प्रतिनिधि मंगलवार को पाकिस्तान पहुंचे थे। भारतीय दल की अगुआई जल आयुक्त पीके सक्सेना कर रहे हैं।

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इस मामले में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा है कि, जल आयोग की बैठक काफी लंबे वक्त से नहीं हुई थी। यह पानी की समस्या से जुड़ा मुद्दा है। यह केवल भारत-पाकिस्तान के बीच का नहीं बल्कि क्षेत्र का मामला है। हम एक सूखे इलाके में रहते हैं। हम पर पानी की कमी का असर पड़ सकता है। आखिर क्या है ये समझौता और इतने सालों बाद भी क्यूं बनी हुई है विवाद की स्थिति इस खबर में समझें।

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दरअसल, साल 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच पानी बंटवारे के मसले पर समझौता हुआ था। इस समझौते पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे।

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भारत पाक के बीच 9 साल तक चले लंबे वाद-विवाद के बाद वर्ल्ड बैंक की मदद से ये समझौता किया गया था। इस समझौते के मुताबिक, भारत पाक के बीच कुल 6 नदियों का बंटवारा किया गया। इसमें तीन नदियों का पानी भारत जबकी अन्य तीन नदियों का पानी पाकिस्तान के हिस्से में जाता है।

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इन नदियों में व्यास, रावी, सतलुज, सिंधु, चिनाब और झेलम नदी शामिल है। सिंधु की कई सहयोगी नदियों का उद्गम भारत में है। (सिंधु और सतलुज हालांकि चीन से निकलती हैं)। समझौते के तहत भारत को सिंचाई, परिवहन और बिजली पैदा करने के लिए इन नदियों के इस्तेमाल करने की इजाजत है।

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समझौते की मुख्य वजह यह थी कि, पाकिस्तान को इस बात का डर सता रहा था कि अगर भारत से युद्ध होता है तो भारत सिंधु का पानी रोक देगा जिससे पाकिस्तान में सूखा पड़ जाएगा और उसे हार का मुंह देखना पड़ेगा।

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समझौते के बाद सिंधु नदी का 80 प्रतिशत पानी पाकिस्तान के हिस्से में जाता है जबकी भारत के हिस्से में इस अहम नदीं का सिर्फ 20 फीसदी पानी ही आता है।

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समझौते के दौरान सिंधु नदी की सहायक नदियों को पूर्वी और पश्चिमी सहायक नदियों में विभाजित कर दिया गया, जिसमें सतलुज, व्यास और रावी नदियों को पूर्व की सहायक नदी बताया गया। जबकि झेलम, चेनाब और सिंधु को पश्चिमी नदी बताया गया।

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समझौते के मुताबिक, पूर्वी नदियों का पानी भारत बेरोकटोक इस्तेमाल कर सकता है। जबकि पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के उपभोग के लिए होगा लेकिन कुछ हद तक भारत इन नदियों का जल भी इस्तेमाल कर सकता है जिसमें भारत का पनबिजली निर्माण, कृषि के लिए पानी और साइट का अवलोकन आदि शामिल हैं।

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इस संधि के विश्लेषक रहे ब्रह्म चेल्लानी ने ‘हिन्दू’ में छपे अपने आर्टिकल में कहा था, भारत ने 1960 में ये सोचकर पाकिस्तान से संधि पर हस्ताक्षर किए थे कि उसे जल के बदले शांति मिलेगी लेकिन संधि के अमल में आने के पांच साल बाद ही पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर पर साल 1965 में हमला कर दिया।

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साल 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई यह जंग अप्रेल से सितंबर तक चली। इस युद्ध की बुनियाद पाकिस्तान ने बंटवारे के वक्त ही बना ली थी। इस जंग में पाकिस्तान अमेरिका से आए आधुनिंक टैंकों की मदद से जीतना चाहता था लेकिन भारतीय जवानों के आगे उसकी एक न चली। करीब 97 टैंकों को ध्वस्त कर दिया गया था और भारतीय सेना लाहौर तक पहुंच गई थी।

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